क्या है इकोनोमाईज़?


ECONOMIZE IS AN ART

अपने पैसो को सही समय को देखते हुये सही जगहां पर ही अच्छी तरहं तोल-मोल कर खर्च करना ही इकोनोमाईज़ कहलाता हैं। ये एक कला है, जिसको भी इस कला की अच्छी तरहं समझ होती है वह कभी भी अपने जीवन में आपने आपको विपरित परिस्थितियों में कमजोर नही पाता। क्योंकि किसी विपरित और प्रतिकूल समय में अटूट आत्मविश्वास की बहुत जरूरत पडती है। हां हो सकता है अपने छोटे से छोटे बजट को “ईकोनोमाईज़” करते समय शुरूआत में आपको “कंजूस”,”मक्खी चूस”,”कहां ले जायेगा इतना पैसा” और “खुल कर खर्च कर कल की मत सोच” जैसे सुनने में सही लगने वाले ये वाक्य भी सुनने को मिलें। लेकिन जब ये ही समज फ़ल के रूप में प्रतिकूल परिस्थितियों के दोरान समस्याओं से जूझकर बाहर निकल पाने में मददगार साबित होगी तो ये ही कंजूसी समझदारी के रूप में समाज के सामने प्रकट होगी। हो सकता है किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी हो कि उस व्यक्ति को ऐसा महसूस होने लगे कि उसे पैसा बचाने की जरूरत क्या है। पर इस बात से तो हर व्यक्ति ही वाकिफ़ होता है कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिकूल परिस्थितियो के दोरान समस्यांओ का, कभी ना कभी सामना करना पडता है और कभी समस्याऎं बता कर नही आती। तो क्यों ना हम पहले ही अपने आप को मजबूत बनाके चले वो भी अपने बजट और समय को पूरी तरहं से “ईकोनोमाईज़” करके।
आजकल देखा जाता है कि युवाओ में ये प्रवति अधिक पायी जाती है। युवा आजकल खर्च करने से पहले आगे के बारे में सोचना कतई पसन्द नही करते। और जब बाद में किन्ही समस्यांओ के दोरान पैसो की जरूरत होती है तो वह अपने साथीयों से आवश्यकता पूर्ति की आशा कर बेठता है और जब साथीयो से भी आवश्यकता पूर्ति नही हो पाती है तो उसका मनोबल टूटने लगता है और वह ऐसी परिस्थितियों से बाहर निकल पाने में आपने आपको असफ़ल महसूस करने लगता है जिसके कारण कभी-कभी इसके गम्भीर परिणाम ये देखने को मिलने लगते है कि वह युवा आत्महत्या जैसा अपराध भी कर बेठता है। तो ऐसी समस्यांओ से लड़ने के लिये अपने आपको पहले से ही मजबूत बनाकर चलना ही बहतर होगा।
अपने बजट और समय को “इकोनोमाईज़” करना बच्चो को सिखाना ज्यादा बहतर:
ये अकसर कहा जाता है कि छोटे पोधे को अपनी इच्छा अनुसार किसी भी दिशा में सरलता से मोड़ा जा सकता है परन्तू अगर वो ही पोधा एक बड़ा पैड़ बन जाये तो उसको किसी भी दिशा में मोड़ पाना बहुत कठिन होता है। ठीक इसी प्रकार इकोनोमाईज़ की कला अगर बच्चे को सिखाई जाये तो वह अपने पैसे को उचित समय पर और सही जगहां पर पूरी तरहं से तोल-मोल करके खर्च करना सरलता से सीख लेता है और इसी प्रकार फ़िजूल खर्च करने की आदत से बच्चा एक युवा आयु में भी बचा रहता है।

कैसे सिखायी जा सकती है बच्चो को ये कला:
मानलो आपका बच्चा स्कूल जाते समय आपसे पैसे मांगता है तो उससे जरूर पूछे कि वह 5 रूपय या
10 रूपय क्यों मागं रहा है। पूछने के बाद उसकी जरूरत को समझकर उतने ही पैसे दे जितने आवश्यक हों।
जितने आवश्यक हैं उससे ज्यादा पैसे दिलेरी दिखाने की आड़ में कतई ना दें क्योंकि अगर वह अपनी जरूरत से ज्यादा पैसे अपने पास देखेगा तो हो सकता है कि वह गैर-जरूरती चीजो पर तथा अपने दोस्तो में गलत समय पर उल्टे-सीधे खर्च करे और इसके अलावा बाहर की तली हुई खाने की चीजो पर भी ज्यादा दिलचस्पी दिखाते हुये खर्च करें जो एक फ़िजूलखर्च करने की आदत को बुलावा होगा और यही फ़िजूल खर्च करने की आदत उसके बड़े होने पर उसके सामने गम्भीर समस्यांओ के रूप में उसके खड़ी हो सकती है और उसके आत्मबल को तोड़ भी सकती है। फ़िजूलखर्च की आदत से आत्म निर्भरता भी नही आ पाती है। बच्चो को सेविंग करने की आदत डालने के लिये एक गुल्लक रखे और बच्चे से कहें कि ये गुल्लक उसकी खुद की है जो पैसा उसमें डाला जायेगा वो सारा बाद में उसके लिये ही खर्च किया जायेगा। तो इस प्रकार बच्चे में उत्साह बढेगा इसके साथ-साथ आत्म आत्मनिर्भरता आने की शुरूआत भी होगी और इस प्रकार बच्चा इकोनोमाईज की कला को अपने व्यवहार में उतार लेगा और अपने आगे के जीवन काल में एक सुखी जीवन जीने में भी सफ़ल हो पायेगा।

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