बाछड़ा जाती:- बेटीयों को वेश्यावृत्ति और बेटो को चोरी करना सिखाना रिवाज


Women: Alone, Exploited by Society

सरिता पत्रिका में छपे साक्षात्कार में फ़िल्मकार नीतू जोशी जी ने अपनी जिस रिसर्च का जिक्र किया है, के निष्कर्ष और सतीश दुबे जी के उपन्यास-“डेरा बस्ती” के अनुसार माने तो आज भी भारत में कुप्रथाअऎं कम हो गई हैं ये भ्रम ही साबित होता है। मध्य प्रदेश से सटे रतलाम,मंदसोर और नीमच में “बाछड़ा” नाम की जाती के लगभग 150 गांव हैं। ये जानकर आश्चर्य होगा कि इन 150 गांवो में जब कोई लड़की पेदा होती है तो उसके जवान होने से पहले ही खुद उसकी मां वेश्याव्रत्ति (धन्धे) पर लगा देती है और एक ताज्जुब की बात ये है कि उसकी मां ही खुद पहला ग्राहक ढूंढने के लिये बोली लगवाती है। जो सबसे ज्यादा बोली लगाता है उसी आदमी के साथ लड़की को रात बितानी पड़ती है और इसी प्रकार गांव की हर बेटी वेश्याव्रत्ति की दलदल में फ़सकर रह जाती। जब लडकी के लिये पहला ग्राहक मिल जाता है तो इस दिन को सारे गांव वाले “बाछड़ा” जाती के लोग एक शादी की तरहं मनाते। अगर कोइ लड़की अपनी मर्जी से किसी लड़के के साथ घर बसाना चाहती है तो उसे आग पर चल कर एक परीक्षा देनी होती है। सवाल ये उठता है कि आखिर महिलाये इस कुप्रथा का विरोध क्यों नही करतीं? तो इस सवाल का एक जवाब ये है कि गांव की महीलायें भी अब इसको एक अनिवार्य पर्था मानने लगी हैं और दूसरा जवाब ये है कि जब किसी एक महिलां ने इस कुप्रथा का विरोध कर, किसी उधोगपति से शादी करली तो उसके पति उधोगपति ने भी उसको शादी के बाद वेश्याव्रत्ति के धन्धे में धकेल दिया, वह बच बचाकर वापस अपने उसी गांव में पहुंच गयी, इससे साफ़ जाहिर होता है ऐसे में कोइ महिला अगर विरोध करे तो कहां जायेगीं और इसके अलावा पुरूष इस कुप्रथा को इसलिये बन्द करना नही चाहते क्योंकि अगर ऐसा होता है तो उनको काम करना पड़ सकता है। दूसरी हेरानी की बात यह है कि जब बाछड़ा जाती के लोगो के घर कोइ लड़का पेदा होता है तो उसे पढाने-लिखाने के बजाये चोरी करना सिखाया जाता है। अब सवाल ये उठता है कि अगर ऐसी कुप्रथाऎ भारत में अभी भी मोजूद है तो इस पर सरकार ने अब तक कोई कदम क्यों नही उठाया? तो ये सरलता से समझ आता है कि ये कुप्रथाऎं किसी एक गांव में तो हैं नही, जो नैताओ को इनके खिलाफ़ ठोस कदम उठाने पर कोई नुकसान ना हो बल्कि यहां सवाल तो 150 गांवो के वोट बैंक का है। इस प्रकार की कुप्रथाऎं मालवा क्षेत्र के लगभग लगभग 150 गांवो में फ़ैलीं हैं। इससे साफ़ तोर पर जाहिर होता है कि कोइ भी नेता अपना 150 गांवो का वोट बैंक खोना बिलकुल नही चाहेगा। सरकार को इस कुप्रथा पर जल्द से जल्द कड़ा रुख अपनाते हुये पाबंदी लगानी चाहीये और इसके साथ-साथ भारत में कुप्रथाऎं किन-किन जगाहों पर आज भी विद्दमान हैं, पता लगाकर उन पर कड़ी कार्यवाही के तेहत पाबंदी लगानी चाहीऎं।

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