आखिर किसने किया घोटाला यदि इन्होने नही किया?


“1 लाख,76 हजार करोड रुपये”… ये इतनी बडी राशि है कि एक गांव के सभी परिवारो की सात पुस्तें घर बैठ खा सकती है यानी यदि किसी आम इंसान को एक बार में इतनी राशि मिल जाये तो हो सकता है कि वह अपना दिमागी सन्तुलन ही खो बेठे। यदि इतनी ही बडी राशि किसी देश के पास उपलब्ध हो जाये तो देश का प्रत्येक क्षेत्र तो कहना ठीक ना होगा लेकिन एक क्षेत्र जरूर तेज गति पकडते हुये ऊचाईयों को छू लेगा और जब देश को इतनी बडी उपलब्धि हासिल हो जाये कि देश का एक क्षेत्र उन्नत और पूर्णरूप से विकसित हो जाये तो यह उस देश के लिये गौरव बात होगी और भविष्य में एक महा-शक्ति बनने की प्रबल संभावनाएं भी बढ जायेगीं। मगर सोचने वाली बात तो ये है कि जिस राशि को भारत के उत्थान के लगाना चाहिये था वह 1 लाख, 76 हजार करोड रुपये की भारी-भरकम राशि 2009 में किये गये 2जी स्पेक्ट्रम बिक्रियों में अनियमितताये बरतने के चलते पूर्व दूर संचार मंत्री और घोटालो का राजा ए० राजा द्वारा ऐसे बरबाद कर दी गयी जैसे किसी व्यक्ति को ठण्ड का कडा अनुभव होने पर उसने थोडी गरमी लेने के लिये अपने आस-पास उपलब्ध पुरानी रद्दीयों को जलाकर हाथ सेंकें हो।

आज जब ए० राजा के घोटाले का पर्दाफाश करने में सी०बी०आई० पूरी ताकत झोंकने को तैयार है, वहीं राजा द्वारा को देश के बडे घोटाले “2जी स्पेक्ट्रम आवंटन” में हाथ होने से कतराते हुये किसी न किसी तरह बचाने की कोशिश की जा रही है। अब राजा ने सोचा है कि अगर वह सी०बी०आई० रिमांड के दोरान तिहाड जेल में कुछ ऐशोआराम की चीजो की मांगो के चलते किसी को परेशान नही करेगें और आराम से जेल के अनचाहे माहौल में रहने को ऊपरी मन से स्वीकार कर लेंगे तो शायद सी०बी०आई० या सुप्रीम कोर्ट को उन पर दया आ जायेगी या ये कहीये कि घोटाले में शामिल होने की प्रबल संभावनाओ के साथ शक की सुईं उन पर से हट जायेगी। पर शायद ए० राजा ये भूल गये हैं कि अब उनको बचाने के लिये शायद ही कोई आगे आये क्योकि अब उच्चतम न्यायालय तक बात जो पहुंच गयी है और अब तक जिन शक्तियों की छत्र-छाया में अपने देश को लूटने के इरादो को वह अंजाम देते आये हैं वह इसलिये राजा का साथ नही देने वाले क्योकि उन्हे भी डर होगा कि कही वह भी सी०बी०आई० की जांच के दायरे में ना आजायें।

सन 2010 से 2011 की अवधि में जिस तेजी से तमाम घोटालो का पर्दाफाश हुआ है ये एक कुछ हद तक प्रशंसनीय हो सकती है विशेष रूप से मीडिया इसके लिये बधाई की पात्र है। ये तो अच्छा ही हुआ कि घोटाले समय रहते सामने आ गये। पर शक की सुईं जिन पर भी घूम रही है वे घोटाले में किसी रूप से शामिल होने से लगातार इनकार करते हुये ये कह रहे है कि उनके खिलाफ़ राजनैतिक साजिश या झूठे आरोपों की रचना की जा रही है। यहां प्रश्न उठ खडे होते हैं कि क्या सच में घोटाला किसी ने नही किया? और अगर किसी ने नही किया तो इतनी बड़ी राशि क्या हवा में उड गई?

अभी हाल ही की बात है कि शीला दीक्षित प्रधानमंत्री से बातचीत करने के बाद शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट के उस आरोप से साफ़ इनकार करती नजर आयीं जिसमें कहा गया है कि हमारी माननीय मुख्यमंत्री शीला दीक्षित जी ने जानबूझकर राष्ट्र-मंडल खेलो से पूर्व टेण्डरो या निविदाओं की नीलामी में देरी की। जिससे निविदाएं घूम फ़िर के उनके करीबी और सगे-संबम्धीयों को ही दी जायें। चलो ये तो रही राष्ट्र-मंडल खेलो में हुये घोटाले में जांच के दायरे में घूम रहीं शीला दीक्षित की बात, तो वहीं ए० राजा भी ये बात मानने को कतई तैयार नही की उन्होने ही “2जी स्पेक्ट्रम आवंटन” में अनियमिततायें बरतने साथ एक बडे घोटाले को अंजाम दिया है।

राजा जी तो राजा जी कलमाडी जी कम थोड़े हैं। वे भी माथे से पसीना पहुंचते हुये.. हर बार मीडिया के सामने ये कहने से जरा भी नही हिचकते की उन्होने कोई घोटाला नही किया। अब सभी घोटालो में शामिल होने से बचते हुये अपने आपको पाक-साफ़ बतायेगें तो यहां प्रश्न फ़िर खडे होते हैं कि सभी दूध के धुले है तो आखिर घोटाले किये तो किये तो किये किसने? अगर मान भी लिया जाये कि इन सभी ने घोटाले नही किये तो “क्या उपर से कोई पैसा खाऊ भूत उतरा था… जो रातो रात पैसा खा गया?…”

खैर जो भी हो जिस प्रकार करीब 64 करोड के घपले वाले बेफ़ोर्स मामले की जांच पर देरी दर देरी होने के चलते 250 करोड रुपये खर्च हो गये हो और कोई स्पष्ट परिणाम नही आया। अगर आया भी हो परिणाम तो शायद मिटा दिया गया हो, जिससे भारतीय खाजाने पर एक बडा प्रभाव पडा। इस लंबे चोडे खर्च और निष्कर्ष संतोषजनक ना आने के कारणं आदालत ने इस मामले को लगभग ठण्डे बस्ते में डाल दिया। अब इन सब द्वारा एक प्रतिशत भी अपना जुल्म कबूल ना करने की वजह से इतना अन्दाजा हो ही जाता है कि ये घोटाला या ये सभी घोटाले वाले प्रकरण यूहीं चन्द दिनो में तो सुलझने वाले नही। तो जाहिर सी बात है कि एक-एक करके ये सब भी ठण्डे बस्ते में डाल दिये जायेगें।

अब अगर जांच को किसी निष्कर्ष तक ले जाना है तो बिना किसी दबाव से दबे बिना जांच की गति को निष्पक्षता से तेज करना होगा जिससे अच्छे

परिणाम आने की संभावनाएं तो बनती ही हैं साथ ही भारतीय खजाने में से भारी-भरकम राशि खर्च होने का भय भी काफ़ी हद तक कम “होगा” कहना कठिन है लेकिन “हो सकता” है।

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