सालो पहले ही बीज बोये गये, परिणाम: भारत में बेरोजगारी और आबादी


भारत में बेरोजगारी और आबादी जिस तेजी से बढ़ रही रही है इसके बीज तो बहुत सालों पहले ही बो दिए गए थे| 1951 में जब पहली पंच वर्षीय योजना चलाई गयी| जिसमें कुल उन्नीस सौ साठ करोड़ रूपए के खर्च को देश के विकास के लिए घोषित किये गए| सिर्फ घोषित ही किये गए थे| घोषित उन्नीस सौ साठ करोड़ रुपयों में से कुल पैसठ लाख रूपए सिर्फ और सिर्फ परिवार नियोजन के लिए ही खर्च किये जाने थे जिससे समाज को को गरीबी की समस्या और आबादी से निजात दिलाई जा सके| पर आश्चर्य की बात तो ये है की एक तो इतने कम पैसठ लाख रूपए परिवार नियोजन पर खर्च करने के लिए निर्धारित किये गये, जिसमे कटोती की कोई गुन्जाईश तो बची ही नहीं, लेकिन फिर भी उसमे से भी कटोती करते हुए पैसठ लाख रुपयों में से कुल साड़े अठारह लाख रूपए ही परिवार नियोजन के लिए खर्च किये गए| सवाल तो ये है कि आखिर अठाहर लाख रुपए ही जब खर्च किये जाने थे तो पैसठ लाख रुपयों का व्याय करने की असत्य घोषणा क्यों गयी थी?

इस बात से कोई मुंह नही मोड़ सकता है कि 1951 के काल में नेहरू जी प्रधानमंत्री थे। जिनके काल में पहली योजना के दौरान कृषि के क्षेत्र में 17 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी थी जो सराहनीय वृद्धि थी| पर यहा इस सच्चाई को बिलकुल नजर अंदाज नहीं किया जा सकता की 1921 से भारत में जिस तेजी से जनसँख्या अपना आकर बढाती जा रही थी, उस तेजी को आज भी भारत सरकार काबू कर पाने में पूरी तरहं नाकाम साबित हो रही है| यहां देखने वाली बात है कि साड़े अठारह लाख रूपए के खर्च से एक सो छब्बीस परिवार नियोजन केंद्र शहरी क्षेत्र में और कुल इक्कीस केंद्र गावो में खोले गए थे|

नेहरू जी ने खुद भी माना था कि भारत एक गांवो का देश है और हम भी इस बात से पूरी तरहं परिचित है। “अशिक्षा”- जो जनसँख्या बढने का मुख्या कारण रही है, सबसे ज्यादातर गावो में ही पली बढ़ी है | जैसा कि आज भी हम जानते है और जब इस बात को उस समय भी हर कोई जानता था कि गावों में सुधार की ज्यादा जरुरत है और गावो के उद्धार से ही हमारा भारत आगे बड़ सकता है तो परिवार नियोजन केंद्र के “एक सो छब्बीस” (126) ज्यादा केंद्र शहरो में क्यों खोले गए और इतने कम महज इक्कीस केंद्र ग्रामीण क्षेत्रो में क्यों खोले गए ? ये तो थी प्रथम पंचवर्षीय योजना में जनसंख्या के दबाव को रोकने के लिये कितना प्रयास किया गया। लेकिन दूसरी योजना जो 1956 में चलाई गयी इसमें भी ज्यादा कोई खास हालात नही थे। दूसरी योजना में कुल चार हजार छेसो बहत्तर करोड़ रुपए के व्यय की घोषणा की गयी जिसमे से परिवार नियोजन के कार्यक्रमो के लिये कुल पांच करोड़ रूपए के व्यय को निर्धारित किया गया| दूसरी योजना में एक बात तो जरूर ये अच्छी थी कि इस बार परिवार नियोजन केन्द्रों कि संख्या शहरो में कम (549) और गाँवों में ज्यादा (1,100) हो गयी| पर सवाल तो ये परेशान करने वाला है कि पांच करोड़ में से कटौती होते हुए महज दो करोड़ तीन लाख रुपए खर्च क्यों हुए? अगर पांच करोड़ रुपए पूरे पूरे खर्च होते तो शायद भारत का ज्यादा नहीं तो थोडा भला हो जाता जिससे कम से कम आज के भारत को कुछ तो राहत मिलती | सच्चाई तो ये है कि दूसरी योजना में उतावलापन इतना झलकता है कि सब तरफ से ध्यान हटाकर कुल व्यय का लगभग चौहत्तर प्रतिशत रुपया केवल उधोग को ही भेट चढ़ा दिया गया था जो उस समय इतना जरूरी नहीं था| बल्कि कृषि क्षेत्र को आगे बढाने के साथ साथ जनसँख्या को काबू में करके गरीबी और बेरोजगारी को समाज से दूर कर भारत के आर्थिक विकास को एक नई दिशा देने कि जरूरत थी| उतावलेपन का परिणाम ये हुआ कि उन्नीस सौ साठ दौरान एक ऐसा समय आया कि भारत में लोगो के पास खाने के लिए भी कुछ नहीं बचा था| बल्कि कई तथ्यों कि माने तो ये पता चलता है कि उन्नीस सौ साठ के दौरान भारत के लिए इतना बुरा समय था कि भारत के पास सिर्फ सात हफ्तों के लिए ही भंडार बचा था| वो तो शुक्र मानो अमेरिका की कि उसने हमारे भंडार को भरने के लिए अपने यहाँ से खाद्दान भेजा था तब जाकर भारत सदमे से बाहर आ पाया था| कुछ भी कहा जाये लेकिन इन विफ़लताओ से भारत में एक कच्चा दृष्टिकोण और उतावलेपन का साफ़ पता चलता है। यहां प्रश्न ये है कि आखिर भारत अपनी क्षमताओं को ठीक तरहं से जाने-पहचाने बिना आगे क्यों बढ़ जाता है?

अब अगर तीसरी पंचवर्षीय योजना (1961-66) पर नजर डाली जाये तो इस योजना में परिवार नियोजन के लिए कुल व्यय में से सत्ताईस करोड़ रुपए खर्च करने का प्रावधान था और ये राशि पचास करोड़ तक बढाई जा सकती थी| लेकिन परिवार नियोजन के लिए जितनी रकम के खर्च होने का प्रावधान था तीसरी योजना में भी वो भी पूरी खर्च नहीं हुई बल्कि वास्तविक व्यय चोबीस करोड़ (24 करोड़, 86 लाख) ही हुआ। अब भी कोई हालात तो दूर की बात है बल्कि सोच भी नही बदल पायी थी| जिसका परिणाम सामने था कि तीसरी योजना भी लगभग फ़ैल हो गयी| तीसरी योजना के बाद भारत के लिए आर्थिक संकट से निकलना बहुत ही जरूरी था| राजनेतिक उथलपुथल का तुफ़ान किसी तरहं इंदरा गांधी जी के पास आकर थमा। एक अच्छे नेता के रूप इंदिरा गांधी जी ने अपना दृष्टिकोण समाज के सामने रखा और एक वर्षीय योजना चलाई गयीं जो तीन साल तक चलीं (1967-69)। जिसके कारण ज्यादा नहीं तो थोड़ी राहत जरूर मिली आर्थिक तंगी से जूझ रहे भारत को | इस अवधि में जनसंख्या और गरीबी के क्षेत्र में नहीं पर भारत को खाद्दान उत्पादन में काफी वृद्धि देखने को नसीब हुई| खाद्दान उत्पादन बढ़कर सात सौ बयालीस लाख टन पर आ गया जो पहले सिर्फ सात सो इकत्तीस पर ही अटक कर रह जाया करता था| यही तीनो अवधि इसीलिए हरित क्रान्ति के रूप में जानी जाती है|

तीसरी योजना के बाद जो भी प्रयास किये और जो भी सफल परिणाम सामने आये उससे एक कहावत जरूर मस्तिष्क में आती है कि “चलो देर आये दुरुस्त आये” | परेशान करने वाली बात तो ये है कि आखिर इतनी देर बाद ही भारत को एहसास क्यों होता है वो भी हर बार? काश भारत में अपनी जरूरतों और क्षमताओं को पहचानने के बढ़िया द्रष्टिकोण की कमी न होती तो आज भारत को कुछ न कुछ आर्थिक रूप से मजबूत बनते हुये बेरोजगारी और बढती हुई आबादी की समस्या को भारत से निकाल फ़ैकने में कुछ हद तक तो मदद जरूर मिलती|

कहीं न कहीं आज भी भारत के पास अपनी क्षमताओं को जानने-पहचानने के द्रष्टिकोण कि कमी खलती है| जिससे वर्तमान में भी उपलब्धयां भारत से कोसों दूर रह ही जाती हैं|

घोषणा:-

ये लेख मेरे पास जितने आंकडे और तथ्य उपलब्ध थे उनके अधार पर ही मेरे द्वारा समाज के सामने रखा जा रहा है। इस लेख से मेरा उद्देश्य सिर्फ़ ये बताने का है कि अगर पहले ही हम अपनी क्षमताओं को पूरी तरह जान ले तो शायद हमारे आगे के लिये लगाये गये अनुमान सही साबित हों। जो बेहद जरूरी भी है। अगर लेख से अगर किसी को भी अपमान महसूस होता है तो उसके लिये क्षमा का पात्र हुं।

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