घटना कोई भी हो,बस बिछा दिया जाता है राजनीतिकरण का जाल


       केंद्र में सरकार या यानी कोंग्रेस अपनी बरसो पुरानी जमी-जमाई सत्ता के खोने को लेकर डरी हुई है। कोंग्रेस ये

झांसा देते राजनेतां

अच्छी तरहं जानती है कि इस बार होने वाले चुनावो में जनता उसे पूरी तरहं नकार सकती है। ऐसे में अपनी सत्ता की कुर्सी हिल्ते देख सहानुभूति के नाम पर राजनीति करने से वे बिलकुल भी नही चूकना चाहती। और पता नही क्या-क्या जतन कर रही है। ऐसा शायद ही कभी देखा गया हो कि कोंग्रेस को अपनी सत्ता को जमाऎ रखने में इतनी कठिनाई महसूस हो रही हो। आजकल कोंग्रेस अर्थात हमारी केंद्र सरकार अपने भ्रष्ट व्यवहारों को लेकर इतनी परेशान दिख रही है कि उसे खुद को पता नही कि वो क्या कर रही है। इसका अंदाजा सरलता से लगाया जा सकता है कि उत्तर-प्रदेश के नोएडा में भट्टा-परसौल गांव में चल रहे किसान आन्दोलन में पिस्स रहे गरीब किसानो से सहानुभूति दिखाने के लिये मायावती सरकार के कड़े सुरक्षा इंतजामो के जाल को तोड़ते हुऎ कोंग्रेस ने राहुल गांधी को भट्ट-परसौल गावं किसानो तक पहुंचाने के लिये अपने तोर-तरीकों से भरी पूरी ताकत झोंक दी। जब वहां तक कोंगेस पहुच ही गयी तो ऐसे मोके का फ़ायदा उठाना कोंग्रेस तो क्या कोई भी राजनैतिक पार्टी छोड़ना नही चाहेगी। ऐसा नही है कि सिर्फ़ कोंग्रेस ने ही वहां तक पहुंचने के लिये जद्दोजेहद की हो, बल्कि बी०जे०पी० जैसी पार्टीयों के नैताओं ने भी भट्टा-परसौल गांव पहुचने को लेकर कई जतन किये, पर कोई कामयाबी हासिल नही हुई। और फ़िर राहुल गांधी अपने रणनीतियों के तोर-तरीकों के सही इस्तेमाल के चलते भट्टा-परसौल गांव किसानो से सहानुभूति दिखाने और उनकी मांगो को सुनने के लिये किसानो पहुंचने में सफ़ल हो गये।इस बात का किसी को भी अंदाजा नही था कि कोंग्रेस के वरिष्ट नेता दिग्विजय सिंह और राहुल गांधी अनिश्चित काल के लिये धरने पर बैठने का ऐलान कर देगें। यहां एक सवाल जरूर उठता है कि आखिर किसानो को लेकर कोंग्रेस इस बार इतनी चिंतित क्यों दिखाई दे रही है। तो एक बात साफ़ है कि 2जी आवंटन, राष्ट्रमंडल खेल और आदर्श हाऊसिंग जैसे बड़े-बड़े घोटालों को अपने भ्रष्ट व्यवहार से अंजाम दे चुकी केंद्र में सत्ता चला रही कोंग्रेस को अपनी सत्ता के खोने का डर अब सताने लगा है। देश में गरीब किसानो की हालत बत से बद्त्तर होती जा रही है और भ्रष्टाचारी राजनेतां मालामाल होते जा रहें हैं, इसका सटीक अंदाजा भारत के हर मध्यम वर्गीय नागरिक को बखूबी होगा क्योंकि कहीं न कहीं वो भी कमजोर आर्थिक स्थिति की मार झेल रहा है।

बस एक माहोल बनने की देर नही होती कि एक-एक करके सभी राजनैतिक दल अपनी-अपनी वोट बटोरने की टोकरी को लेकर दोड़े चले आते हैं। किसानो तक पहुंच कर अचानक धरने का ऐलान करके पार्टी पर लगे भ्रष्टाचार के दाग को मिटाने और पार्टी की छवि को पाक-साफ़ करने की जो भी कोशिश की गई, वह

जनता...

राजनीति थी या सहानुभूति या फ़िर सहानुभूति के पीछे छुपी कोई राजनैतिक मंशा, इसका तो फ़ैसला भोली दिखने वाली लेकिन समझदार हो चुकी जनता आने वाले चुनावों में कर देगी।
 राहुल गांधी और दिग्विजय सिंह के धरने पर बैठने को सुनकर अमर सिंघ जो मुलायम सिंह का साथ छूटने के बाद से ही किसी पार्टी की छत्र-छायां की तलाश में हैं, वे भी किसानो को झूठी तसल्ली देने और अपना चेहरा जनता को दिखाने भट्टा-परसौल गावं पहुंच ही गये कि “भई मै भी हुं दौड़ में”…   उधर समाजवादी पार्टी भी कोंग्रेस के जिंदाबाद के नारे किसानो द्वारा लगाते देख मैदान में कूद पड़ी। और कुछ ही समय बाद समाजवादी पार्टी ने भी अपने होने का अहसास दिलाने के लिये कोंग्रेस के खिलाफ़ जेहर उगला शुरू कर दिया। वहीं मयावती को अपनी पार्टी बहुजन समाज पर्टी की सत्ता की पकड़ कमजोर होती दिखी तो वें भी राहुल को गिरफ़्तार करवाकर अपनी पार्टी की क्षमता दिखाने से भी नही चूकी। ऐसे में मायावती भी कुछ कहने से पीछे हट जायें ऐसा हो नही सकता। आखिर वें भी राजनीति की दौड़ में पीछे नही हैं। इसी बीच उत्तर प्रदेश सरकार के एक मंत्री का यह कहना “राहुल को चना-गेंहू और गन्ना-सरकंडा आदि के बीच में अन्तर भी नही पता, चले हैं किसानों के लिये धरना देने”, कांग्रेस की कोशिशो के लिये एक और चुनौती साबित हुआ।
बस राहुल गांधी की गिरफ़्तार होते ही पूरे घटना क्रम ने शक्ल किस प्रकार बदली वो सबके सामने तब आ गया जब कोंग्रेसी नेताओं ने किसानो के दुख दर्द को भुलाकर जगहं-जगहं मायावती की सरकार के खिलाफ़ विरोध परदर्शन और हो-हल्ले करने चालू कर दिये। अब किसको परवाह थी अपने हको से वंचित और गरीब किसानो की। सोचनीय बात तो ये है कि इन सब धरनो और प्रदर्शनो से गरीब किसानो को तो एक प्रतिशत भी लाभ नही पहुंचा। क्योंकि अब तो पार्टी अपनी सत्ता की साख बचाने की जो पड़ी थी। रही सही पोल मायावती ने ये कहकर खोल दी कि अगर कोंग्रेस को किसानो से अगर इतना ही लगाव है तो वह “भूमि अधिग्रहण कानून लागू करके किसानो के लिये कुछ करें” जो संसद में चर्चा में आता है और फ़िर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। इस बात में भले ही राजनीति छुपी हो, लेकिन मायावती द्वारा भूमि अधिग्रहण कानून को लागू न करने को याद दिलाना काफ़ी हद तक ठीक ठहरता है और कोंग्रेस की राजनैतिक मंशाओ के पीछे के हकीकत को पहचानने में भी मदद करता है। सवाल ये है कि कोंग्रेस अब किसानो के लिये इतना बढ-चढ कर आगे क्यों आ रही है? इससे पहले भी जेतापुर जैसे किसान आंदोलन हुये है आखिर उस समय सभी राजनैतिक पार्टी क्या कर रहीं थी?, अगर कोंग्रेस को किसानो से वास्तव में लगाव है तो उसने किसानो के लिये भूमि अधिग्रहण कानून को अबतक अमली-जामा क्यों नही पहनाया?

कुल मिलाकर निष्कर्ष यही निकलता है कि देश के राजनेतां सहानुभूति की आड़ में राजनीति कर रहे रहे हैं। गरीब इस राजनीतिकरणं की चक्की में पिस्स रहे हैं। सभी राजनैतिक दलों ने किसानो के हक को लेकर चल रहे आन्दोलन का अपने राजनैतिक इरादों को अंजाम देने के लिये राजनीतिकरणं कर दिया। अब यही कहा जा सकता है कि सभी राजनैतिक दल सत्ता के घमंड में चूर होकर ये भूल गये है कि उनको सत्ता की गद्दी पर बैठाने वाला और कोई नही बल्कि जनता है।

Advertisements

Leave a comment

Filed under need for aware, Society in modern India

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s