महंगाई, भ्रष्टाचार और तिगड़मबाजी के बोझ से दबा आम आदमी


दो साल पूरे होने पर जश्न मना रहे या आम आदमी की हालत पर ……..

महंगाई की मार

आज महंगाई की मार आम आदमी को झेलनी पड़ रही है, इस बात कि फ़िक्र सरकार को है ऐसा किसी भी एंगल से नही लगता। महगांई क्या चीज होती है वो तो सिर्फ़ वर्तमान में जैसे-तैसे गुजर बसर कर रहा आम आदमी ही बता सकता है। लेकिन केंद्र सरकार इस समय पूरी तरहं सहमीं हुई है, और किसी भी तरहं अपनी सत्ता बनाये रखने के लिये उल्टे-सीधे जतन कर रही है। अगर सही माइनो में कहा जाये तो इस समय सरकार चारो तरफ़ से विरोधो से इस कदर घिरी है कि बस हालत देखने लायक है। और ऐसे में जब सरकार पूरी तरहं से भ्रष्टाचार में लिप्त है और एक एक कर सरकार की छत्र-छायां में जो लूट मची हुई है उसकी पोल जैसे-जैसे खुल रही है, केंद्र में सत्ता चला रही कोंग्रेस खुद ही अपने शब्दो के जाल में फ़सती जा रही है।

राहुल गांधी सत्ता को बचाने का एक मात्र सहारा

शायद इस बात को जनता जान गई थी कि राहुल गांधी सीधे-सीधे सामने आकर राजनीति नही करेंगे। पर जनता कि ये सोच ठीक उल्टी साबित तब हो गई जब राहुल गांधी सीधे भाट्टा-पारसौल में चल रहे अंदोलन और यूपी सरकार की निरंकुशता में पिस रहे किसानो को सांत्वना देने पहुंच गये। अगर थोडा जोर दिया जाये और देखा जाये तो ये साफ़ पता चलता है कि आखिर अक्सर शब्दो की राजनीति करने वाले राहुल सीधे सामने आकर राजनीति क्यों करने लगे। दरअसल राहुल खुद भट्टा पारसौल नही गये, बल्कि उन्हे कोंग्रेस की सोची-समझी रणनीति के तहत भट्टा पारसौल किसानो तक पहुंच कर सहानुभूति के नाम पर राजनीति करने के लिये बोला गया था।  क्योकि कोंग्रेस ये अच्छी तरहं जान गई है कि इस समय जब कोंग्रेस सरकार पूरी तरहं भ्रष्टाचार में डूबी है और सत्ता की कुर्सी हाथ से निकलने की पूरी-पूरी संभवना है तो कोंग्रेस की नजर में सिर्फ़ राहुल ही एक ऐसा हथ्यार हैं जो सत्ता को कुछ हद तक बनाये रखने में सफ़ल हो सकते हैं। कहते है ना जब “विनाशकाये विपरित बुद्धी” यानी अंत निकट होता है तो सोचने समझने की शक्ति भी काम करना बंद कर देती है। अगर माना जाये तो ठीक वैसा ही इस समय हमारी केंद्र सरकार कोंग्रेस की हालत है।

क्योंकि  इतने घोटालों और आरोपो मे लिप्त किसी भी सरकार या किसी भी व्यक्ति को इतना तो अंदाजा हो ही जाता है कि अब अगर थोडी सी भी चूक हुई तो चारो तरफ़ से नकारे जाने में जरा भी देर नही लगेगी। अब देखिये, केंद्र सरकार अपनी सोचने समझने शक्ति को इस कदर खो चुकी है कि वह सत्ता को कायम रखने के जौश में आकर किये गये कर्मो का बोझ आम आदमी पर दामो पर दाम बढाकर डाल रही है और उल्टे-सीधे व्यय और पता नही क्या-क्या तिगड़मबाजी करने से भी नही चूक रही।

प्रधानमंत्री मनमोहन के नेत्रत्व में तिगड़मबाजीयां

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेत्रत्व की यूपीए सरकार दो साल की सफ़लता का जश्न मना रहे हैं। पर कैसी सफ़लता का जश्न मना रही है सरकार?… बल्कि
देश में महगांई की तपन झेल कर भूके पेट सोने को मजबूर गरीब और आम-जन की हालत में कोई सुधार होता नही दिखा और न ही दिख रहा है।

सरकार की खस्ता हालत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सरकार ने गरिबो की जाती आधारित जनणना करने का फ़ैसला लिया है  और सरकार उस पर करीब 3500 करोड रुपए का खर्च करने जा रही है। वो भी तब जब देश में गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रहे गरीब भूखा-तड़पकर मर रहा है। लेकिन सरकार चाहती तो इससे पहले भी ऐसी गणना करने की सोच सकती थी लेकिन आदत से मजबूर और उलझन में पडी सरकार को देखर ऐसा लग रहा है कि उसे कुछ सूझ नही रहा है। सरकार के बेवक्त इस तरहं के खर्च को फ़िजूल खर्च ही कहा जा सकता है। दूसरी ओर देखा जाये तो  देश में इस बार अनाज की अच्छी खासी पैदावार हुई है और भंडार भरे पड़े हैं पर सरकार उस अनाज को गरीबो में मुफ़्त न सही कम दामो पर बाटने के बजाये निर्यात करने जा रही है। इससे सरकार एक अजीब रवेया का का पता चलता है कि चाहे करोडो का अनाज भंडारो में यूहीं भले ही सड़ जाये, पर वो अनाज गरीबो के भूखे पेट भरने में काम नही आना चाहीये!

मनमोहन सिंह के राज के पिछले दो सालों में महंगाई का ग्राफ़ देखा जाये तो महंगाई दोगुनी तेजी से बडी है। सरकार ने इन सालों में जनता को अपनी तिगडमबाजीयों में पूरी तरहं उल्झाकर रखा और कहती रही कि महंगाई पर दिसंबर तक, इस महिने या उस महिने तक काबू पा लिया जायेगा और महंगाई को घटाकर 6 प्रतिशत पर लाने के प्रयास किये जा रहे है। पर सच्चाई को कोन नकार सकता है, आज भी महंगाई कम होने के बजाये किस कदर आम आदमी की कमर तोडे हुये है इस बात को हम बखूबी जानते हैं। सरकार तिगडमबाजी करती रही है और आम आदमी लगातार ऐसे ही पिस रहा है।  कुल मिला अगर कहा जाये तो यही कहा जाये तो मंहगाई, भ्रष्टाचार और सरकार की तिगरडमबाजीयों के बोझ से आम आदमी पूरी तरहं दब रहा है, पिस रहा पर सरकार डरि-सहमीं पता नही किस उल्झन में उलझकर उल्टी-सीधी तिगड़मबाजीयां करने  से बाज ही नही आ रही। अब मनमोहन सरकार अपने दो साल पूरे होने पर जश्न मना रही है या आम अदमी की हालत पर, ये सिर्फ़ आम आदमी जानता है। क्योंकि सरकार को सत्ता बचाने के जौश में आकर तिगरड़मबाजी करने से फ़ुरसत मिलेगी, तभी उसका ध्यान आम आदमी की महंगाई से दबी हालत की ओर जायेगा ना!

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