जनसंख्या का सहलाब भारत को 1 50 करोड जनसंख्या तक लेके जा सकता है


भारत की हालत ऐसी हो सकती है

 हम इस तथ्य से बखुबी वाकिफ़ होंगे कि सन 1921 के बाद से जनसंख्या का आकार बहुत ही तेजी से बढता रहा है। जनसंख्या की तीव्र गति को थामने के लिये सरकार ने बहुत से प्रयास भी किये पर ये प्रयास उम्मीदो पर खरे नही उतर पाये। अब जनसंख्या का एक अरब के आकडे को पार कर जाना, तीव्रता को रोकने के लिये किये गये प्रयासो में चूक कहें या कुछ और। पर एक बात जरूर साफ़ है कि जहां जनसंख्या को तेज गती से बढाने में पिछड़े राज्यों और गांवो में शिक्षा और जागरुकता का निचला स्तर एक बहुत बडा कारण रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ जनसंख्या आकार को संतुलित करने में सरकार द्वारा किये गये उचित-अनुचित और आधे-अधूरे प्रयासो ने भी जनसंख्या दबाव को बढाने में एक नकारात्मक भूमिका ही निभाई है। देश में बरसो से बहुत सी योजनाये बनाई गईं और जाती रहीं हैं, और इसको सफ़ल रूप देने के लिये भारीभरम रकमों के बजट भी निरंतर आवंटित होते आये हैं पर इन बडे-बडे बजटो का उचित रूप से सही जगह पर इस्तेमाल हो पाया है या नही या यह रकम अपने उचित स्थान पर खर्च होने के बजाये आधे रास्ते में ही हजम कर ली गई हैं या जाती रही है, शायद इसका जवाब आज लाख ढूंडने पर भी मिलना मुश्किल है। जे० एस० कोष के आंकड़ो पर अगर नजर डाली जाये तो वाकई चौंकाने वाले तथ्य से सामना होता है। क्योंकि तथ्यों से पता चलता है कि जनसंख्या जिस तेजी से बढ रही है अगर उस तेजी से ही बढती रही तो सन 2026 तक भारत की 120 करोड जनसंख्या में करीब 271 मिलियन यानी 27 करोड़ ज्यादा जनसंख्या शामिल हो जायेगी। आज भारत को जनसंख्या की तीव्र गती को थामने के लिये गंभीर होने की जरूरत है और बहुत से नये और मजबूत उचित उपाय खोजते हुये स्वार्थ को अलग रखकर सिर्फ़ राष्ट्रहित के लिये सोचते हुये प्रयासो को एक सफ़ल अंजाम तक ले जाने की जरूरत है। जे० एस० कोष के तथ्यों के अनुसार कुल 53 प्रतिशत लोग ही गर्भनिरोधक का उपयोग करते हैं। वर्तमान में जनसंख्या ने अपने आकार को तिव्रता से बढाकर कितना विक्राल रू्प धारण कर लिया है इसका आभास आसानी से हो रहा है। क्योंकि जनसंख्या का दबाव भारत को आर्थिक समस्या से आज भी उबरने नही दे रहा है।       

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Filed under मेरी आखों से....., need for aware, Society in modern India

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