हर पल खेला जाता है राजनीतिकरण का खेल


 व्यवस्था परिवर्तन की उम्मीद लिये राजनेताओं का मुह तकता बेबस आमजन

कहने को हमारे देश में राजनेता का दायित्व आम जन के हित के लिये काम करना होता है। पर देश में वर्तमान में जिस प्रकार के हालात बनते दिख रहे है उसको देख कर तो ऐसा लगता है कि बस हमारे राजनेता किसी तरहं अपनी-अपनी रोटी सेखने पर लगे हुये हैं। कभी कोंग्रेसी दल अपना पलड़ा  भारी करने में लगा दिखाई देता है तो, कभी भाजपा दल तो, कभी कोई अन्य दल अपने आगे किसी दल को देख, बस किसी तरह सबसे आगे होने और पाक-साफ़ बनने का ढोंग करता दिखाई देता है।

राहुल गांधी सत्ता को बचाने का एक मात्र सहारा

हम इस बात को बखूबी जानते हैं कि राहुल गांधी भ्रष्टाचार में लिप्त हमारी केंद्र सरकार पर लिपटी कालिख पर सफ़ेदी पोतने के लिये जैसे ही भट्टा-पारसौल गांव में किसानो का वोट बैंक बनाने धरने पर बैठे, वहीं देश की सभी राजनैतिक दलों में ऐसा अस्तित्व के खत्म होने का डर फ़ैला कि चारो तरफ़ से राजनेताओ के धरने-प्रदर्शनो और बयानबाजीयों की ऐसी बारिश हुई कि भट्टा-पारसौल प्रकरण का लगभग सभी राजनैतिक दलों ने कब राजनीतिकरण कर दिया, इसका अंदाजा भी नही लगाया जा सकता था। अब विचारने वाली बात तो यह है कि अब जब भ्रष्टाचार के विरोध में अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ने समाज की तरफ़ से अवाज बुलन्द की तो हमारी यूपीए सरकार भ्रष्टाचार को देश से खत्म करने के बजाये अपनी सत्ता को किसी तरहं बरकरार रखते हुये असल मुद्दे से फ़िसल कर  कभी अन्ना को राजनैतिक मुखोटा साबित करने पर तुली हुई है तो कभी रामदेव बाबा को।

ANNA HAZARE

रामदेव

यहां एक सवाल उठता है कि अखिर कोंग्रेस सरकार अन्ना और रामदेव के “भ्रष्टाचार खत्म करने” जैसे मुद्दो को नजर अंदाज करते हुये क्यों बार-बार राजनैतिक मुखोटा साबित करने के लिये डुगडुगी बजा कर जनता को सुनाना चाहती है। यूपीए सरकार के राजनेता क्यों भूल जाते है कि मुद्दा “सत्ता को पाक-साफ़ बता कर बचाना या राजनीतिक मुखोटा बताकर जनता का ध्यान भटकाना नही बल्कि भ्रष्टाचार को मिटाना” है?
अजीब बात तो यह है कि यूपीए सरकार के राजनीतिज्ञ भ्रष्टाचार में लिप्त सरकार के दामन पर लगे दाग को मिटाने के लिये इस कदर महनत कर रहे है कि उन्हे कुछ सूझ भी नही पा रहा कि किस वक्त क्या बोला जाये और जो भी बयानबाजी वें कर रहे हैं वह वाकई सही है या उसका कोई आधार ही नही।

Kapil Sibbal

Diggi

अब देखिये सरकार के राजनीतिज्ञ विपक्षी दल भाजपा के लिये कह रहे है कि वें कोंग्रेस के खिलाफ़ दुष्प्रचार कर रहे हैं यह कहकर कि कोंग्रेस सरकार पूरी तरहं भ्रष्टाचार में लिप्त है। यहां तक की सरकार के राजनीतिज्ञ की तरफ़ ये भी बयान आ रहे हैं कि भाजपा बीच में लड़ाई कराने का काम करती है और वे भी भ्रष्टाचार में लिप्त है। जहां भाजपा और अन्य दल यूपीए सरकार के खिलाफ़ आधार हीन बयान बाजी कर रहे है, तो वहीं यूपीए सरकार भी उनके खिलाफ़ बेफ़िजूल की बयान बाजी करने से नही चूक रही।
अन्न और बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को एक जरिया बनाकर लगभग  सभी राजनैतिक दल जन समाज में अपनी रूची को साबित करना चाह रहे हैं। राजनीति के खेल खेलने वालो को इतना तो कम से कम पता होना चाहिये कि जन समाज के हित के कार्य में रूची उनके एक-दूसरे दलों के खिलाफ़ बेफ़िजूल के अधारहीन बयान देने से जहिर नही होती बल्कि समाज के लिये कुछ कर दिखाने से होती है।
यहां एक विचारणीय सवाल है कि क्या हमारी केंद्र सरकार के राजनीतिज्ञ यह सोचते है कि  अन्ना हजारे और बाबा रामदेव को राजनैतिक मुखोटा कहने जैसी आधारहीन बयानबाजी एक दुष्प्रचार नही है? आखिर राजनैतिक मुखोटा बताकर जनता का ध्यान अहम मुद्दे से हटाकर पूरे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का राजनीतिकरण क्यों किया जा रहा है? कुल मिलाकर जिस प्रकार हर घटना का राजनीतिकरण होता आया है और जिस तरहं भट्टा पारसौल प्रकरण का राजनीतिकरण हुआ, ठीक उसी प्रकार अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार विरोधी मूहिम का भी हमारे राजनेताओं ने राजनीतिकरण कर ही दिया। अब परिणाम के रूप में देखा जाये कि इस खेल में आम समाज को क्या मिला तो यही समझ आता है कि आज भी आम समाज पहले कि तरहं बेबस वहीं खड़ा होकर व्यवस्था परिवर्तन होने का सपना आंखो में लिये राजनेताओं का मुंह तक रहा है!

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Filed under need for aware, Society in modern India

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