“सोचना होगा महिला-पुरूष दोनो बराबर”


Painting By Ankit Kumar

भारतीय महिला is a painting by Ankit Kumar

सिर्फ़ मान लेने मात्र से कुछ नही होगा महिलाओं को सोचना होगा कि वो भी पुरूषो से कम नही। “आखिर कब मजबूत होगीं महिलाये” … आज के समाज में महिलाओ पर अत्याचार इतने बढ चुके कि जब तक महिलायें स्वयं पूणं रूप से मजबूत नही होगीं तब तक उनके उपर हो रहें अत्याचारो को रोक पाना बहुत मुसकिल सा लगता है। यहां मजबूत होने का अर्थ उपरी तौर से मजबूत होने से मजबूत होना ही नहि बल्कि सोच से भी मजबूत होना है। मै समझता हु कि अगर कोइ महिला या लडकी सोच से मजबूत होगी तो वो ऊपरी मतलब शरीरिक और आन्तरिक रूप से पूरी तरह मजबूत बन पायेगीं।
आज भी जहां “महिला या लडकी” शब्द किसी आदमी के कानो तक पहुचते ही आदमी के दिमाग में ये बाते आती है:
1.लडकी या ओरत.. अकसर लडको के मुकाबले कमजोर होती है। अब चाहे आन्तरिक रूप से कमजोर कहें या बाहरी रूप से या सोच से, 2. लडकीयां घरेलू कामो से हटकर बाहरी काम- काज में कामजोर होती हैं 3. लडकीया ज्यादा देर तक खडे नही रह सकती.. अब चाहे यात्रा करते वक्त कहें या बाहरी काम-काज या रोजगार के क्षेत्र में कहें, आदि-आदि-आदि…….
यहा तक कि शिक्षा के क्षेत्र में भी ओरतो को कमजोर समझा गया है। मै मानता हु कि महिलायें हर क्षेत्र में आगे बढ रही है पर एक सच्चाई ये भी है कि अभी भी आदमी महिलाओ को हर क्षेत्र में कमजोर समझता आ रहा है। ये ऐसी दीमक लगी हुइ सोच को अभी भी दिमाग के किसी न किसी कोने में लेकर घूम रहा है। आज के युवा वर्ग की सोच में पहले के मुताबिक काफ़ी बदलाव देखा गया है| लेकिन युवा इस सोच को ऊपरी तोर से या एक दिखावे के रूप में बेशख निकाल पाया हो पर अभी भी इस दिमक लगी हुई सोच से आज का आदमी या युवा अपने अपको पूरी तरह से दूर नही कर पाया है। इसका अन्दाजा हम आये दिन महिलाओ के शोषणं की खबरो से ही लगा सकते है।

1. आज भी पूरुषो से कम साबित होने के लिये महीलायें काफ़ी हद तक जिम्मेदार:
जहां महिलाओं को आदमी उनसे कमजोर समझता है। वहीं आज महिलाये काफ़ी हद तक अपने आपको पुरूषो से कम साबित करने में कोइ कसर नही छोड रहीं है इसका अनुभव मैने स्वयं किया है: “एक दिन मेने बस में सफ़र करते समय देखा कि। एक महिला बस स्टोप से अपने दो छोटे बच्चो के साथ बस में चढी उस समय बस में ज्यादा भीड तो नही थी लेकिन बस की सभी सीटो पर सवारीयां बैठी हुई थी। वो महिला बस की उस सीट के पास जाकर खड़ी हो गयी जहां दो युवक बठे हुये थे, वो दोनो युवक देखने में तो दिल्ली के कतई नही लग रहे थे.. उन्हे देख कर और उनकी भाषा से ऐसा साफ़ तोर से लग रहा था कि वो दिल्ली की हवा से रूबरू होने कुछ दिनो के लिये अपने गावं से दिल्ली चले आये हों। उस वक्त वो महीला अपने दोनो बच्चॊ को हाथ में थामे थकने का एहसास करते हुये उन दोनो लडको से महिलाओं के लिये रिजर्व शीट का हवाला देते हुये सीट से उठने के लिये कहने लगी पर दोनो युवक दूर जाने का हवाला देते हुये सीट पर से उठने से मना करने लगे..वो भी क्या करते, वों तो दिल्ली की सुविधाओ के बारे में बिलकुल बेखबर थे। तभी एक बीस वर्षिय युवती दूसरे बस स्टोप से बस में चढी और उसी सीट के पास जाकर खड़ी हो गयी और उन ही दोनो युवको में से एक युवक से उठने के लिये बोली पर वो तो युवक थका सा मुह बना के हर बार “जल्दी पहुचने वाले है” कहते हुये उठने से मना करदें.. भला अब वो हट्टी- कट्टि युवती भी बहस करने से कहां रुकने वाली थी। इस बहस को रोकने के लिये विकलान्ग व्यक्ती दूसरी सीट पर से उठ खडा हुआ और उस बीस वर्षीय हट्टी- कट्टी जवान युवती को उस सीट पर बैठने को कह दिया। पर लेकिन अभी भी उससे पहले से अपने दोनो बच्चो को लिये खडी वो महिला अभी भी वही खडी थी…” मैं इस बात से बिलकुल मुहं नही मोड़ता की महिलाओ का यह हक है।.. महिलाओ को हक तो मिलना ही चाहिये अगर इस पुरूष प्रधान समाज में उनका हक अब नही मिलेगा तो कब मिलेगा। पर यहा मैं इस बात की और इशारा करना चाहता हु कि अगर उनके लिये कोई आदमी आगे नही आता है तो “क्या आज की महिलाये इतनी कमजोर हो गयीं?”… अगर कोई उनके लिये आगे नही भी आता है तो क्या वो बिना किसी के सहरे आपनी “आत्मनिभर्ता” के जरीये आगे नही बढ सकती…. क्या उस हट्टी- कट्टी जवान यूवती का बैठना जरूरी था?…. क्या उस यूवती ने ये सोचा था कि आदमी लोहे का और महिलाये मिट्टी के ढेर से बनी होती है?…. माना महिलाआओ का हक उन्हे मिलना चाहिये पर जरूरतमन्द और गैर-जरूरतमन्द भी कोइ होता है… क्या उस बीस वर्षीय आज के युग की युवती की सोच बस यहीं तक थी कि उस दोनो बच्चो को थामें महिला से ज्यादा वो खुद जरूरतमन्द है?….. क्या वो युवती अपनी जगांह पर उस जरूरतमन्द महिला को नही बैठा सकती थी?…. या आज की यूवती ये सोचती है कि अगर किसी ने या कोई आदमी उसका साथ नही देगा तो उसको अपनी मन्जिल तक पहुचने में बहुत मुशकिले होगीं?…… महिलाओ को अपनी सोच से ये निकाल फ़ैकंना होगा की वो पुरूषो से एक एक रत्ती भर भी कम होती है। तभी इस पुरूष प्रधान समाज को महिला के उनके असली रूप की पहचान होगी… तब जा के उनको समाज में जो प्रतिष्ठा मिलनी चाहिये वो मिल पायेगी।

2. “लैडीस फ़र्स्ट” के पीछे की उपज को होगा जानना:
आज के युग का आदमी महिलाओ के सामने “लैडिस फ़र्स्ट” वाक्य का उपयोग करते हुये अकसर देखा गया है। और महिलाये भी इस वाक्य को सुन कर अकसर ये समझ लेती है कि सामने वाला व्यक्ति उन्हे काफ़ी सम्मान दे रहा है। लेकिन इस वाक्य के पीछे छुपी हुई आदमी की मानसिकता को किसी ने जानने प्रयास नही किया। क्या कभी किसी महिला ने बोलने और सुनने में सुन्दर लगने वाले वक्य “लैडीस फ़र्स्ट” के पीछे आदमी की मानसिकता को जानने की कोशिश की?… अगर नही कि तो क्यों नही की?… क्या आज की महिलाओ को वास्तविक्ता से दूर भ्रम में जीना ज्यादा पसन्द हैं?…. क्या आज के वर्तमान समाज में भी महिला आदमी की फ़ितरत से बिलकुल बेखबर हैं?…. आज के आदमी के लैडिस फ़र्स्ट वाक्य के पीछे की मानसिकता ये है कि आज भी आदमी महिलाओ को अपने से कम ही समझता है तभी तो वो महिला को सबसे पहले आने को कहता है। और जहां आज कोइ बाहदुरी की बात होगी तो स्वयं आगे आ जाता है। मैं मानता हुं इस बात से मैरे बहुत से भाई लोग निराश होगें पर ये बात एक सच्चाई हैं और मेने इस सच्चाई को मानने से बिलकुल मुह नही मोडा। मुझे पता नही कि में सफ़ल हुआ की नही लेकिन मेने इस सच्चाई को अपनी सोच से समाज के सामने रखने की कोशिश की हैं। हम कितना ही कह लें कि आज वर्तमान युग में देश के हर एक स्त्री- पुरूष की मानसिकता में एक नवीनता दिखाई देती हैं पर ये मान लेने मात्र से ही इस पुरूष प्रधान कहे जाने वाले समाज में स्त्री की भूमिका सुधर नही जायेगी। आज के ही समाज में एक ऐसी घटना (सन 2010)  पिछले साल सामने आयी थी। जिससे मानसिकता में नवीनता वाली बात एक भ्रम साबित होती है: मध्य प्रदेश के एक जिला अलिराजपुर में एक महिला केलबाई का कुछ लोगो द्वारा अपहरण कर लिया गया एक सप्ताह में किसी तरह केलबाई अपहरण करने वालो के चन्गुल से जैसे- तैसे जान बचा कर वापस अपने पती के घर पर पहुची ये सोच कर कि शायद उसे सही सलामत देखकर उसके परिवार वाले और गावं वाले खुश हो जयेगें पर उसकी ये सोच गलत तब साबित हो गयी जब उसके ये खबर गावं के दो-चार दीमक लगी हुई सोच और अपने आपको गावं के पचं कहने वाले लोगो ने ये घोषणा करते हुये कि “इतने दिन किन्ही दूसरो के पास रहने के बाद ये महिला कैसे अपने परिवार और पति के साथ जीवन व्यतीत कर सकती है” उस बैचारी- लचार महिला को दर्दनाक तरिके से पीटने के बाद उसका सर मूण्ड डाला। और गावं की सारी महिलाये, युवां, और गावं के सभी लोग इस दर्दनाक द्र्श्य को मूक बने हुये देखते रहे। ये घटना एक उदाहरण मात्र है। ऐसी कितनी महिलाये होगीं जो पुरूषो के हिन्सक व्यावारो से शोषित की गयी होगीं और की जा रही होगीं और पुरूषराज समाज ऐसे ही मूक बने हुये देखता होगा। क्या यही है आज के नवीन मानसिकता वाले समाज की तस्वीर?… क्या उस महिला की जगाहं कोई पुरूष होता उसे भी अपहरण से छूटके वापस आने के बाद उसके परिवार से बैदखल करके पीटा जाता?….. क्या समाज में महिलाओ पर हो रहे अत्याचारो का वर्तमान के युवां विरोध ना करने में अपने उपर गर्व का अनुभव करते हैं?… क्या हमारे समाज की महिलायें इतनी ह्र्द्यहीन और कमजोर है कि पडोस की महिला को ऐसे ही पिटते देख उसका डट कर विरोध भी नही कर सकती?….. अगर आज की महिलाये आपने आपको पुरूषो से कम नही समझती तो फ़िर वो पुरूष के हर हिन्सक व्यव्हार का डट के सामना करते हुये उसका विरोध क्यों नही करती?…… ऐसे तमाम सवाल वर्तमान समाज के उपर मन्डराते नजर आते हैं। इन सवालो का जवाब आज हम खोज ने की कोशिश करें तो इस पुरूषराज समाज में महिला की एक वास्तविक तस्वीर हमारे सामने मदद की गुहांर लगाते हुये नजर आ जायेगी। शायद कम से कम तब तो आज के पुरूष को शर्म आ जाये…..।

3. पुरूषो को महिलाओ के प्रति बदलनी होगी अपनी सोच:
आज भी पुरूष महिला के प्रती वही पुरानी सोच को कहीं न कहीं अपने दिमाग के किसी कोने में रख घूम रहा है । इसका अन्दाजा हम इस घटना से लगा सकते है : उत्तर-प्रदेश के बरेली नगर में ट्राफ़िक डिपार्टमेन्ट की एस० पी० कल्पना सक्सेना को खुद पुरूष पुलिस अधिकारीयों ने तब पीट दिया जब उन पुलिस अधिकारीयो को एस० पी० कल्पना जी ने बिना वर्दी अपनी नीजी कार और ड्रराईवर के साथ जाकर अवेध वसूली करते हुये सरे आम पकड़ लिया। इस घटना को सुनकर तो कतई नही लगता कि आज के समाज के पुरूष की सोच में नवीनता आ रही है और वे अपने और महिला के समान अधिकारो को रत्ती भर भी समझते हैं। पुरूषो को महिलाओं के प्रति अपनी इस सोच को बदलना होगा कि महिलां पुरूष से माहिला किसी भी रूप से कम होती हैं या जो भी पुरुष करते हैं वो सही। और जो भी महिलायें करती है वो गलत होता हैं। “क्या पुरूषो के हिन्सात्मक व्यावहारो का कड़ा विरोध ना होने के कारण उनकी यें आदत बन चुकी है?…. ऐसे तमाम सवाल सामने आकर उनके उत्तर खोजने के लिये मुहं चिढाते हुये नजर आते हैं।

4. ऐसा गिने-चुने बार हुआ होगा कि किसी महिला ने अपने पती का त्याग कर दिया या एक महिला ने किसी पुरूष को पीटा हो और सरे आम बे-इज्जत किया हो। पर ये अकसर और हमेशा सुनने में आता है कि किसी युवक या पुरूष ने महिला को सरे आम छोटी से छोटी बात पर पीटा और बे-इज्जत किया हो। यहां तक की वर्तमान युग में पुरूष स्त्री की हत्या जैसे घिनोने अपराध को करने से भी नही चूकता।

5. अन्त में, मै यही कहुगां कि आदमी और स्त्री दोनो ही खुदा या प्रक्रति की देन हैं। और दोनो को प्रक्रति ने समाज में समान अधिकार दिये हैं तो पुरूष केसे महिलाओ को उनके भाग्य से या समाज में उनके अधिकारो से वचिंत कर सकता है?… आज के युग में नवीन सोच तभी पनप पायेगी जब महिला और पुरूष समाज में एक दूसरे को सम्मान दें और एक दूसरे के अधिकारो को बराबर का समझते हुये जीवन व्यतीत करें।

WRITTEN BY:
Anil Kumar
contact no: 9968322105
Email: ankilkumar8951@gmail.com
Blog: http://www.anilkumar89.wordpress.com

Advertisements

Leave a comment

Filed under Society in modern India

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s