पुरुष-सत्तात्मक शक्ति के खत्म होने का डर सता रहा विश्व में


महिलाओं संघर्ष जारी रखना होगा समाज में उचित जगहां पाने के लिये….

पाकिस्तानी विदेश मंत्री हीना रब्बानी खा

महिलाओं का तिरस्कार और उपेक्षा
हमारे देश में ही नहीं पूरे विश्व में किया जाता है| भारत देश हमेशा से ही पुरुष  प्रधान देश के नाम से जाना गया है| भारतीय समाज प्राचीन समय से ही एक ऐसी गाथा को बयाँ करता आया है जिसमे पुरुषो ने हमेशा से ही महिलाओं की सीमाए बांधनी चाहि और उनको अपनी रचित परिधि में ही रखना चाहा है| इस परिक्रिया को अगर प्रारंभ में ही स्थगित या खत्म कर दिया जाता तो शायद महिलाये अपनी पूर्ण स्वतंत्रता को शीघ्रता से पा लेती, लेकिन आज पुरुष मानसिकता वाली इस परिक्रिया को दशको बीतने के बाद पुरुष प्रधानता की मानसिकता को पुरुष समाज अपने मस्तिष्क के किसी कोने में लिये बरसो के समय अंतराल से गुजरा है, जिसका रिजल्ट यह रहा कि “पुरुष ही सर्वोपरी” वाली सोच पुरुष के मस्तिष्क में मजबूती से घर कर गयी या कहना गलत न होगा कि पुरुष को अब अपने आपको महिला का कर्ताधर्ता या सर्वेसर्वा समझते रहने की आदत हो गयी है।

  अब जब वर्तमान में, पूरे एशिया में परिवर्तन की जो तेज लहर  दौड़ पड़ी है, जिसके कारण महिला, पूर्व-रचित रीत या पुरुष द्वारा निर्मित सीमाओं को पार कर एक स्वतंत्र जीवन जीने के साथ एक लंबे संघर्ष के बाद अपने अधिकारो को पाने के लिये आगे बढकर नये-नये अवसर प्राप्त कर रही है, तो नारी का इस तरहं वर्चस्व और अधिकार बढता देख, अपनी पुरुष-सत्तात्मक शक्ति के खोने के डर से पूरी तरहं विचलित होता नजर आ रहा है पुरुष समाज। आज भारतवर्ष में जिस कदर बलात्कार, महिलाओ की हत्यायें और उनके साथ होती बेकदरी से ही वर्तमान युग के पुरुष समाज की शक्ल साफ़ नजर आ रही है। एक विचारणीय बात है कि सालों बीत चुके हैं लेकिन देश के संसद और विधायिकाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत सीट देने वाले इस कानून को अभी तक अमलीजामा नही पहनाया गया। हर बार महिला आरक्षण मुद्दा बडे ही जोर-शोर से गरमाया, लेकिन हर बार की तरंह यह सिर्फ़ वोट बटोरने का जरिया बनकर रह गया, सही माईनो में कहा जाये तो, महिला आरक्षण कानून को लागू करने पर सही रूप से और निष्पक्षता से कभी अमल किया ही नही गया।

exploited

आज घरेलू महिला अगर अपने अधिकारो की स्वतंत्रता के लिये अपने हक की मांग करती है तो संघर्ष करने पर खुद पुरुष द्वारा पहले तो वह जैसे चाहा वैसे दंडित और शोषित की जाती है अगर इससे भी चेन न आये तो महिला को घर से बेघर करने में पुरुष जरा भी देर नही करता। सिर्फ़ भारत में ही नही बल्कि एशिया में भी पुरुष समाज, महिलाओं का अधिकार क्षेत्र बढता देख विचलित हो उठा है, जिसका एक ताजा उदाहरण पाकिस्तान में एक जमीयत उलेमा ए-इस्लाम पार्टी के प्रमुख नेता मौलाना फ़जलूर की आलोचनात्मक टिपणी है जो उनहोने पाकिस्तान में पहली महिला विदेश मंत्री चुनी गयी हीना रब्बानी खार के लिय की है। अब देखिये मौलाना फ़जलूर ने कहा है कि “एक महिला को यह पद देना एक समझदारी और बुद्धीमत्तापूर्ण फ़ैसला नही है”. अब बताईये अखिर कोई ऊचा पद देना किसी महिला को क्यों समझदारी का फ़ैसला नही है? इससे तो यही मतलब निकाला जा सकता है कि अभी भी देश में ही नही विश्व में भी महिलाओं को पुरुषो से कम ही आंका जाता है।

(एक बहस का प्रश्न है कि- “पुरुष ही सर्वोपरी” मानसिकता को कब निकाल दूर करेगा पुरुष समाज? )

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