ब्लैक इकोनोमी:- काली अर्थव्यवस्था की छांव में फ़ैल रहा है जहर…


India-Black-Money

“ब्लैक इकोनोमी” यह एक जहर की तरह है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था को एक-एक कर लगातार खोकला और कमजोर करता जा रहा है। ब्लैक इकोनोमी यानी काला धन से अर्थ हम उस उपलब्ध “मनी” से लगा सकते हैं जो चौरी-छुपे गलत तरीको द्वारा कमाई जाती है और फ़िर उस रकम को राष्ट्र की नजरो से दूर रखने के लिये तथा “कर” से बचने की कामना लिये कहीं विदेश में स्विस जैसे बैंको में ले जाकर भर दी जाती है, फ़िर चाहे उसके देशवासी ही भूखे क्यों न मर जाये, और खुद उसके देश में बच्चे प्राथमिक शिक्षा तथा समाज को बैरोजगारी की आग में तपते-तपते गरीबी की भट्टी में रहकर ही गुजर-बसर करना पड़े!                
भारतीय काली अर्थव्यवस्था आजादी के बाद से लगातार बढती चली जा रही है। जवाहर लाल नेहरु विश्विधालय के अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर अरुन कुमार के अनुसार 50 के दशक के आस-पास काला धन तेजी से बढते हुये 3% से बढकर 20% पर पहुंच गया। एक मोटे अनुमाने के मुताबिक आज ब्लैक इकोनोमी के क्षेत्र का आकार बढकर औधोगिक और क्रषि क्षेत्र से बढा हो चुका है। प्रोफ़ेसर अरुन कुमार जी के मुताबिक “आज जी०डी०पी का 40 प्रतिशत “ब्लैक इकोनोमी” है” जो(काला धन) एक “ब्लैक हौल” की तरहं हमारी अर्थव्यवस्था को निगलने के लिये तैयार है।आज देश की हालत भ्रष्टाचार जैसी भयंकर बिमारी से इस कदर खराब हो चली है कि समाज में रह रहा आम जन कुछ भी सरकारी सेवाओं का लाभ पाने और उन सेवाओ के जरिये आगे बढने की आशा ही छोड बैठा है। अगर “ट्रांस्पेरन्सी इंटरनेशनल ग्लोबल करप्शन बायोमीटर” की 2007 रिपोर्ट पर नजर डाली जाये तो यह चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं कि 25% से 30% व्यक्तियों ने सरकारी सेवाओं पाने के लिये रिश्वत दी, पिछले तीन साल में यह आकडा कितना विशाल हो गया होगा इसका आभास बढते भ्रष्टाचार से लग ही गया है और इसके अलावा हर पांच में से चार व्यक्ति राजनीति को पूरी तरहं से भ्रष्ट समझते है।

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आज जिस प्रकार भ्रष्टाचार हमारी अर्थव्यस्था को खोकला करता जा रहा है इसका अंदाजा आजकल चल रहे माहोल को देखकर लगाया जा सकता है। उपरोक्त आकडे साफ़ बयांन कर रहे है कि “राजनीतिक क्षेत्र” अपने बढते भ्रष्ट आचरण के कारण आम आदमी के दिमाग में एक तुच्छ और भ्रष्टाचार रूपी कीचड़ के रूप में जड़ कर गयी है। इससे युवाओं की मानसिकता पर क्या प्रभाव पड़ा है यह जग जाहिर है। देश के लगभग 60 करोड युवां राजनीतिक क्षेत्र से लगातार दूर भागते जा रहे हैं। कर चौरी करके बाहर विदेश में जमा करने की जो एक भ्रष्ट प्रथा सी चल पड़ी है उससे देश को भारी-राजस्व का नुकसान तो झेलना पड़ ही रहा है इसके साथ बैरोजगारी और गरीबी जैसी समस्याओं से भी भारतीय अर्थव्यवस्था को गुजरना पड़ रहा है वो अलग!
प्रोफ़ेसर अरुन कुमार जी ने अपने लेक्चर के दैरान जो बात कही कि “अगर सरकार चाहे तो भ्रष्ट आचरण करने वालो को चंद दिनो की जांच-पडताल करके पकड़ा जा सकता है” यह बात बिलकुल सटीक ठहरती है ..पर वास्तव में देखा जाये तो ब्यूरोक्रेट्स और सरकार तथा हमारे नेता ऐसा चाहते हों ऐसा कतई नही लगता। “हसन अली” जो राजनेताओ और कारोबारीयों के पैसो को अपने देश से दूसरे देशो में बैंको में ले जाने का काम करता था, उसने बड़े-बड़े लोगो का नाम लिया परंतु उन नामो पर गौर न करते हुये बल्कि उस पर पर्दा डालने की कोशिश की गयी। प्रोफ़ेसर अरुन कुमार ने अपने लेक्चर के दौरान एक उदाहरण देते हुये कहा कि पोलिटिक्स में आने के बाद इलेक्शन जीतने के बाद कई राजनेताओ का खर्चा हजारो से बढकर एकदम 1 करोड 29 लाख हो गया। देश की न्याययिक व्यवस्था इतनी शीथिल रूप से चलती है कि आज के टाईम में करीब 3 करोड केस यूं हीं फ़ाईलो में दबे हुये हैं। देश की न्याययिक प्रक्रिया कि ऐसी स्थिति सरकारी व्यवस्था का पूरी तरह भ्रष्ट होने से है या न्याय भी अब पैसो वालो को मिलेगा यह कहना कठिन है, पर भ्रष्टाचार और करचौरी करने वालो ने देश के साथ धोखा तो किया ही है साथ ही अर्थव्यवस्था को कमजोर भी बना दिया है यह कहना अतिश्योक्ति न होगी। आज देश का कितना पैसा विदेशी बैंको में जमा है इसका सटीक अंदाजा लगा पाना कठिन है पर कुछ आंकड़ो पर अगर विश्वास कर लिया जाये तो आज देश का लगभग 400 लाख करोड भारी-भरकम पैसा विदेशो में जमा है।  बेहद धीमी सरकारी कार्यवाहीयों के चलते यह अंदाजा लगा पाना कठिन है कि विदेशो में जमा काला धन देश वापस लाने के साथ कर चौरी करने वालो को कब तक सजा मिल पायेगी और इसके अलावा गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले जिनके बच्चे भूखे तड़प-तड़प कर मर जाते है उनको कब तक न्याय मिल पायेगा इसका उत्तर खोज पाना बहुत मुश्किल है। एक तरफ़ करीब 30% -35% लोग गरीबी रेखा से नीचे जी रहे है जिन्हे आज 2400 केलरी भी नसीब नही होती है वहीं दूसरी तरफ़ मंत्रलयों स्तर पर किस प्रकार लापरवाही से पैसा लुटाया जाता रहा है इसका अंदाजा करने के लिये अगर पिछले साल 2010 जुलाई के महिने के दौरान “दैनिक भास्कर” में छपी एक रिपोर्ट पर नजर डाली जाये तो पता चलता है कि एक साल की अवधि के दौरान कैंद्रीय स्वास्थ मंत्रालय ने 94 लाख रुपय केवल नाश्ने पर ही खर्च कर दिये, जो प्रधानमंत्री जी के कार्यालय से करीब आठ गुना ज्यादा है। वर्तमान में देश की अर्थव्यवस्था के जो हालात सामने उभर कर आ रहे है उससे साफ़ अंदाजा होता है कि अगर कालेधन और भ्रष्टाचार जैसी गंभीर समस्याओं को खत्म करना है तो एक गंभीर चिंतन के साथ चौगुनी महनत के साथ प्रयास करने की जरूरत है, यही समय की मांग है।  

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Filed under need for aware, Society in modern India

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