राजनीति क्यों


prof. Yogendra yadav

“राजनीति क्यों” का अगर उत्तर खोजा जाये तो ये ही कहा जा सकता है कि एक अर्थव्यवस्था को ठीक तरहं से संचालित करने के लिये राजनीति बेहद जरूरी है। राजनेता ही समाज की समस्यांओ का निवारण करने में बेहद महत्पूर्ण भूमिका निभाते हैं। पर यहां प्रश्न उठता है कि आज देश में जिस तेजी से भ्रष्टाचार अर्थव्यवस्था की जड़ों को खोकला करता जा रहा है उसकी भी तो जड़े कहीं न कहीं राजनीति से ही जुड़ी हैं, तो क्यों राजनीति जरूरी है? वहीं दूसरी तरफ़ तथ्य यह भी है कि इस लोकतंत्र में राजनीतिक अखाड़े के पहलवानो को भी तो हम यानी समाज ही चुनता है? अगर हम वास्तविकता की तरफ़ रुख करे और थोड़ा गहराई से विचार करे तो साफ़ पता चलता है कि  कहीं न कहीं दोष हमारा है। यहां विचारणीय बात है कि भ्रष्टाचार को बढावा देने के लिये राजनीति जितनी जिम्मेदार रही है उससे कहीं ज्यादा कार्य-नीतियों और कार्यप्रणाली में मोजूदा दोष जिम्मेदार हैं। आईआईएमसी दिल्ली के सभागार में प्रोफ़ेसर योगेन्द्र यादव जी ने जो बात कही कि “देश की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता ही नही है” जिससे कोन-कोन सी योजना में भ्रष्टाचार कब, कहां और किसके द्वारा हो जाता है कुछ पता ही नही चलता।

Curruption

योगेंद्र यादव जी की पारदर्शिता ना होने वाली बात बिलकुल एक ऐसे प्रश्न को उजागर करती है जिससे एक सच्चाई से पर्दा सा उठता दिखाई देता है। प्रोफ़ेसर योगेंद्र यादव जी ने एक विश्लेषणात्मक तथ्य को सामने रखते हुये कहा है कि देश किसी योजना का “निर्णय लेने” और “कार्य संचालित होने” दोनो के बीच एक बहुत चौड़ा अंतराल है जो भ्रष्टाचार और घपलेबाजीयों को बढाने में कारगर साबित होता है।
यही नही योगेंद्र यादव जी ने बड़ी ही स्पष्टता के साथ इस बात सभागार में बैठे सभी लोगो के सामने रखी कि “निर्णय लेने” और काम करने के बीच में जो भी लम्बा-चौड़ा अंतराल पाया जाता है, उस अंतराल को खत्म करते हुये पूरी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाई जा सकती है। जिससे किसी योजना-परियोजना के निर्णय लेने और उस योजना का लाभ जरूरतमंदो तक पहुंचने के बीच के अंतराल के दौरान जो भी पैसो की लूट-खसौट होती है वह धीरे-२ समाप्त हो सकती है। आज भ्रष्टाचार अपने जिस चरम पर है उसके लिये एक उदाहरण यह कहा जा सकता है कि सरकार द्वारा जरूरतमंदो के लिये खर्च किये गये हर एक रुपये में से केवल दस पैसे ही आम जरूरतमंदो तक पहूंच पा रहे है। लोकपाल बिल लाने और भ्रष्टाचार मिटाने की अन्ना की यह मुहिम आम आदमी के लिये एक उम्मीद लेकर आई है। पर हमारे राजनेता और हमारी सरकार ऐसा चाहते हों, आजकल सरकार के अड़ियल रवये और बौखलाहट को देखते हुये कतई महसूस नही होता।

Prime Minister Of India

अन्ना हजारे द्वारा प्रधानमंत्री को अनशन के लिये स्थल दिये जाने अपील की तो प्रधानमंत्री ने चुस्ती-फ़ुर्ती दिखाते हुये संविधान का हवाल देते हुये कहा कि अन्ना को इससे संबधित अधिकारीयों यानी पुलिस से बात करनी चाहिये.. रिसर्च का विषय तो यह है कि अब इतनी जल्दी हमारे प्रधानमंत्री को संविधान याद आ गये लेकिन यह चुस्ती-फ़ुर्ती तब क्यों नही दिखाई जब 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले अंजाम दिया जा रहा था?… आखिर जब क्यों याद नही आये प्रधानमंत्री को भारत के संविधान?

 

 

इससे आगे भी जारी रहेगा..

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Filed under मेरी आखों से....., need for aware, Society in modern India

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