खेल विधेयक आया तो, भारी पड़ जायेगा!


SPORTS BILL

खेल विधेयक आया तो, भारी पड़ जायेगा! शायद यही सोचा, हमारे मंत्रीयों ने तभी खेल विधेयक को केबिनेट की मीटिंग में हुई विधेयक पर चर्चा के बाद ही अलविदा कह दिया। अब देखिये ऐसी क्या मुसीबते टूट पडतीं, अगर खेल विधेयक इसी संसद सत्र में पास कर दिया जाता। दिल्ली यूनीवर्सिटी से अपना राजनीतिक करियर शुरू करने वाले वर्तमान के खेल मंत्री अजय माकन ने खेल विधेयक का मसविदा राष्ट्रीय खेल दिवस के खास मोके पर इसी संसद सत्र में पास कराने के उद्देश्य से केबिनेट के पास चर्चा के लिये भेजा। कहना न हो कि खेल विधेयक मजबूत विधेयक सा लग रहा है।  क्योंकि इसमें जो प्रावधान दिये गये हैं उससे राजनीतिक हस्तक्षेप खेलों से दूर तो होगा ही साथ ही साथ पूरी कार्यओरणाली में एक पारदर्शिता लाने पर भी जोर दिया गया है। सभी खेल संघो को आरटीआई के दायरे में लाकर अम जनता के प्रति संघो में विराजमान अधिकारीयों को जवाबदेही बनाने के लिये खेल विधेयक में प्रावधान दिये गया है, जिसके बदोलत जनता यह जान सकती है कि आईसीसी, बीसीसीआई, और सभी खेल बोर्ड के भीतर चल रहे मोद्रिक लेन-देन और कामकाज आदी को सही रूप से अंजाम दिया जा रहा है या नही, ऐसे में खेल बोर्डो से जुडे अधिकारीयों के विरोध का बाहर फ़ूटकर निकल आने को स्वभाविक कहा जा सकता है।

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अब सवाल तो यह है कि  एक मजबूत खेल विधेयक अने को लेकर हमारे मंत्रीयों को इतना कड़ा एतराज क्यों हो रहा है? अखिर क्यों नहीं आने देना चाहते कोई भी मजबूत विधेयक? ललित मोदी के कार्यकाल के दौरान आईपीएल-3 में करीब 470 करोड़ के वित्तिय घॊटाले की जो पोल खुली थी, वो सबके सामने है। ऐसे केसे  कोई पूरा विश्वास कर सकता है कि खेल संघो में घोटाले नही होते है। दरसल जिन मंत्रीयो ने खेल विधेयक का विरोध किया है,वे सब कही न कही किसी न किसी रूप में खेल संघो से जुडे हुये है, ऐसे में वे कतई नही चाहेंगे कि वें आरटीआई के दायरे में लाये जाये। कहना अतिश्योक्ति हो सकता है, लेकिन कहने में कोई हर्ज नही कि मंत्री कभी नही चाहेंगे कि उनकी उपरी कामाई कैसे और किन स्त्रोतो से हो रही है वह सबके सामने खुल जाये। खेल विधेयक के प्रावधानो के अनुसार खेल महासंघो में नियुक्त होने वाले पदाधिकारी भी खिलाडी ही होने चाहीये, इस पर भी खासा जोर दिया है। तो इससे साफ़ जाहिर है कि मंत्रीयों द्वारा खेल विधेयक का विरोध करने के पीछे अपने अधिकार क्षेत्र समाप्त होने का भी डर दिखाई देता है।

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गोरतलब है कि बीसीसीसीआई को वित्तीय मामलो में सरकार द्वरा काफ़ी छूट भी दी हुई है। ऐसे में यह संदेह गहरा हो जाता है कि जब बीसीसीआई जैसे खेल नियंत्रक बोडी स्वतंत्र होकर काम क्यों करना और अन्दरखाने चल रहे वित्तीय लेन-देन की जानकारी किसी को देना नही चाहती है? यह एक बहस का प्रश्न हो सकता है। खेल विधेयक में दिये प्रावधानो के अनुसार खेल महासंघो में नियुक्त पदाधिकारीयों की उम्र की सीमाऎं बांधते हुये 70 वर्ष की अधिकतम उम्र अनिवार्य बताया गया है। यहां अगर देखा जाये तो सन 1937  जन्मे जम्मू- कशमीर के पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारुख अब्दुलाह जो इस समय जम्मू-कशमीर खेल संघ की कमान संभाले हुये 70 साल की उम्र को पार कर गये हैं, फ़िर भी खेल संघ के पदाधिकारी हैं।  ताज्जुब की बात तो यह है कि खेल संघो के उच्च पदाधिकारी वें लोग बनते आये है जिनका खेल से दूर तक नाता नही रहा। दरसल फ़ारुख अब्दुलाह जी मेडिकल में एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त हैं, जो खेल से विपरित समझ की ओर इशारा करती है। खेर जो भी हो कुछ न कुछ घपला जरूर है…

विधेयको पर आगे जारी रहेगा…

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Filed under मेरी आखों से....., need for aware, Society in modern India

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