स्टाइल की तरह मानसिकता नहीं बदलती


 स्त्री समाज में तेजी से बदलाव का दौर शुरू हो गया है। शायद यह वही कुलबुलाहट है। इसके बाद का समाज स्त्री-परुष की बराबर हिस्सेदारी का समाज होगा। नारी जागरूक हो रही है। यह भड़कती परिवर्तनरूपी चिंगारी है जिसको जाते-जाते दामिनी ने आगे बढ़ाया। नारी प्राचीन काल से अब तक आजादी की मांग कर रही है।ऐसी आजादी जो उन्हें  प्रताडि़त होने के लिए मजबूर  न करे। 
समाज कुल-बुला रहा है। छटपटा रहा है यह पुरुषासत्तात्मक समाज। वही समाज, जिसने पैदा होते ही स्त्री को नाजुक कहा। वह समाज अपनी छिनती सत्ता को देख अब मचल रहा है। क्योंकि स्त्री जागरुक हो रही है। स्त्री जाति के चारो तरफ नाजुकता का ऐसा तानाबाना बुना कि उसके लिए जीवन शैली भी खुद निर्धारित की और नियम व शर्तें भी। शायद इस बात का पूरा विश्व गवाह है कि जब भारत देश आजाद हुआ तो उसमें भारत के प्रत्येक नागरिक को आजादी मिली थी।
1950 में जब संविधान निर्माण हुआ तो उसमें केवल पुरुषों के लिए ही अधिकारों की स्वतंत्रता शामिल नहीं थी बल्कि इस देश के हर महिला-पुरुष के अधिकारों की सुरक्षा का ताना-बाना बुना गया था। लेकिन इन तथ्यों को झुठलाकर महिलाओं के लिए अलग से नियम कायदे पुरुषों ने खुद ही बना डाले।
यह सच है कि अशिक्षित वर्ग इन अत्याचारों का मुख्य कारण है। लेकिन इसकी आड़ में इस सच को भी नहीं झुठलाया जा सकता कि शिक्षा की उच्च सीढ़ियों पर चढ़ने वाला पुरुष खुद भी आज अपनी मानसिकता को अपने स्टाइल की तरह विकसित नहीं पा रहा है। जिसका सबूत बदलते दौर में बढ़ते अपराधों में मिलता हैं। आज राजधानी ही नहीं, प्रत्येक राज्य में महिलाओं की सुरक्षा खतरे में है। तथ्य बता रहा है कि गत वर्ष दिल्ली में हर दिन करीब दो बलात्कार हुए हैं। जो सुरक्षा में लगे मेहनत करने का दम भरने वाले हजारों पुलिस अधिकारियों की पोल खोल रहा है।
आजादी से लेकर अब तक महिला सुरक्षा के लिए न जाने कितने हजारों संकल्प लिए गए।
परिणाम सफलता के स्थान पर बलात्कार जैसे बढ़ते अपराध हैं।
“जिस देश में ईश्वर का नाम जपने वाले न जाने कितने लोग हैं जो मन में भले ही देवी को पूजते हों लेकिन व्यवहार में उसके ही रूप बतलाए जाने वाले स्त्री के साथ विपरीत व्यावहार करते हैं। एक तबके के अपराधी समाज में नाबालिग बच्चों तक के लिए तरस नाम की भी कोई चीज नहीं”।
समाज में महिलाओं की उपेक्षा व प्रताड़ना से कई महिलाएं अपना मानसिक संतुलन भी खो देती हैं। यहीं नहीं इतना प्रताड़ित होने पर जब वह अपने मानसिक संतुलन भी खो देती हैं तो भी उसके साथ बर्बरता बरकरार है। देश में ऐसे कई उदाहरण हैं कि मानसिक रूप से विक्षिप्त महिलाएं भी शोषण का शिकार हुई हैं। तथ्यों पर नजर डालें तो राजस्थान की सबसे सुदंर नगरी उदयपुर। झीलों के लहरते जल और खूबसूरत हरियाली का चादर और अरावली पर्वत माला से सजे इस शहर की सूरत पर कुछ दाग भी हैं। पिछले वर्ष एक के एक दो से तीन ऐसे प्रकरण सामने आए जो विक्षिप्त महिलाओं से जुड़े थे। इन विक्षिप्त महिलाओं की मानसिक कमजोरी का फायदा उठाते हुए न जाने किस-किस ने उनका शारीरिक शोषण किया। जब उनका सड़क पर ही गर्भपात हुआ तो यह मामला प्रकाश में आया था। इससे पहले तक समाज ने इन्हें आश्रय देना भी मुनासिब नहीं समझा। अब सवाल है कि इसके लिए केवल वही समाज जिम्मेदार है जो इन महिलाओं को प्रताड़ित व बलात्कार करता है, क्या मूक बन देखकर अनदेखा कर देने वाले समाज को भी जिम्मेदार माना जाए।

आज बेटी के पैदा होते ही उसके भरण-पोषण से पहले सुरक्षा के बारे में सोच लिया जाता है। जबकि इस पर जोर नहीं दिया जाता कि इसकी असुरक्षा के वातावरण का जिम्मेदार कौन है। बल्कि जरूरत यह है कि पुरूष-महिला को बराबर समझने वाली पीढ़ी को आगे बढ़ाया जाए, जो एक दूसरे के आत्मसम्मान की सुरक्षा में बारबरी के हिस्सेदार हों।

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