My research….. Copyrighted:- मानसिकताओं में सुधार होना जरूरी, नही तो… करना पड सकता है सात शताब्दी इंतजार

“14वी से 15वी शताब्दी के आस-पास के यूरोप और आज के भारत में समानताये (भारत का विकास क्रम कहीं 14वी और 15वी के आस-पास की सीढीयों के बीच में अटका तो नही?)

“मानसिकताओं में सुधार होना जरूरी नही तो… करना पडेगा सात सताब्दी इंतजार”

आज के भारत और 14वी से 15वी शताब्दी के आस-पास के यूरोप में समानताओ से मेरा तात्पर्य एक समान घटित घटना या किसी एक समान गतिविधियों से नही बल्कि दोनो युगो की मानसिकताओं,व्यावहारो,योग्यताओ, अवधारणाओं और सोचने-समझने आदी से है।

“क्या आज के भारत और 14वी से 15वी शताब्दी के यूरोप में समानतायें है? अगर सामनतायें हैं तो किस प्रकार आज का भारत उस समय के यूरोप से समानताये रखता हैं?” यें दोनो सवाल ऐसे हैं जिन्होने मुझे इनके उत्तर खोजने को मजबूर किया। क्योकिं ये ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब खोजने में मै शायद पूरी तरह सफ़ल ना हो पाऊं क्योकिं मै कोइ इतिहासकार या फिलोसफ़र नही पर इन दोनो सवालो के उत्तर खोजते हुये अपनी सोच- समज, अपने अध्यापको द्वारा सिखाये गये ज्ञान, वर्तमान समाज में घटित हो रहें व्यावहार के दर्पण को देखने बाद, अपने स्वयं द्वारा जा कर सर्वे करने के बाद तथा किताबो से जितना मैं ज्ञान प्राप्त कर सकता हु आदी उसके बल पर मैं इन सवालो के जवाबो का एतिहासिक शब्दो का प्रयोग ना करते हुये आम भाषा में विचारात्मक विशलेषण करने का पूरी तरहं प्रयास करुगां। मैं ये स्वीकार करने से बिलकुल इनकार नही करता की आज के भारत और 14वी से 15वी शताब्दी के यूरोप में असमानतायें भी है। लेकिन जितनी भी समानताये हैं उनके आधार पर विषलेशण के दोरान ये देखने की कोशिश की जायेगी की आखिर कब तक आज का भारत एक विकासशील गरीब देश की तरहं युं हीं विकास के क्रम को धीमी गती देते हुये आगे बढने का प्रयास करता रहेगा?

आज के भारत और उस समय के यूरोप (उस समय के यूरोप का मतलब है -14वी से 15वी शताब्दी के आस-पास का यूरोप) मे समानताओ की अगर बात की जाये तो मुख्य रूप से तीन समानताये सर्वप्रथम सामने आती है एक, अन्ध्विश्वाश, दूसरी, तर्क का इतना प्रबल न होना कि दीर्घकालीन रूप से किसी विपरित परिस्थितियों से लड सके। और तीसरी, उस समय महिला की स्थित में सुधार तो देखा जा रहा था पर इतना नही देखा जा रहा था कि जिससे वें अपनी तर्क शक्ति के के बल पर उनके उपर हो रहे अत्याचारो का ठीक से विरोध कर सके। वैसे तो बहुत सी सामानताये उस समय के यूरोप और आज के भारत में खोजी जा सकती है पर पहले मुख्य तीन समानताओं का विशलेशण करना उचित होगा।

1.अन्धविशवास को मध्य रखते हुये समानतायें

14वी शताब्दी के यूरोप में फ़ैले अन्धविशवास की अगर बात की जाये तो यही निष्कर्ष निकल कर सामने आता है कि 14वी शताब्दी के आस पास यूरोप में रह रहे लोगो की मानसिकताओं मे इस कदर “अन्धविशवास” की भावना प्रबल हो चुकी थी कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी गम्भीर से गम्भीर समस्याओं का निदान सिर्फ़ तान्तरिको के सफ़ेद और काले जादू और जदू-टोनो, ताबीजो आदी द्वारा ही मानता था। काले जादू से तात्पर्य टोने, टोटको द्वारा किसी विपरित प्रतीस्प्रधी को नुक्सान पहुचाने से हो सकता है। या किसी को भी अपने को लाभ पहुचने के उद्देश्य से नुक्सान पहुचाने से हो सकता है। और अगर सफ़ेद जादू या टोने- टोटकों की अगर हम बात करें तो जो भी जादू जैसी भ्रामक क्रिया जब किसी लाभ की प्राप्ति के उद्देश्य़ के लिये उपयोग में लायी जाती हैं तो उसे सफ़ेद जादू की संज्ञा दी जा सकती है। अनेक इतिहासकारो तथा श्री देवेश विजय द्वारा भी अपने एक लेख “बदलती मानसिकताओं” में मानना है की 14वी शताब्दी के आस पास यूरोप में तान्तरिक और जादू टोनो करने वालो का बोलबाला था तथा सभी लोगो का एक अटूट विशवास जादू, टोने, टोटकॊ तथा मन्त्र पढे हुये ताबीजो जैसी भ्रामक क्रियाओ पर ही था। तान्त्ररिक बाबा यूरोप में लोगो की अन्ध श्रध्दा का फ़ायदा उठाने से जरा भी चूकना नही चाहते थे और लोगो की इस प्रकार की अन्ध श्रध्दा के कारण तान्त्ररिक बाबाओ का इस हद तक आत्म विशवास बढ चुका था की जादू, टोने करने वाले तान्त्रिक लोगो ने तर्क के आधार पर ये दावे भी करने शुरू कर दिये थे कि वे शिशुओ के लिगं का पहले ही पता लगा सकते हैं या ज्यादा चर्चा न करते हुये हम कह सकते है कि जादू, टोने करने वाले तान्त्रिक लोगो ने तर्क के आधार पर लोगो की हर समस्या को हल करने के दावें पेश किये। धीरे- धीरे यूरोप में तान्तरिको को समाज का एक बढे आकार में विशवास को जीत लिया था। ये जरूर कहा जा सकता है कि अन्धश्रध्दा रखने वालो में कूलीन वर्ग या ऊचें स्तर के लोगो के मुकाबले, निचले स्तर के लोगो की सख्यां ज्यादा थी। पर इस बात को भी नाकारा नही जा सकता की कुलीन वर्गो या ऊचें स्तर के लोग भी अन्धविशवास रखते थे।
अगर हम बात करें की भारत और उस 14वी शताब्दी के आस पास यूरोप में क्या समानतायें थी तो यहां समानताओ के आगे एक बहुत बढी तो नही कह सकते पर एक कठिनाई ग्लोबलाईजेश्न के रूप में हमारे सामने आती हैं। पर एक तरफ़ ये प्रशन उठ खडा होता है की क्या भारत में जो ग्लोबलाईजेशन आया है उस ग्लोबलाजेशन का तात्पर्य सिर्फ़ पहनावे या दिखावटी शब्दो के प्रयोग करने से हैं?…. या आधुनिकता सिर्फ़ शब्दो में और पहनावे में झलकनी चाहिये?… या आज ग्लोबललाईजेशन एक छोटे से दायरें में कहीं सिमट कर रह गया है?… या फ़िर ये कह सकते हैं कि ग्लोबलाजेशन नाम की कोई चीज अभी भारत में आयी ही नहीं है?… इन प्रश्नो के उत्तर खोजते हुये इसका आगे विषलेशण किया जाये तो बहतर होगा क्योंकी अन्धविशवास की समानताओ को बताते हुये ग्लोबलाईजेशन शब्द का शायद विषलेशणं सम्भव ना हो पाये।
आज के भारत का 70% नागरिक ग्रामीणं इलाको में निवास करता है और इसके साथ-साथ आज भारत का लगभग हर वो नागरिक जिसने अपने जीवन की शुरूआत एक गावं से की हैं ये मानने से इनकार बिलकुल नही करता कि आज भी गावों में निवास कर रहे लोग एक अन्धविशवास के सहारे अपना जीवन व्यतीत करने पर मजबूर हैं और अपनी सम्पूणं समस्याओं का निदान जादू- टोनो या अन्धविशवास के सहारे खोजते हैं। यहां ग्रामीण इलाको के लोगो में अन्धविशवास से ये अर्थ बिलकुल नही निकाला जा सकता कि आज के भारत में बडे शहरो में अन्धविशवास खतम हो चुका है। एक उदाहरण के रूप में दिल्ली जैसे शहर को ले ली जीये , आज अगर आदमी दिल्ली की सडको पर तथा सफ़र करते हुये अगर अपनी आखों को चोकन्नी करते हुये चारो तरफ़ दिवारो पर या बसो में सफ़र करते हुये चिपके हुये या यू हीं कही पडे हुये पत्र बहुत सरलता से देख लेता होगा जिन पर तान्त्रिक बाबाओ का किसी भी समस्यां को बहुत आसानी से हल करने का दावा कुछ इस तरहं लिखा होता हैं- “खुला चैलेंज घण्टो में लाभ पायें” या “ग्रहक्लेश,दुश्मन से छुटकारा, मनचाहाप्यार, भविष्य में होगा लाभ या नहीं सब बताया जायेगा बस श्रध्दा के साथ आयें फ़िर लाभ पायें” या “शब्दो के जाल में ना फ़सें यहा हैं 100% गांरटिड हर समस्या का समाधान” या “जब है समाधान तो क्यों हैं परेशान” या बनते काम बिगड रहे है, सोतन से चाहिये छुटकारा या किसी को करना है वश में या चाहिये वशीकरण से छुटकारा, सन्तान उतपत्ति आदी सभी समस्या समाधान तुरन्त और लाभ बस चन घण्टो में पायें”
इन लांईनो को देखते हुये यही कहा जा सकता है कि आज के भारत में अन्धविशवास में कमी नही आयी है चाहे शहरो में अन्धविशवास की बात हो या गावों में अन्धविशवास की। यहा एक सवाल ये उठता है कि क्या अन्धविशवास में कमी आयी हैं?.. अगर आयी है तो कितनी कमी आयी है?.. हां हो सकता है कि कमी आयी हों पर नाम-मात्र की…. कहीं पर भी अन्धविशवास में कमी की गुन्जाईश दिखाई ही नही देती। और शहरो में तथा गावों में फ़र्क करते हुये ये नही कहा जा सकता की शहरो में अन्धविशवास गावों के मुकाबले कम है। हाँ ये जरूर कहा जा सकता है कि शहरो में अन्धी श्रध्दा में अन्तर जरूर है क्योंकि शहरो में जिस प्रकार तर्क के आधार पर किसी भी समस्यां का पूरी तरहं निदान करने के दावें सुनकर एक शहर का पढा लिखा नौंजावान भी बार-बार असफ़लता से टूटने के बाद या किसी समस्यां समाधान लाख कोशिशो के बावजूद न खोज पाने से तंग आकर भ्रामक क्रियाओ जैसे जादू-टोनो में ही अपने समस्या का उपचार ढूढंने के लिये मजबूर हो ही जाता हैं ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार 14वी शताब्दी के आस पास यूरोप में रह रहे लोगो ने चारो तरफ़ से तमाम समस्याओं से घिरे होने के कारण एक शुकून को पाने के लिये तान्त्रिक लोगो के जादू-टोनो के दावो को स्वीकार कर लिया था। एक उदाहरहण के तोर पर देखा जाये तो 14वी शताब्दी के आस-पास इंग्लेण्ड के एक मजिस्ट्रेट जान आबरे ने भी माना है कि उस समय मन्त्रो में अपनी सभी बीमारीय़ॊ य़ा समस्याओ का इलाज ढूंढना,तान्त्रिको से बच्चो का लिगं पूछना आदी जैसा अन्धी-श्रध्दा लोगो की मानसिकताओं में विदमान थीं। यहां तक की उस समय यूरोप के लोगो का ये भी विशवास था कि किसी राजा को छूने मात्र से ही उनकी तकलीफ़े दूर हो जायेगीं। जहां आज इस बात की समानता भी आज के भारत के मनुष्य की मानसिकताओ में बढी ही सरलता से देखी जा सकती हैं। इस पर एक उदाहरण देना पसन्द करूगां कि “स्वामि नित्यान्द” का खुलासा होने से पहले बहुत सुनने में मिलता था तथा गावों में रह रहे लोग ही नही बल्कि शहर के लोग भी उनको इतना पवित्र समझते हुये ये अवधारणा बना चुके थे कि नित्यानन्द या उनके जैसे कई धार्मिक साधूओ को छूने मात्र से ही समस्यायें दूर हो जाती हैं। वो तो रही थी स्वामि नित्यान्द की बात परन्तू में खुद अनुभव करने के बाद क्योकिं में भी एक ऐसे क्षेत्र से दिल्ली जैसे शहर में आया हु जहां अन्धविशवास जैसी क्रियाओ को लोग अपना धर्म मान चूके हैं, ये पूर्णं विश्वास के साथ कह सकता हुं की अगर मुझे सिर्फ़ दो महिने का वक्त देते हुये मेरी बस थोडी सी भी मदद की जाये तो में ये साबित करके दिखा सकता हु कि आज भी भारत में “अन्धविशवास में कमी आयी या खतम हो रहा है” ये एक भ्रम है। अगर इससे ज्यदा विचारा और शोध किया जाये तो ये साबित करने में समय तो लग सकता है पर ये सच्चाई सामने निकल कर आ जायेगी कि आज भी भारत की आधे से ज्यादा जनसख्यां रूढीवादी होने के साथ-साथ कितनी अन्धी-श्रध्दा से भरी मानसिकता वाली हैं। अगर ये कहकर कि 14वी शताब्दी के आस पास राजाओं के छूने मात्र से समस्याओं का निदान होता था या उस समय यूरोप में शिक्षा मोजूदगी कम थी। तो इस विषय में, मै अपने खुद के मत अनूसार ये कहना चाहुगां कि अगर थोडा सा मनोविग्यानिक द्र्ष्टिकोणं अपनाते हुये आज के भारत को उस समय के यूरोप के काल में रख दिया जाये तो ये ही आशा राम बापू और स्वामि नित्यान्द जैसे अपने आपको सक्षात ईशवर का उपदेश देयता कहने वाले धार्मिक बाबा ही राजा बने होगें। और शिक्षा की कम मोजूदगी की बात भी एक मिथ्या सी लगती है क्योकिं 14वी शताब्दी के आस पास यूरोप में वहां की जरूरत के हिसाब से लगभग ठीक ही होगा या ये मान लीजिये कि जैसा हाल आज के भारत का शिक्षा क्षेत्र में हैं ठीक वैसा ही हाल 14वी शताब्दी के आस पास के यूरोप का रहा होगा फ़िर चाहें वो धार्मिक शिक्षा को ज्यादा महत्व देते हो। क्योंकि हर देश अपनी जरूरत को सोच कर ही व्यवस्था करता है। हो सकता है अगर भारत भी 14वी से 15वी शताब्दी में यूरोप की जगाहं होता तो शायद भारत भी धार्मिक शिक्षा को ज्यादा महत्व देता और बीसवी सताब्दी तक तेज विकास क्रम को हर क्षेत्र में एक बराबर का रखते हुये पूरे विशव में अपना लोहा मनवा लेता।
मेने स्वयं जाकर जामियां-मिलिया-स्लामियां यूनिवर्सिटी में लगभग १०० बुद्धिजीवी छात्रों के बीच सर्वे किया जिनमें कुछ माननीय प्रोफ़ेसरो ने भी मेरे द्वारा अनुरोध करने के बाद मेरे सर्वे में शिरकत की और सर्वे में पूछे गये सवालो का जवाब लिखित दिया। मेरे द्वारा अन्धविशवास को ध्यान रखते हुये कुल तीन सवाल पूछे गये- “पहला- क्या आज भी भारत में अन्धविशवास फ़ैला है?, दूसरा-क्या आज भी भारत के ग्रामीणं इलाको में महिलाओ को अन्धविशवास के कारणं डायन या भूत-पिशाच समझ कर उन पर अत्याचार होते हैं?.., तीसरा- क्या आज दिल्ली जैसे बड़े शहर में तान्त्रिक तथा जादू- टोने करने वाले लोग किसी भी समस्या का निदान करने के लिये तर्क या झूटे दावों का सहारा ले रहे हैं?.. इन सभी तीनो प्रश्नो के बारे में सभी लोगो में से 93%, 91% और 87% लोगो ने सहमती जताई। और सिर्फ़ 7%,9%13% लोगो ने असहमति जताई।
इससे साफ़ जाहिर होता है कि भारतीय समाज का एक बडा वर्ग ये स्वीकार करता है कि आज के भारत में भी उस समय के यूरोप की तरह ऐसी भ्रामक क्रियाये या मानसिकताओ में अन्धा-विशवासक मोजूद है और इसे नकारा नही जा सकता क्योकिं सिर्फ़ ऊपरी तोर से दिखावटी बनने से कुछ नही होगा क्योंकि दिखावटी आधूनिकता से हमारी सोच नही बदल सकती। अगर आज भारत का विकास क्रम हर क्षेत्र में एकसमान रूप से तेज करना है तो पहले मानसिक रूप से आज के भारत को 14वी शताब्दी के आस पास के यूरोप से बिलकुल अलग साबित करना होगा।

2. तर्क शक्ति प्रबल है या दुर्लभ?

आज के भारत और 14वी व 15वी शताब्दी के आस-पास के यूरोप में दूसरी समानता तर्कशक्ति का पूरी तरह प्रबल न होना मानी जा सकती है। साधाहरण शब्दो में अगर कहा जाये तो तर्कशक्ति का तात्पर्य किसी विषय या समस्या या मुद्दे पर गहराई से विचारने या सोचने के कठिन प्रायासो द्वारा एक सटीक समाधान खोजने की क्षमता या एबिलिटी से हो सकता है। गहराई से किसी विषय पर तभी सोचा जाता है जब हमारे मस्तिक में “क्यों” या “व्हाई” नामक वर्ड आता है। “क्यों”- ये ऐसा शब्द है जिसके बलपर कोई विचारक या कोई भी व्यक्ति अगर आगे की सम्भावनओ को जानने की कोशिश करते हुये एक हल या समाधान की तलाश करता है तो इस “क्यों” शब्द के मस्तिक में आने से लेकर इसके समाधान तक के बीच की प्रक्रिया के दोरान जो भी परिणाम या प्रभाव सामने आते हैं वे सभी परिणाम या प्रभाव तर्को का रूप धारणं कर समाज के सामने प्रकट हो सकते है।
मैं मनोवेज्ञानिक आर० एस० वुड्वर्थ जी की इस बात से बिलकुल सहमत हुं कि-“चिन्तन या गहराई से सोचना किसी समस्या पर या बाधा पर विजय प्राप्त करने का तरीका है”.

इतिहासकारो के मत अनुसार रोम और ग्रीक पर चर्च का पूरी तरह से अधिकार होने के बाद तथा सुकरात जैसे तर्कवादी सोच रखने वाले महान विचारको आदी के निधन होने के बाद करीब 14वी शताब्दी के आस-पास यूरोप ने अपनी तर्कवादी सोच को लगभग भूला सा दिया था या ये कहीये कि सुकरात और अरस्तू जैसे महान आम समाज के अधिकारो की रक्षा करने और भ्रष्टाचार की आलोचना करने वाले महान विचारको के बाद कोइ भी यूरोप मे तर्क शक्ति का प्रबलता के साथ सही दिशा में इस्तेमाल करने में असमर्थ था।
तो इस आधार पर हम कह सकते है कि 14वी शताब्दी के आस-पास यूरोप में मानवीय तर्कश्क्ति दूर्लभ हो गयी थी। इसके लिये यूरोप की लगभग 14वी शताब्दी में इंग्लैंड के “जॉन वाइक्लिफ़” जिन्होने चर्च के शोषणों की आलोचना की, परन्तू समाज का पूर्णं सहयोग ना होने के कारणं चर्च ने उनकी आलोचना को गलत ठहराते हुये दबा दिया। पर कुछ ही समय बाद सुनहरे व्यक्तित्व वाले 14वी शताब्दी के आस-पास ही बोहेमिया में “जॉन हस”
एक तर्कवादी सोच रखने वाले व्यक्तित्व के रूप में उभरे और उनके द्वारा चर्च के शोषणों की आलोचना करते हुये कड़ा विरोध प्रकट करने पर उन्हे सरे आम जिन्दा जला डाला था। पर “जॉन हस” को सरे आम जिन्दा जला डालने वाली इस दर्दनाक घटना को देखने के बाद भी आम जनता चर्च के अत्याचारो की आलोचना नही कर पायी या कह सकते हैं कि कोइ तुच्छ तर्क भी अत्याचारो के विरोध में नहीं रख पायी। हालाकि, “जॉन हस” चर्च के शोषणों के प्रति अपने आलोचनात्मक द्र्ष्टीकोंण के द्वारा आम जनता में बहुत चर्चित हो चुके थे। लेकिन आम जनता इस घटना के बाद भी पूरी तरह जाग नहीं पायी थी। अगर मैं अपनी समझ से कहना चाहुं तो यही कहुगां कि “जॉन हस” चर्च द्वारा हो रहे शोषणों का निडरता से कहीं इसलिये तो विरोध नहीं कर बेठे थे कि आम समाज उनके साथ होगा?
अगर ऐसा है तो इससे तर्क शक्ति के प्रबल न होने के साथ-साथ ये भी पता चलता है कि उस समय यूरोप में समाजिक एकता का अभाव था। यानी अगर किसी समाज का व्यक्ति अगर दलदल में फ़ंसा है तो कोई भी व्यक्ति उसको बचाने के लिये हाथ इसलिये नही बढाता था कि कहीं वो भी उस दलदल में न फ़ंस जाये।
अगर देखा जाये तो आज के भारत में ऐसा ही व्यवहार में या मानसिकताओं में पाया जा सकता है। मेरा यहां कहने का ये अर्थ नही की आज भारत में भी ऐसा ही कोई चर्च है और ऐसी ही बड़ी घटनायें यहां घटित होती हैं। बल्कि मेंरा यहां कहने का तात्पर्य ये है कि कहीं ना कही आज भारतीय समाज में एकता का अभाव पाया जाता है चाहे वो बड़े स्तर के उदाहरणं में पाया जाये या छोटे स्तर के उदाहरणं में। जैसा 14वी शताब्दी के आस-पास यूरोप के समाज में एकता के अभाव तथा तर्कशक्ति के दुर्लभ होने के उदाहरणं द्वारा आभास कर सकते हैं। ठिक वैसी ही आज भी मानवीय प्रक्रति का आभास आज के भारतीय समाज के मानव के व्यावहार को देखने से ही हो सकता है। जैसा कि पूर्व राष्ट्रपति डॉ ऎ० पी० जे० अब्दुल कलाम जी ने अपनी पुस्तक “भारत एक महान शक्ति?” में कहा है कि “आज भारतीयों में कही न कहीं आत्म विश्वास की कमी है”। जिसके अधार पर हम कह सकते है कि समाजिक एकता के अभाव व आत्मविश्वास के अभाव के कारणं आज व्यक्ति पूरी तरह नाकारात्म्क सोचने को बाध्य होते हुये अपनी तर्क शक्ति का पूरी तरह प्रयोग करने में असमर्थ हैं और न ही लम्बे समय तक किसी गलत व्यावहार को आलोचनात्मक द्रष्टिकोण से देख पाता है।
हालिया में, अभी “एनुअल स्टेटस ओफ़ एजुकेशन रिपोर्ट” के द्वारा एक लाख स्कूली बच्चो पर किये गये एक सर्वे में जिसकी रिपोर्ट उप-राष्ट्रीयपति हामिद अंसारी द्वारा जारी की गयी थी, ये सामने आया है कि स्कूली छात्र रोज-मर्रा के हिसाब किताब में लगातार पिछड़ते जा रहे है। सर्वे के दोरान पूछे गये गंणित के सवालो का जवाब लगभग 100% छात्रो में से सिर्फ़ 50% छात्र ही सवालो का सही जवाब दे पायें। जिसके आधार पर ये कहा जा सकता है कि कहीं न कहीं आज के भारत में इस प्रकार का वातावरणं तैयार नहीं किया जा रहा है जिसके द्वारा एक कल्पनाशीलता तथा सोचने की शक्ति का विकास हो सके या फ़िर ये कहा जा सकता है कि मस्तिक को एक पूर्णं स्वतन्त्रता नही मिल पा रही। जिससे “क्यों” नामक शब्द के द्वारा समाधान या हल खोजने के प्रयासो के दोरान एक रचनात्मांक्ता का विकास हो। इस मनोविज्ञानिक विषलेशणं से मानवीय प्रक्रति में कहीं न कहीं तर्क शक्ति की दुर्लभता का ही आभास होता है।

3. क्या महिलाओ की स्थित और स्वतन्त्रता में सुधार एक भ्रम?

क्या महिलाओ की स्थति या उनके अधिकारो में स्वतन्त्रता आ पायी है? या बस अधिकारो में स्वतन्त्रता की सुधार मात्र की शुरूआत हुई है?
या अभी भारत में महिलाओ को पूर्णं रूप से स्वतन्त्रता से अपने अधिकारो का उपयोग करने का अवसर ही नही दिया जाता?… क्या आज का भारत एक रूढीवादी और पारम्परिक सोच को महत्व देता है?… ये सवाल ऐसे है जिनका उत्तर ढूंढा तो जा सकता है परन्तू सरलता से नही।
वर्तमान युग में महिलाओ के अधिकारो की स्तिथि में एक बदलाव देखा जा जा रहा है। लगातार ऐसा प्रतीत होता है कि नारी को अधिकारो की स्वतन्त्रता मिल गयी है पर यहा एक प्रश्न ये सामने आता है कि क्या नारी को उसके स्तिथि में सुधार के साथ- साथ अधिकारो की स्वतन्त्रता सही रूप में मिल पा रही है? या क्या इतनी स्वतन्त्रता मिल पा रही है जिसके बल पर वे पूरूष प्रधान समाज में अपने पूर्ण अधिकारो की रक्षा के लिये लड़ सके?
आज भारत की लगभग 70 करोड़ जनसंख्या ग्रामीण इलाको में निवास करती है। इन 70 करोड़ जनसंख्या में (पूरूष=1000/नरी=930 नारी) नारी की पूरूषो से कम लेकिन एक भारी संख्या जरूर होगी। पर क्या दूर गावं में रह रही नारी के पास अधिकारो में सुधार पंहुच पाये है? अगर पहुच पाया है तो किस हद तक गावं निवासी नारी स्वतन्त्रता अधिकारो की सुरक्षा का लाभ उठा पा रही हैं?…
हाल ही में, आरटीई इंटरनेशनल विमन ग्लोबल हेल्थ इम्पेरेटिव, भारतीय प्रबंधन संस्थान, बेंगलुर और नारी के मुद्दो पर शोध करने वाली संस्था इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन विमन आदी द्वारा शोध किया गया जिसमें ये निष्कर्ष आया कि महिलायें जो काम पर जाया करती हैं या घर की दहलीज लांघ कर नोकरी पर जाती हैं उन्हे अपने पति द्वारा कड़े विरोध का सामना करना पड़ता है। और जिन महिलाओ ने इस शोध में भाग लिया था उनमें से 56% महिलाये हिंसात्मक विरोध का सामना पहले ही कर चुकी थी। इससे साफ़ जाहिर होता है कि आज भी भारत में पूरूष एक पारम्परिक तथा रूढीवादी मानसिताओ को अपने मस्तिष्क के किसी कोने में छूपाये महिला की जीविका का खुद ही निर्धारण करना चाहता है। लेगिंग संवेदनशीलता की समस्या एक बडी समस्या उभरकर आज के भारत को 14वी व 15वी शताब्दी के आस-पास के यूरोप के इर्ध-गिर्ध ला कर रोक देती है। क्योंकि उस युग में भी लेंगिक संवेदनशीलता एक बहुत बड़ी समस्या बनकर उभरी थी। ठीक उसी प्रकार अगर कुछ मानसिकताओ को दूर रखते हुये सिर्फ़ नारी के स्वतन्त्र अधिकारो की स्थिति की बात की जाये तो ये समस्या द्र्ष्टिगोचर होती है कि उस समय के यूरोप में भी नारी के अधिकारो की सीमाओ का पूरूष द्वारा निर्धारणं करने का पूरा प्रयास किया जाता था। 15वी शताब्दी के आते-आते यूरोप कि नारी उन पर लगायी गयी पाबन्दीयों का विरोध करने लगी थी परन्तू वो विरोध इतना प्रबल नही था कि जिसके बल पर वे अपने पूर्णं अधिकारो की रक्षा करते हुये एक दीर्घकालीन विरोध जतायें। लेकिन इस विरोध से अधिक अच्छा तो नही पर उससे कम, नाम मात्र का सुधार नारी की स्थिति में देखा गया था। इसका उदाहरणं हम इस बात में ढूंढ सकते है कि फ़्रांस के एक इतिहासकार “अगरिप्पा द-एयूबिग्ने” ने अपनी बेटी को लेटिन पढने के लिये भेज दिया था। पर क्या इतना सुधार उस समय के यूरोप में नारी की स्तिथि के सुधार के लिये काफ़ी था?.. अगर मान लिया जाये कि 15वी शताब्दी के आस-पास के यूरोप में कड़ा विरोध जताने के बाद अपने अधिकारो में एक अधूरी स्वतन्त्रता प्राप्त करने में सफ़ल होने वाली नारी का प्रतिशत लगभग 15% से 20% था परन्तू ये प्रतिशत उस समय यूरोप कि 100% जनसंख्या के मुकाबले एक बहुत अधिक छोटा प्रतिशत होगा। इसी प्रकार इस बात से तो कोई असहमति नही जतायेगा कि आज के भारत में नारी द्वारा स्वयं विरोध जताने पर उनकी स्तिथि में सुधार के निरन्तर प्रयास किये जा रहे हैं। मान लिया जाये कि 100% शहरी नारी जनसंख्या में 15% नारी कड़ा विरोध जताने के बाद अपने अधिकारो में एक अधूरी स्वतन्त्रता प्राप्त करने में सफ़ल हो गंयी। और 100% गावों में निवास कर रही नारी की जनसंख्या में 10% नारी अपने अधिकारो में एक अधूरी स्वतन्त्रता प्राप्त करने में सफ़ल हो गंयी । गावं की 70 करोड़ जनसंख्या में लगभग 25 करोड जनसंख्या नारी की मान ली जाये तो, नारी की लगभग 25 करोड जनसंख्या के सामने जो 10% गावं की महीला जो अपनी स्थिति में अधूरी स्वतन्त्रता प्राप्त करने में अगर सफ़ल हैं तो ये (10% गावं की महीला) प्रतिशत गावों मे महीलाओ के निवास प्रतिशत से बहुत अधिक छोटा प्रतीत होता है और इसी प्रकार शहर की नारी की जनसंख्या का लगभग 15% भाग का सफ़ल हो पाना नाम मात्र का प्रतीत होता है। आज भारत की जनसंख्यां लगभग 1 अरब से ज्यादा पहुंच चुकी हैं। अगर एक अरब की जनसंख्या के सामने शहर की 15% और गावं की 10% नारी जो अधिकारो की स्वतन्त्रता प्राप्त करने में शायद सफ़ल रही हों, बहुत ही नाम मात्र का और छोटा प्रतीत होता है। जिससे ये अनुमान भी लगाया जा सकता है कि आज पूरूष प्रधानता की समस्या या लेंगिक संवेदनशीलता की समस्या लगातार बनी हुई है। जिसके करणं आज के भारत को 14वी व 15वी शताब्दी के आस-पास के यूरोप से काफ़ी हद तक जोड़ कर देखा जा सकता है। हालिया में, मेरे द्वार लगभाग 100 लोगो में एक सर्वे किया गया, जिसमें
“क्या आप इस बात से सहमत हैं कि आज के भारत में नारी की स्थिति तथा उनके अधिकारो की स्वतन्त्रता में सुधार तो देखा जा रहा है पर इतना सुधार नहीं कि जिसके बल पर वे अपने उपर हो रहे अत्याचारो का ठीक से विरोध कर सके?…” ये सवाल पूछा गया, इस सवाल में जवाब में 87% लोगो ने सहमति जतायी तथा 15% लोगो ने असहमति जतायी। इससे साफ़ अनुमान लगाया जा सकता है आज के भारत में पुरूष प्रधानता की समानता 14वी व 15वी शताब्दी के आस-पास के युरोप के समाज में देखी जा सकती है।

4. अन्य समानतायें

संक्षिप्त रूप से ज्यादा विचारात्मक न होते हुये सीधे- सीधे बात की जाये तो अन्य भ्रष्टाचार या नोकर शाहों में विलासिता आदी की प्रव्रति जैसी समानतायें आज के भारत और 14वी व 15वी शताब्दी के आस-पास के यूरोप के राजनेतिक स्तर पर देखी जा सकती हैं। पर उस समय यूरोप में चर्च और सम्राटों के ही राज में ये प्रव्रति थी और आज भारत में कोई चर्च जैसी राज नेतिक संस्था है ही नही। कहने का तात्पर्य ये है कि उस समय के यूरोप और आज के भारत में मानसिकताओं द्वारा किये जा रहे व्यावहार में समानताओं से है न कि किसी एक समान इमारत या संस्था से है।
हलिया में, मेरे स्वयं द्वारा किये गये सर्वे में भ्रष्टाचार को ध्यान में रखते हुये एक सवाल पूछा गया कि- “क्या आज के भारत में सरकारी रोजगारो की नियुक्तियों को लेकर जान पहचानवा और भ्रष्टाचार फ़ैला हुआ है?.. जिसके जवाब में लगभग 90% लोगो ने सहमति जतायी और 10% लोगो ने असहमति जतायी। जिससे ये मान्य कहा जा सकता है कि आज भारत में राजनेतिक स्तर पर तरह-तरह के ऊंचे पदो पर बेठे नोकरशाह विलासिता मे डूबे हुये हैं, जिस बात से आम समाज आज पूरी तरह परिचित हो चुका है और इस विलासिता से भारतीय समाज को रूबरू कराने में पत्रकारो ने पूंर्ण सहयोग दिया है। नोकरशाहों की विलासिता और भष्टाचार की समानता को 14वी व 15वी शताब्दी के आस-पास के यूरोप से जोड़ कर जरूर देखा जा सकता है। जिस प्रकार उस समय युरोप में सरकारी रोजगारो की नियुक्तियों को लेकर जान पहचानवाद और भ्रष्टाचार फ़ैला हुआ था जिसके कारण ऊंचे पद पर पादरीयों के जान पहचान वालो को या ये कह सकते है कि जो ऊचे दाम लगाता था, उसको ही पदो पर नियुक्त क्या जाता था। सभी नोकर शाह उस समय यूरोप मे ऊचे पदो पर बने रहने के कारणं पूरी तरह से विलासिता में डूब चुके थे। ठिक उसी प्रकार आज के भारत को उस समय के यूरोप से जोड़ कर देखना अनुचित न होगा।

“मैं अपने इस लेख द्वारा इस बात को सामने रखना चाहता हुं कि अगर 14वी से 15वी शताब्दी को मनोविज्ञानिक रूप से सीढीयों के रूप में देखा जाये तो जिस तरह पहले धीमी चाल से फ़िर तेज गती से तर्क और द्र्ण इच्छा शक्ति के बल पर जिस प्रकार यूरोप ने एक भागते हुये घोडे के समान अपने सभी क्षेत्रो में बराबर विकास की दर को तेज करते हुये जिस प्रकार 15वी सीढी से होते हुये २०वी शताब्दी नामक सीढी तक रेस लगाके एक लम्बे विकास के क्रम के सफ़र को तय किया हैं और पूरे विश्व में अपना लोहा मनवा लिया। ठीक उसी प्रकार पूरा विश्व जान चुका है कि भारत ने पीछले कई दशको के मुकाबले ओधोगिक क्षेत्र में पूण रूप से तो नहीं पर काफ़ी बढत जरूर दर्ज की है। पर यहां ये प्रशन उठता है कि “क्या भारत को एक विकसित देश बनने के लिये सिर्फ़ एक ओधोगिक क्षेत्र में आगे बढना काफ़ी होगा……?” और अगर हम ओधोगिक क्षेत्र को नजर अन्दाज करते हुयें बाकी सभी क्षेत्रो मान्सिकताओ जैसे आदी पर नजर डाले तो ये ही नजर आयेगा कि आज का भारत विकास के क्रम में एक सूखें पत्ते की तरह कहीं अटक कर रह गया हैं। इसी प्रकार हम कह सकते हैं कि आज अगर भारत अपनी द्रण इच्छा शक्ति के साथ- साथ तर्क शक्ति में सुधार लाते हुये महिलाओ की दशा या उनके अधिकारो की स्वतन्त्रता को दिलाने तथा अन्धविशवास में कमी लाने और इसके साथ-साथ भ्रष्टाचार को मिटाने में सम्पूर्ण क्षमता  का एक समान रूप से प्रयास नही करेगा तो आज के भारत को यूरोप की बराबरी या विकासशील से एक विकसित देश बनने के लियें सभंवत: सात शताब्दीयों (सात शताब्दीयों — १४वी से २०वी शताब्दी के युग का विकास क्रम का फ़ासला) ओर लम्बा इन्तजार करना पढ सकता है। और यहां भी एक प्रश्न ये उठता है कि “क्या भारत को एक महाशक्ति बनने के लिये यूरोप की तरह इतने साल के विकास के क्रम को तय करना पडेगा….? या भारत एक तैजी से उभरती हुई अर्थव्यवश्था की तरहं 2020 तक या बहुत कम समय तय करने के बाद ही एक विकसित देश बन जायेगा…?”

                                                                                                                                                         

                                                                   SURVEY   REPORT

                                                                  SURVEY- DATE- 21/1 /2011

ये सर्वे मरे खुद के द्वारा भारत की जाना–माना  विश्वविद्यालय जामिया-मिलिया स्लामिया में लगभग 100 लोगो से सवाल पूछ कर किया गया इन ९५ लोगो में  विश्वविद्यालय के कुछ प्रोफेसर भी शामिल रुचि दिखाते हुए शामिल हुए | उस समय मोजूद लोगो का मै शुक्रिया करना चाहूँगा की उन्होंने मेरे इस सर्वे में मेरा साथ दिया और लिखित रूप से अपनी राये देने में जरा भी इनकार नहीं किया  किया|

पूछे गये  सवाल

सहमति

असहमति

1.  क्या आप इस बात से सहमत हैं कि आज के भारत में महिलाओ या यूवतीयों की स्थिति तथा उनके अधिकारो की स्वतन्त्रता में सुधार तो देखा जा रहा है पर इतना सुधार नही की जिसके बल पे वें अपने उपर हो रहे अत्याचारो का ठीक से विरोध कर सके?

 

85%

15%

2. क्या आप इस बात से सहमत हैं कि आज भी भारत में अन्धविश्वास फ़ैला हुआ हैं?

93%

7%

3. क्या आप सहमत हैं कि आज भी भारत के ग्रामीण इलाको में महिलाओ को अन्धविश्वास के कारणं डायन या भूत पिशाच समज कर उन पर अत्याचार होते हैं?

 

91%

9%

4. क्या आप इस बात से सहमत हैं कि आज दिल्ली जैसे बड़े शहर में तान्तरिक तथा जादू- टोनो करने वाले लोग किसी भी समस्या का निदान करने के लिये तर्क- झूटे दावों का सहारा ले रहें हैं?

87%

13%

5. क्या आप सहमत हैं कि आज के भारत में सरकारी नोकरीयों के पदोकी नियुक्ति को लेकर जानपहचान-वाद के साथ भ्रष्टाचार फ़ैला हुआ है?

90%

10%

                                                                                                                                             Survey by Anil Kumar

                                                                                                                     http://www.anilkumar89.wordpress.com

           


                          

                          


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