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क्या महिलाओ की स्थिति और स्वतन्त्रता में आज भी सुधार एक भ्रम?


 

क्या महिलाओ की स्थिति या उनके अधिकारो में स्वतन्त्रता आ पायी है? या बस अधिकारो में स्वतन्त्रता की सुधार मात्र की शुरूआत हुई है?
या अभी भारत में महिलाओ को पूर्णं रूप से स्वतन्त्रता से अपने अधिकारो का उपयोग करने का अवसर ही नही दिया जाता?… क्या आज का भारत एक रूढीवादी और पारम्परिक सोच को महत्व देता है?… ये सवाल ऐसे है जिनका उत्तर ढूंढा तो जा सकता है परन्तू सरलता से नही।
वर्तमान युग में महिलाओ के अधिकारो की स्तिथि में एक बदलाव देखा जा जा रहा है। लगातार ऐसा प्रतीत होता है कि नारी को अधिकारो की स्वतन्त्रता मिल गयी है पर यहा एक प्रश्न ये सामने आता है कि क्या नारी को उसके स्तिथि में सुधार के साथ- साथ अधिकारो की स्वतन्त्रता सही रूप में मिल पा रही है? या क्या इतनी स्वतन्त्रता मिल पा रही है जिसके बल पर वे पूरूष प्रधान समाज में अपने पूर्ण अधिकारो की रक्षा के लिये लड़ सके?
आज भारत की लगभग 70 करोड़ जनसंख्या ग्रामीण इलाको में निवास करती है। इन 70 करोड़ जनसंख्या में (पूरूष=1000/नरी=930 नारी) नारी की पूरूषो से कम लेकिन एक भारी संख्या जरूर होगी। पर क्या दूर गावं में रह रही नारी के पास अधिकारो में सुधार पंहुच पाये है? अगर पहुच पाया है तो किस हद तक गावं निवासी नारी स्वतन्त्रता अधिकारो की सुरक्षा का लाभ उठा पा रही हैं?…
हाल ही में, आरटीई इंटरनेशनल विमन ग्लोबल हेल्थ इम्पेरेटिव, भारतीय प्रबंधन संस्थान, बेंगलुर और नारी के मुद्दो पर शोध करने वाली संस्था इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन विमन आदी द्वारा शोध किया गया जिसमें ये निष्कर्ष आया कि महिलायें जो काम पर जाया करती हैं या घर की दहलीज लांघ कर नोकरी पर जाती हैं उन्हे अपने पति द्वारा कड़े विरोध का सामना करना पड़ता है। और जिन महिलाओ ने इस शोध में भाग लिया था उनमें से 56% महिलाये हिंसात्मक विरोध का सामना पहले ही कर चुकी थी। इससे साफ़ जाहिर होता है कि आज भी भारत में पूरूष एक पारम्परिक तथा रूढीवादी मानसिताओ को अपने मस्तिष्क के किसी कोने में छूपाये महिला की जीविका का खुद ही निर्धारण करना चाहता है। लेगिंग संवेदनशीलता की समस्या एक बडी समस्या उभरकर आज के भारत को 14वी व 15वी शताब्दी के आस-पास के यूरोप के इर्ध-गिर्ध ला कर रोक देती है। क्योंकि उस युग में भी लेंगिक संवेदनशीलता एक बहुत बड़ी समस्या बनकर उभरी थी। ठीक उसी प्रकार अगर कुछ मानसिकताओ को दूर रखते हुये सिर्फ़ नारी के स्वतन्त्र अधिकारो की स्थिति की बात की जाये तो ये समस्या द्र्ष्टिगोचर होती है कि उस समय के यूरोप में भी नारी के अधिकारो की सीमाओ का पूरूष द्वारा निर्धारणं करने का पूरा प्रयास किया जाता था। 15वी शताब्दी के आते-आते यूरोप कि नारी उन पर लगायी गयी पाबन्दीयों का विरोध करने लगी थी परन्तू वो विरोध इतना प्रबल नही था कि जिसके बल पर वे अपने पूर्णं अधिकारो की रक्षा करते हुये एक दीर्घकालीन विरोध जतायें। लेकिन इस विरोध से अधिक अच्छा तो नही पर उससे कम, नाम मात्र का सुधार नारी की स्थिति में देखा गया था। इसका उदाहरणं हम इस बात में ढूंढ सकते है कि फ़्रांस के एक इतिहासकार “अगरिप्पा द-एयूबिग्ने” ने अपनी बेटी को लेटिन पढने के लिये भेज दिया था। पर क्या इतना सुधार उस समय के यूरोप में नारी की स्तिथि के सुधार के लिये काफ़ी था?.. अगर मान लिया जाये कि 15वी शताब्दी के आस-पास के यूरोप में कड़ा विरोध जताने के बाद अपने अधिकारो में एक अधूरी स्वतन्त्रता प्राप्त करने में सफ़ल होने वाली नारी का प्रतिशत लगभग 15% से 20% था परन्तू ये प्रतिशत उस समय यूरोप कि 100% जनसंख्या के मुकाबले एक बहुत अधिक छोटा प्रतिशत होगा। इसी प्रकार इस बात से तो कोई असहमति नही जतायेगा कि आज के भारत में नारी द्वारा स्वयं विरोध जताने पर उनकी स्तिथि में सुधार के निरन्तर प्रयास किये जा रहे हैं। मान लिया जाये कि 100% शहरी नारी जनसंख्या में 15% नारी कड़ा विरोध जताने के बाद अपने अधिकारो में एक अधूरी स्वतन्त्रता प्राप्त करने में सफ़ल हो गंयी। और 100% गावों में निवास कर रही नारी की जनसंख्या में 10% नारी अपने अधिकारो में एक अधूरी स्वतन्त्रता प्राप्त करने में सफ़ल हो गंयी । गावं की 70 करोड़ जनसंख्या में लगभग 25 करोड जनसंख्या नारी की मान ली जाये तो, नारी की लगभग 25 करोड जनसंख्या के सामने जो 10% गावं की महीला जो अपनी स्थिति में अधूरी स्वतन्त्रता प्राप्त करने में अगर सफ़ल हैं तो ये (10% गावं की महीला) प्रतिशत गावों मे महीलाओ के निवास प्रतिशत से बहुत अधिक छोटा प्रतीत होता है और इसी प्रकार शहर की नारी की जनसंख्या का लगभग 15% भाग का सफ़ल हो पाना नाम मात्र का प्रतीत होता है। आज भारत की जनसंख्यां लगभग 1 अरब से ज्यादा पहुंच चुकी हैं। अगर एक अरब की जनसंख्या के सामने शहर की 15% और गावं की 10% नारी जो अधिकारो की स्वतन्त्रता प्राप्त करने में शायद सफ़ल रही हों, बहुत ही नाम मात्र का और छोटा प्रतीत होता है। जिससे ये अनुमान भी लगाया जा सकता है कि आज पूरूष प्रधानता की समस्या या लेंगिक संवेदनशीलता की समस्या लगातार बनी हुई है। जिसके करणं आज के भारत को 14वी व 15वी शताब्दी के आस-पास के यूरोप से काफ़ी हद तक जोड़ कर देखा जा सकता है। हालिया में, मेरे द्वार लगभाग 100 लोगो में एक सर्वे किया गया, जिसमें
“क्या आप इस बात से सहमत हैं कि आज के भारत में नारी की स्थिति तथा उनके अधिकारो की स्वतन्त्रता में सुधार तो देखा जा रहा है पर इतना सुधार नहीं कि जिसके बल पर वे अपने उपर हो रहे अत्याचारो का ठीक से विरोध कर सके?…” ये सवाल पूछा गया, इस सवाल में जवाब में 87% लोगो ने सहमति जतायी तथा 15% लोगो ने असहमति जतायी। इससे साफ़ अनुमान लगाया जा सकता है आज के भारत में पुरूष प्रधानता की समानता 14वी व 15वी शताब्दी के आस-पास के युरोप के समाज में देखी जा सकती है।

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खेल विधेयक आया तो, भारी पड़ जायेगा!


SPORTS BILL

खेल विधेयक आया तो, भारी पड़ जायेगा! शायद यही सोचा, हमारे मंत्रीयों ने तभी खेल विधेयक को केबिनेट की मीटिंग में हुई विधेयक पर चर्चा के बाद ही अलविदा कह दिया। अब देखिये ऐसी क्या मुसीबते टूट पडतीं, अगर खेल विधेयक इसी संसद सत्र में पास कर दिया जाता। दिल्ली यूनीवर्सिटी से अपना राजनीतिक करियर शुरू करने वाले वर्तमान के खेल मंत्री अजय माकन ने खेल विधेयक का मसविदा राष्ट्रीय खेल दिवस के खास मोके पर इसी संसद सत्र में पास कराने के उद्देश्य से केबिनेट के पास चर्चा के लिये भेजा। कहना न हो कि खेल विधेयक मजबूत विधेयक सा लग रहा है।  क्योंकि इसमें जो प्रावधान दिये गये हैं उससे राजनीतिक हस्तक्षेप खेलों से दूर तो होगा ही साथ ही साथ पूरी कार्यओरणाली में एक पारदर्शिता लाने पर भी जोर दिया गया है। सभी खेल संघो को आरटीआई के दायरे में लाकर अम जनता के प्रति संघो में विराजमान अधिकारीयों को जवाबदेही बनाने के लिये खेल विधेयक में प्रावधान दिये गया है, जिसके बदोलत जनता यह जान सकती है कि आईसीसी, बीसीसीआई, और सभी खेल बोर्ड के भीतर चल रहे मोद्रिक लेन-देन और कामकाज आदी को सही रूप से अंजाम दिया जा रहा है या नही, ऐसे में खेल बोर्डो से जुडे अधिकारीयों के विरोध का बाहर फ़ूटकर निकल आने को स्वभाविक कहा जा सकता है।

fixed match

अब सवाल तो यह है कि  एक मजबूत खेल विधेयक अने को लेकर हमारे मंत्रीयों को इतना कड़ा एतराज क्यों हो रहा है? अखिर क्यों नहीं आने देना चाहते कोई भी मजबूत विधेयक? ललित मोदी के कार्यकाल के दौरान आईपीएल-3 में करीब 470 करोड़ के वित्तिय घॊटाले की जो पोल खुली थी, वो सबके सामने है। ऐसे केसे  कोई पूरा विश्वास कर सकता है कि खेल संघो में घोटाले नही होते है। दरसल जिन मंत्रीयो ने खेल विधेयक का विरोध किया है,वे सब कही न कही किसी न किसी रूप में खेल संघो से जुडे हुये है, ऐसे में वे कतई नही चाहेंगे कि वें आरटीआई के दायरे में लाये जाये। कहना अतिश्योक्ति हो सकता है, लेकिन कहने में कोई हर्ज नही कि मंत्री कभी नही चाहेंगे कि उनकी उपरी कामाई कैसे और किन स्त्रोतो से हो रही है वह सबके सामने खुल जाये। खेल विधेयक के प्रावधानो के अनुसार खेल महासंघो में नियुक्त होने वाले पदाधिकारी भी खिलाडी ही होने चाहीये, इस पर भी खासा जोर दिया है। तो इससे साफ़ जाहिर है कि मंत्रीयों द्वारा खेल विधेयक का विरोध करने के पीछे अपने अधिकार क्षेत्र समाप्त होने का भी डर दिखाई देता है।

sports

गोरतलब है कि बीसीसीसीआई को वित्तीय मामलो में सरकार द्वरा काफ़ी छूट भी दी हुई है। ऐसे में यह संदेह गहरा हो जाता है कि जब बीसीसीआई जैसे खेल नियंत्रक बोडी स्वतंत्र होकर काम क्यों करना और अन्दरखाने चल रहे वित्तीय लेन-देन की जानकारी किसी को देना नही चाहती है? यह एक बहस का प्रश्न हो सकता है। खेल विधेयक में दिये प्रावधानो के अनुसार खेल महासंघो में नियुक्त पदाधिकारीयों की उम्र की सीमाऎं बांधते हुये 70 वर्ष की अधिकतम उम्र अनिवार्य बताया गया है। यहां अगर देखा जाये तो सन 1937  जन्मे जम्मू- कशमीर के पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारुख अब्दुलाह जो इस समय जम्मू-कशमीर खेल संघ की कमान संभाले हुये 70 साल की उम्र को पार कर गये हैं, फ़िर भी खेल संघ के पदाधिकारी हैं।  ताज्जुब की बात तो यह है कि खेल संघो के उच्च पदाधिकारी वें लोग बनते आये है जिनका खेल से दूर तक नाता नही रहा। दरसल फ़ारुख अब्दुलाह जी मेडिकल में एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त हैं, जो खेल से विपरित समझ की ओर इशारा करती है। खेर जो भी हो कुछ न कुछ घपला जरूर है…

विधेयको पर आगे जारी रहेगा…

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दिल्ली पुलिस का कारनामा: 3 साल की बच्ची को छुड़ाया


police

दिल्ली पुलिस ने 3 साल की बच्ची का अपहरंण करने वाले 22 वर्षीय मोहम्म्द सरताज़ उर्फ़ सोनू (पिता का नाम- मोहम्म्द फ़ियाज़) को गिरफ़्तार कर एक उपलब्धी हासिल करते हुये 3 साल की बच्ची को सही-सलामत अपहरंणकर्ता से छुड़ा लिया। उत्तरी-पूर्वी दिल्ली के वेलकम इलाके में स्थित जनता कलोनी में रहने वाले इख्तीयार नाम के शख्स ने 27 अगस्त के दिन पुलिस थाने में बच्ची का अपहरंण हो जाने की खबर पुलिस को दी और शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत दर्ज होते ही इंस्पेक्टर मनमोहन सिंह को जांच का जिम्मा सोंपा गया और पुलिस मुस्तेदी के साथ सावधानी बरतते हुये अपहरंणकर्ता सोनू को गिरफ़्तार करने और बच्ची को सही-सलामत उसके चंगुल से छुड़ाने के अपने मिशन को अंजाम तक पहुंचाने में लग गई। बच्ची का अपहरंण फ़िरोती मांगने के उद्देश्य से किया गया था, इसका पता तब चला जब शिकायतकर्ता के पास, सोनू यानी अपहरंणकर्ता का फोन आया और उसने इख्तीयार यानी शिकायतकर्ता से 1 लाख 25 हजार रुपय की फ़िरोती मांगी। फ़िरोती की बात सुनकर पुलिस ने धारा 364-ए के तहत भी मामला दर्ज कर लिया। पहले से ज्यादा मुस्तेदी दिखाते हुये शाहदरा के एसीपी श्री धरमबीर जोशी की देखरेख में एक विशेष जांच टीम गठित की गई। जिसके बाद कई संदिग्ध जगांहो पर छापे भी मारे गये। अब तक की जांच में पुलिस को यह अंदाजा हो चुका था कि बच्ची का अपहंरण करने वाला कोई जानकार हो सकता है। इसी दौरान पीड़ित परिवार के एक करीबी से भी पूछताछ की गई थी। जांच को एक सटीक निष्कर्ष तक ले जाने के लिये पीड़ित परिवार से पारिवारिक प्रष्टभूमि के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने की कोशिश भी की गई लेकिन अभी तक कोइ ठोस तथ्य हाथ हाथ नही लग पा रहे थे। पूरी जांच के दौरान पीड़ित परिवार के पास करीब तीन बार अपहंरणकर्ता का फ़िरोती मांगने के उद्देश्य से फोन आया। पुलिस ने तुरंत सावधानीपूर्ववक जांच को अंजाम तक ले जाने के लिये अपहंरणकर्ता की तरफ़ से की जा रही फ़ोन कोल्स को सर्विलांस पर ले लिया था। जांच टीम ने करीब 20 पीसीओ के मालिको से बातचीत कर जांच में मदद करने और संदिग्ध व्यक्तियों की सूचनाये देने के लिये राजी किया। चांद बाग इलाके से मोहम्मद सरताज़ उर्फ़ सोनू नाम के एक शख्स को गिरफ़्तार किया गया। गांझे के नशे के आदी हो चुके सोनू से जांच टीम ने कड़ाई से पूछताछ की तो पता चला कि सोनू ने ही भारी भरकम पैसो की फ़िरोती मांगने के लिये बच्ची का अपहरंण किया था। इस प्रकार ठीक 28 अगस्त को दिल्ली पुलिस की स्पेशल टीम ने एक उपलब्धी हासिल करते हुये 3 साल की बच्ची को अपहरणकरर्ता के चंगुल से छुड़ा लिया। अपहरनकर्ता सोनू उत्तर-प्रदेश बरेली के मोहल्ले हाजीपुर का निवासी है और दिल्ली में अपने कीसी रिस्तेदार यहां रह रहा था। जानकारी के मुताबिक मोहम्म्द सरताज़ उर्फ़ सोनू  गांझा पीने का आदी हो गया था और चांदबाग स्थित एक इम्ब्रोईरी की दुकान पर काम किया करता था। कुछ समय पहले ही उसने काम छोड़ा था।

Information Got from Press Release that given by Sanjay Kumar Jain ( IPS Officer, North-East Delhi)

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पत्रकारिता बदल गयी!


सन 1947 के दौरान और उसके बाद की पत्रकारिता का उद्देश्य शुद्ध जानकारीय्यों को समाज तक पहुंचाकर जागरुक करना था। जैसे-जैसे वक्त गुजरता गया, पत्रकारिता का मतलब काफ़ी हद तक बदलता गया। आजादी से पहले और उसके बाद की पत्रकारिता पर नजर डालें और आज की पत्रकारिता की ओर देखे तो दोनो पत्रकारिता के बीच एक बहुत बडा फ़ासला दिखाई दे जाता है। 21वी सदी की पत्रकारिता का अर्थ “व्यवसाय” होकर रह गया है। कहना अनुचित न होगा कि इसी व्यवसायीकरण  ने ही पत्रकारिता को पूरी तरहं बदल डाला है। अब पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सूचनाओं को समाज तक पहुंचाना नही रह गया बल्कि समाज का मनोरंजन कर किसी तरहं जल्द से जल्द शोहरत और पैसा बटोरा जाये यह रह गया है।
प्रोफ़ेसर अनंद कुमार का यह कहना कि आज की मीडिया “ट्रिप्पल-सी” यानी क्राईम,सिनेमा,क्रिकेट के इर्दगिर्द ही घूमती दिखाई देती है आज की मीडिया पर बिलकुल सटीक ठहरता है इसके साथ ही मीडिया कार्यप्रणाली कहां तक सीमित हो गई है, इसको बखूबी बयान करता है। आज अगर देखा जाये तो न्यूज चेनल हो या न्यूज पेपर सभी इन्ही “ट्रिप्पल-सी” के इर्दगिर्द की खबरे बडे चाऊ के साथ प्रकाशित और प्रसारित करते दिखते है। कहना गलत न होगा कि समाज भी बडे ही चाऊ के साथ इसे पढता, देखता और सुनता दिखाई देता है।
इस बात से हम सभी बखूबी वाकिफ़ होगें कि हमारा देश गांवो का देश है। आज भी हमारी जनसंख्या के सत्तर प्रतिशत नागरिक ग्रामीण इलाको में ही निवास करते हैं। इसके अलावा चाहे हम कितना ही क्यों ना इस भ्रम में रहकर ये भले ही सोच लें कि आज हमारे देश में अंधविश्वास खतम हो गया है। लेकिन सच्चाई यही है कि आज भी हमारे भारत में रह रहा एक बडा तबका अंधविश्वास को अपना धर्म मान चुका है। ऐसे में सभी जानते है कि इस अंधविश्वास की इस समस्यां को काफ़ी हद तक खत्म करने में लोकतंत्र के चौथे खम्भे का एक सबसे मजबूत और ताकतवर भाग इलेक्ट्रोनिक मीडिया यानी न्यूज़ चेनल्स बहुत ही कामयाब भूमिका निभा सकते है। पर ऐसा सोचना ठीक है लेकिन शायद ऐसा हो पाना मुशकिल लगता है। क्योंकि आज के समाचार चेनल्स टी० आर० पी० रूपी कैंसर से पूरी तरह पीडित हो गये हैं। अब तो चेनल को क्या चाहिये सिर्फ़ टी० आर० पी०, क्योंकि जितनी टि० आर० पी० सातवे आसमान पे होगी उतनी ही मोटी कमाई होगी यानी जितने ज्यादा लोग चैनल को देखेगें चैनल उतना प्रसिद्धि की सीढीयां चढेगा तो जाहिर सी बात है कि बड़ी-बड़ी और नामी गिरामी कंपनीया अपने उत्पाद को बेचने के लिये उनके पास दौड़ी चली आयेगीं जो समाचार चैनलों के लिये एक ऐसा होगा जैसे किसी जन्मो से प्यासे को पानी मिल गया हो। नोएडा के एक मकान में सात महीने से बंद रहने वाली दोनो बहनो के प्रकरण की कवरेज को लगभग सारे समाचार चैनलों ने इतनी ज्यादा तवज्जो दी कि चैनल पर तीन दिन तक कोई भी दूसरी खबर का खुल कर विवरण दिया ही नही गया और घूम-फ़िर बार-बार बस एक ये ही खबर दिखाई जाती रही। लग तो ऐसा रहा था मानो पता नही कितने दिनो से चैनल बस ऐसी ही अलग खबर का जोर-शोर से इंतजार कर रहे थे। कुछ कवरेज में तो लगभग सभी चनलों ने मनोवैज्ञानिको के थोड़े बहुत विश्लेषणों के माध्यम से दिखाए कि दोनो बहने “डिप्रेशन” रूपी भयंकर बिमारी का शिकार हो गयी थी जिसके चलते उन्होने ऐसा कदम उठाया पर इन वैज्ञानिक सटीक विश्लेषणों से खबर को ज्यादा बढा चढा कर पेश नही किया जा सकता था और चेनलो को अलग खबर जब तक नही मिलनी थी तब तक तो टी० आर० पी० को कायम तो रखना ही था। अब जहां इंडिया टी०वी अपनी भारी भरकम डरावनी आवाज के इस्तेमाल के लिये जाना जाता है वही सभी चेनलो का खबर बताने का तरिका डरावनी भारीभरक आवाज में तबदील तब होता दिखा जब बड़ी बहन की डायरी में काला जादू का जिक्र आया। सभी चेनलो ने एक-एक करके काले जादू के जिक्र को इतना उठाया कि कितनो को तो ऐसा लगने लगा होगा कि शायद दोनो बहनो की ये हालत काले जादू के कारण ही हुई थी। अगर चेनल चाहते तो परिवार की हालत के पीछे काले जादू की प्रभाव होने वाली बात को खण्डित कर सकते थे। पर ऐसा क्यों करेगें वे! क्योंकि आज चेनलो का लक्ष्य लोगो को जागरुक करना नही बल्कि लोगो को भ्रम में रख कर मोटी कमाई करना है। अगर हालिया के किये गये एक सर्वे कि बात की जाये तो करीब 70 प्रतिशत लोगो ने इस बात को मना कि आज भी गांवो में क्या शहरो में अंधविश्वास कम नही हुआ है। चैनलों के ऐसे रवये को देखते हुये तो यही कहा जा सकता है कि अंधविश्वास के प्रति लोग जागरुक होने बजाये इसकी गहरी खाई में लगातार गिरते चले जायेगें और चेनल अपने लालच रूपी तीर को साधते हुये आम जनता के मन में काले जादू जैसे अंधविश्वास के आकार को फ़ेलाने में अपनी भूमिका निभाते जायेगें।
पेड न्यूज:-  पेड+न्यूज के बारे में हम सभी परिचित क्योंकि कोई भी जानकारी जब किसी संचार माध्यम से लोगो तक पहुंचती है वही न्यूज कहलाती है और अब बात आयी कि अखिर यह पेड न्यूज क्या है भला? पेड न्यूज को हम इस प्रकार समझ सकते है कि जब किसी घटना स्थल मोजूद व्यक्ति से पैसे लेने के बाद न्यूज को किसी प्रकार तोड-मरोडकर दिखाना है, ये फ़िक्स कर लिया जाता है और जानकारी या न्यूज को पैसे देने वाले के बताये अनुसार चाहे वह गलत हो या सही सीधा लोगो तक संचार माध्यम से पहुंचा दिया जाता है। अब सवाल उठता है कि लोकतंत्र या समाज को अखिर पेडन्यूज से क्या नुकसान है? तो सीधी बात समज आती है कि एक जानकारी ही मानव को उसके आस-पास क्या घटित हो रहा है एक न्यूज के रूप में उस तक पहुंचती है और अगर वही जानकारी गलत न्यूज के रूप में लोगो तक पहुंचेगी तो उसका कोई अच्छा प्रभाव तो पडने वाला है नही! जाहिर सी बात है कि अगर जानकारी लोगो तक पहुंचेगी तो उनका नजरिया भी एक गलत दिशा में जाने लगेगा यानी अगर सीएजी जांच कमेटी की रिपोर्ट में दि गई पडताल को ठीक उलट बताकर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की छ्वी को मीडिया पैसे लेने के बाद बिलकुल पाक-साफ़ बता कर प्रसारित और प्रकाशित कर देती तो शायद हमारा नजरिया भी यही कहता कि शीला दीक्षित ने भ्रष्टाचार में कोई भूमिका नही निभाई। अब क्या कहे आज की पत्रकारिता को बस यही कह सकते है कि पत्रकारिता बदल-बदल कर बदल गयी!

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अन्ना की मुहिम और युवा जन-सहलाब का जूनून


youth

अन्ना ने देश में फ़ैले भ्रष्टाचार के विरुद्ध जो देशव्यापी मुहीम छेड़ी है उससे देश का हर एक वर्ग और युवा वर्ग धीरे-धीरे इतने बडे तादाद में लगातार जुड़ता चला जा रहा है कि अंदाजा नही लगाया जा सकता कि कितनी संख्या होगी। लोगो का जज़बा इस कदर बढ चुका है कि इसका अंदाजा अन्ना के जनलोकपाल बिल को अमलीजामा पहनाने के लिये रामलीला मैदान में उमड़ रही भीड़ से लगाया जा सकता है। तिलकब्रिज से लेकर रामलीला मैदान तक जाने वाली सड़क पर इधर-उधर नजर डाली जाये तो ऐसा अनुभव होता है कि जिन लोगों की भीड़ या जो भी लोग आगे आगे बढते जा रहे हैं, जैसे आगे कोइ मेला लगा हो, पर आगे कोई मेला नही, दरसल वें सभी लोग अन्ना के समर्थन के लिये रामलीला मैदान की और कूच करते दिख रहे है। यूपीए सरकार के अड़ियल और तीखे रुख को देखते हुये अन्ना और अन्ना के साथ संघर्ष में जुटा आमजन तथा खासकर यूवा वर्ग की एक कड़े लोकपाल बिल 30 अगस्त तक लाने की उम्मीदें पूरी हो पायेगीं मुश्किल सा लग रहा है पर ज्यादा मुश्किल भी नही है।

people

सरकार समझोता करने के लिये इधर-उधर हाथ फ़ैकेंगी यह तय है। पर अभी जो बात परेशान करने वाली है, वो ये कि कहां सरकार तीखे शब्दो के वार कर रही थी और अन्ना को अनशन अपनी नई-नवेली शर्तो को थोपकर अनशन की जगहां न देने पर पूरी तरहं अड़ी हुई थी, वहीं अचानक अनशन के लिये जगहां की इज़ाजत देदी गयी, और वो भी रामलालीला मैदान में। अगर हम यह मान लें कि सरकार इतने बड़े जनसहलाब को देखकर डर गयी, तो यह सरासर गलत सोचना है। दरसल सरकार तो पहले ही जानती है अगर अन्ना ने आवाज बुलंद की तो उसके साथ देश भर में कई आवाजे बुलंद होंगी। क्योंकि अन्ना एक बार तो अनशन कर नही रहे बल्कि वह तो समाजिक सुधार करने के लिये ही जीवनभर संघर्ष करते आये है। इतना तो तय है कि यूपीए सरकार के पास कोई न कोई खिचडी जरूर पक रही है।

MP of congress

“अन्ना बात करें, साथ मिलकर काम करें और हम साथ मिलकर समस्याओं का हल निकालेंगे” यह बात कही है कोंग्रेस के प्रवक्ता राशिद अल्वि ने सारी दुनिया के सामने आईबीएन7 पर चल रही चर्चा के दौरान संदीप चौधरी जी के बीच का रास्ता खोजने को लेकर एक प्रश्न के जवाब में। इन बातो से साफ़ झलक रहा है कि अन्ना को राजनीति में आकर सरकार से हाथ मिलाकर काम करने के लिये खुली दावत है। कहीं हमारी यूपीए सरकार यही तो नही चाहती? यह एक बहस का प्रश्न हो सकता है।
अन्ना के जनलोकपाल के समर्थन में जुटे कुछ यूवा वर्ग कि राय जानने पर उन लोगो की बात गलत साबित हो जाती है जो सोचते है और कहते है कि जो लोग अन्ना के लोकपाल के समर्थन में खड़े हो रहे है उनको लोकपाल के बारे में कूछ मालूम ही नही। बल्कि हकीकत तो यह है कि देश का यूवा जनलोकपाल के बारे में केवल जानते ही नही अच्छी तरह समझते भी है। साथ ही साथ सरकारी लोकपाल बिल और अन्ना के लोकपाल बिल में अंतर भी बखूबी समझते है।

दिल्ली विश्वविधालय के किरोरीमल कोलेज में पढने वाले राजनीति विषय के छात्र आशिश सिंह ने अपनी बैबाक जबान में आपनी राय देते हुये कहा कि प्रधानमंत्री,एमपी,एमएलए और यहां तक की न्यायपालिका को भी लोकपालबिल के दायरे में लाना बेहद जरूरी है।

A girl dedicated

यूवाओं का जज़बा देखने लायक है:-रामलीला मैदान की हालत बारिश होने से इस कदर खराब है कि जहां पैर रखा वहीं धसं जा रहा है पर इससे यूवाओ में जज़बा कम हुआ ऐसा बिलकुल नही दिख रहा बल्कि देश के यूवा और बच्चे व महिलाएं सभी अपने हाथो से ही जमीन को समथल बनाने में जुटे हुये है और जगह-जगह भरे हुये पानी को हाथो से ही नाली बना कर बाहर की ओर बहा रहे हैं।

youth is dedicated

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राजनीति क्यों


prof. Yogendra yadav

“राजनीति क्यों” का अगर उत्तर खोजा जाये तो ये ही कहा जा सकता है कि एक अर्थव्यवस्था को ठीक तरहं से संचालित करने के लिये राजनीति बेहद जरूरी है। राजनेता ही समाज की समस्यांओ का निवारण करने में बेहद महत्पूर्ण भूमिका निभाते हैं। पर यहां प्रश्न उठता है कि आज देश में जिस तेजी से भ्रष्टाचार अर्थव्यवस्था की जड़ों को खोकला करता जा रहा है उसकी भी तो जड़े कहीं न कहीं राजनीति से ही जुड़ी हैं, तो क्यों राजनीति जरूरी है? वहीं दूसरी तरफ़ तथ्य यह भी है कि इस लोकतंत्र में राजनीतिक अखाड़े के पहलवानो को भी तो हम यानी समाज ही चुनता है? अगर हम वास्तविकता की तरफ़ रुख करे और थोड़ा गहराई से विचार करे तो साफ़ पता चलता है कि  कहीं न कहीं दोष हमारा है। यहां विचारणीय बात है कि भ्रष्टाचार को बढावा देने के लिये राजनीति जितनी जिम्मेदार रही है उससे कहीं ज्यादा कार्य-नीतियों और कार्यप्रणाली में मोजूदा दोष जिम्मेदार हैं। आईआईएमसी दिल्ली के सभागार में प्रोफ़ेसर योगेन्द्र यादव जी ने जो बात कही कि “देश की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता ही नही है” जिससे कोन-कोन सी योजना में भ्रष्टाचार कब, कहां और किसके द्वारा हो जाता है कुछ पता ही नही चलता।

Curruption

योगेंद्र यादव जी की पारदर्शिता ना होने वाली बात बिलकुल एक ऐसे प्रश्न को उजागर करती है जिससे एक सच्चाई से पर्दा सा उठता दिखाई देता है। प्रोफ़ेसर योगेंद्र यादव जी ने एक विश्लेषणात्मक तथ्य को सामने रखते हुये कहा है कि देश किसी योजना का “निर्णय लेने” और “कार्य संचालित होने” दोनो के बीच एक बहुत चौड़ा अंतराल है जो भ्रष्टाचार और घपलेबाजीयों को बढाने में कारगर साबित होता है।
यही नही योगेंद्र यादव जी ने बड़ी ही स्पष्टता के साथ इस बात सभागार में बैठे सभी लोगो के सामने रखी कि “निर्णय लेने” और काम करने के बीच में जो भी लम्बा-चौड़ा अंतराल पाया जाता है, उस अंतराल को खत्म करते हुये पूरी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाई जा सकती है। जिससे किसी योजना-परियोजना के निर्णय लेने और उस योजना का लाभ जरूरतमंदो तक पहुंचने के बीच के अंतराल के दौरान जो भी पैसो की लूट-खसौट होती है वह धीरे-२ समाप्त हो सकती है। आज भ्रष्टाचार अपने जिस चरम पर है उसके लिये एक उदाहरण यह कहा जा सकता है कि सरकार द्वारा जरूरतमंदो के लिये खर्च किये गये हर एक रुपये में से केवल दस पैसे ही आम जरूरतमंदो तक पहूंच पा रहे है। लोकपाल बिल लाने और भ्रष्टाचार मिटाने की अन्ना की यह मुहिम आम आदमी के लिये एक उम्मीद लेकर आई है। पर हमारे राजनेता और हमारी सरकार ऐसा चाहते हों, आजकल सरकार के अड़ियल रवये और बौखलाहट को देखते हुये कतई महसूस नही होता।

Prime Minister Of India

अन्ना हजारे द्वारा प्रधानमंत्री को अनशन के लिये स्थल दिये जाने अपील की तो प्रधानमंत्री ने चुस्ती-फ़ुर्ती दिखाते हुये संविधान का हवाल देते हुये कहा कि अन्ना को इससे संबधित अधिकारीयों यानी पुलिस से बात करनी चाहिये.. रिसर्च का विषय तो यह है कि अब इतनी जल्दी हमारे प्रधानमंत्री को संविधान याद आ गये लेकिन यह चुस्ती-फ़ुर्ती तब क्यों नही दिखाई जब 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले अंजाम दिया जा रहा था?… आखिर जब क्यों याद नही आये प्रधानमंत्री को भारत के संविधान?

 

 

इससे आगे भी जारी रहेगा..

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पुरुष-सत्तात्मक शक्ति के खत्म होने का डर सता रहा विश्व में


महिलाओं संघर्ष जारी रखना होगा समाज में उचित जगहां पाने के लिये….

पाकिस्तानी विदेश मंत्री हीना रब्बानी खा

महिलाओं का तिरस्कार और उपेक्षा
हमारे देश में ही नहीं पूरे विश्व में किया जाता है| भारत देश हमेशा से ही पुरुष  प्रधान देश के नाम से जाना गया है| भारतीय समाज प्राचीन समय से ही एक ऐसी गाथा को बयाँ करता आया है जिसमे पुरुषो ने हमेशा से ही महिलाओं की सीमाए बांधनी चाहि और उनको अपनी रचित परिधि में ही रखना चाहा है| इस परिक्रिया को अगर प्रारंभ में ही स्थगित या खत्म कर दिया जाता तो शायद महिलाये अपनी पूर्ण स्वतंत्रता को शीघ्रता से पा लेती, लेकिन आज पुरुष मानसिकता वाली इस परिक्रिया को दशको बीतने के बाद पुरुष प्रधानता की मानसिकता को पुरुष समाज अपने मस्तिष्क के किसी कोने में लिये बरसो के समय अंतराल से गुजरा है, जिसका रिजल्ट यह रहा कि “पुरुष ही सर्वोपरी” वाली सोच पुरुष के मस्तिष्क में मजबूती से घर कर गयी या कहना गलत न होगा कि पुरुष को अब अपने आपको महिला का कर्ताधर्ता या सर्वेसर्वा समझते रहने की आदत हो गयी है।

  अब जब वर्तमान में, पूरे एशिया में परिवर्तन की जो तेज लहर  दौड़ पड़ी है, जिसके कारण महिला, पूर्व-रचित रीत या पुरुष द्वारा निर्मित सीमाओं को पार कर एक स्वतंत्र जीवन जीने के साथ एक लंबे संघर्ष के बाद अपने अधिकारो को पाने के लिये आगे बढकर नये-नये अवसर प्राप्त कर रही है, तो नारी का इस तरहं वर्चस्व और अधिकार बढता देख, अपनी पुरुष-सत्तात्मक शक्ति के खोने के डर से पूरी तरहं विचलित होता नजर आ रहा है पुरुष समाज। आज भारतवर्ष में जिस कदर बलात्कार, महिलाओ की हत्यायें और उनके साथ होती बेकदरी से ही वर्तमान युग के पुरुष समाज की शक्ल साफ़ नजर आ रही है। एक विचारणीय बात है कि सालों बीत चुके हैं लेकिन देश के संसद और विधायिकाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत सीट देने वाले इस कानून को अभी तक अमलीजामा नही पहनाया गया। हर बार महिला आरक्षण मुद्दा बडे ही जोर-शोर से गरमाया, लेकिन हर बार की तरंह यह सिर्फ़ वोट बटोरने का जरिया बनकर रह गया, सही माईनो में कहा जाये तो, महिला आरक्षण कानून को लागू करने पर सही रूप से और निष्पक्षता से कभी अमल किया ही नही गया।

exploited

आज घरेलू महिला अगर अपने अधिकारो की स्वतंत्रता के लिये अपने हक की मांग करती है तो संघर्ष करने पर खुद पुरुष द्वारा पहले तो वह जैसे चाहा वैसे दंडित और शोषित की जाती है अगर इससे भी चेन न आये तो महिला को घर से बेघर करने में पुरुष जरा भी देर नही करता। सिर्फ़ भारत में ही नही बल्कि एशिया में भी पुरुष समाज, महिलाओं का अधिकार क्षेत्र बढता देख विचलित हो उठा है, जिसका एक ताजा उदाहरण पाकिस्तान में एक जमीयत उलेमा ए-इस्लाम पार्टी के प्रमुख नेता मौलाना फ़जलूर की आलोचनात्मक टिपणी है जो उनहोने पाकिस्तान में पहली महिला विदेश मंत्री चुनी गयी हीना रब्बानी खार के लिय की है। अब देखिये मौलाना फ़जलूर ने कहा है कि “एक महिला को यह पद देना एक समझदारी और बुद्धीमत्तापूर्ण फ़ैसला नही है”. अब बताईये अखिर कोई ऊचा पद देना किसी महिला को क्यों समझदारी का फ़ैसला नही है? इससे तो यही मतलब निकाला जा सकता है कि अभी भी देश में ही नही विश्व में भी महिलाओं को पुरुषो से कम ही आंका जाता है।

(एक बहस का प्रश्न है कि- “पुरुष ही सर्वोपरी” मानसिकता को कब निकाल दूर करेगा पुरुष समाज? )

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