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पत्रकारिता बदल गयी!


सन 1947 के दौरान और उसके बाद की पत्रकारिता का उद्देश्य शुद्ध जानकारीय्यों को समाज तक पहुंचाकर जागरुक करना था। जैसे-जैसे वक्त गुजरता गया, पत्रकारिता का मतलब काफ़ी हद तक बदलता गया। आजादी से पहले और उसके बाद की पत्रकारिता पर नजर डालें और आज की पत्रकारिता की ओर देखे तो दोनो पत्रकारिता के बीच एक बहुत बडा फ़ासला दिखाई दे जाता है। 21वी सदी की पत्रकारिता का अर्थ “व्यवसाय” होकर रह गया है। कहना अनुचित न होगा कि इसी व्यवसायीकरण  ने ही पत्रकारिता को पूरी तरहं बदल डाला है। अब पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सूचनाओं को समाज तक पहुंचाना नही रह गया बल्कि समाज का मनोरंजन कर किसी तरहं जल्द से जल्द शोहरत और पैसा बटोरा जाये यह रह गया है।
प्रोफ़ेसर अनंद कुमार का यह कहना कि आज की मीडिया “ट्रिप्पल-सी” यानी क्राईम,सिनेमा,क्रिकेट के इर्दगिर्द ही घूमती दिखाई देती है आज की मीडिया पर बिलकुल सटीक ठहरता है इसके साथ ही मीडिया कार्यप्रणाली कहां तक सीमित हो गई है, इसको बखूबी बयान करता है। आज अगर देखा जाये तो न्यूज चेनल हो या न्यूज पेपर सभी इन्ही “ट्रिप्पल-सी” के इर्दगिर्द की खबरे बडे चाऊ के साथ प्रकाशित और प्रसारित करते दिखते है। कहना गलत न होगा कि समाज भी बडे ही चाऊ के साथ इसे पढता, देखता और सुनता दिखाई देता है।
इस बात से हम सभी बखूबी वाकिफ़ होगें कि हमारा देश गांवो का देश है। आज भी हमारी जनसंख्या के सत्तर प्रतिशत नागरिक ग्रामीण इलाको में ही निवास करते हैं। इसके अलावा चाहे हम कितना ही क्यों ना इस भ्रम में रहकर ये भले ही सोच लें कि आज हमारे देश में अंधविश्वास खतम हो गया है। लेकिन सच्चाई यही है कि आज भी हमारे भारत में रह रहा एक बडा तबका अंधविश्वास को अपना धर्म मान चुका है। ऐसे में सभी जानते है कि इस अंधविश्वास की इस समस्यां को काफ़ी हद तक खत्म करने में लोकतंत्र के चौथे खम्भे का एक सबसे मजबूत और ताकतवर भाग इलेक्ट्रोनिक मीडिया यानी न्यूज़ चेनल्स बहुत ही कामयाब भूमिका निभा सकते है। पर ऐसा सोचना ठीक है लेकिन शायद ऐसा हो पाना मुशकिल लगता है। क्योंकि आज के समाचार चेनल्स टी० आर० पी० रूपी कैंसर से पूरी तरह पीडित हो गये हैं। अब तो चेनल को क्या चाहिये सिर्फ़ टी० आर० पी०, क्योंकि जितनी टि० आर० पी० सातवे आसमान पे होगी उतनी ही मोटी कमाई होगी यानी जितने ज्यादा लोग चैनल को देखेगें चैनल उतना प्रसिद्धि की सीढीयां चढेगा तो जाहिर सी बात है कि बड़ी-बड़ी और नामी गिरामी कंपनीया अपने उत्पाद को बेचने के लिये उनके पास दौड़ी चली आयेगीं जो समाचार चैनलों के लिये एक ऐसा होगा जैसे किसी जन्मो से प्यासे को पानी मिल गया हो। नोएडा के एक मकान में सात महीने से बंद रहने वाली दोनो बहनो के प्रकरण की कवरेज को लगभग सारे समाचार चैनलों ने इतनी ज्यादा तवज्जो दी कि चैनल पर तीन दिन तक कोई भी दूसरी खबर का खुल कर विवरण दिया ही नही गया और घूम-फ़िर बार-बार बस एक ये ही खबर दिखाई जाती रही। लग तो ऐसा रहा था मानो पता नही कितने दिनो से चैनल बस ऐसी ही अलग खबर का जोर-शोर से इंतजार कर रहे थे। कुछ कवरेज में तो लगभग सभी चनलों ने मनोवैज्ञानिको के थोड़े बहुत विश्लेषणों के माध्यम से दिखाए कि दोनो बहने “डिप्रेशन” रूपी भयंकर बिमारी का शिकार हो गयी थी जिसके चलते उन्होने ऐसा कदम उठाया पर इन वैज्ञानिक सटीक विश्लेषणों से खबर को ज्यादा बढा चढा कर पेश नही किया जा सकता था और चेनलो को अलग खबर जब तक नही मिलनी थी तब तक तो टी० आर० पी० को कायम तो रखना ही था। अब जहां इंडिया टी०वी अपनी भारी भरकम डरावनी आवाज के इस्तेमाल के लिये जाना जाता है वही सभी चेनलो का खबर बताने का तरिका डरावनी भारीभरक आवाज में तबदील तब होता दिखा जब बड़ी बहन की डायरी में काला जादू का जिक्र आया। सभी चेनलो ने एक-एक करके काले जादू के जिक्र को इतना उठाया कि कितनो को तो ऐसा लगने लगा होगा कि शायद दोनो बहनो की ये हालत काले जादू के कारण ही हुई थी। अगर चेनल चाहते तो परिवार की हालत के पीछे काले जादू की प्रभाव होने वाली बात को खण्डित कर सकते थे। पर ऐसा क्यों करेगें वे! क्योंकि आज चेनलो का लक्ष्य लोगो को जागरुक करना नही बल्कि लोगो को भ्रम में रख कर मोटी कमाई करना है। अगर हालिया के किये गये एक सर्वे कि बात की जाये तो करीब 70 प्रतिशत लोगो ने इस बात को मना कि आज भी गांवो में क्या शहरो में अंधविश्वास कम नही हुआ है। चैनलों के ऐसे रवये को देखते हुये तो यही कहा जा सकता है कि अंधविश्वास के प्रति लोग जागरुक होने बजाये इसकी गहरी खाई में लगातार गिरते चले जायेगें और चेनल अपने लालच रूपी तीर को साधते हुये आम जनता के मन में काले जादू जैसे अंधविश्वास के आकार को फ़ेलाने में अपनी भूमिका निभाते जायेगें।
पेड न्यूज:-  पेड+न्यूज के बारे में हम सभी परिचित क्योंकि कोई भी जानकारी जब किसी संचार माध्यम से लोगो तक पहुंचती है वही न्यूज कहलाती है और अब बात आयी कि अखिर यह पेड न्यूज क्या है भला? पेड न्यूज को हम इस प्रकार समझ सकते है कि जब किसी घटना स्थल मोजूद व्यक्ति से पैसे लेने के बाद न्यूज को किसी प्रकार तोड-मरोडकर दिखाना है, ये फ़िक्स कर लिया जाता है और जानकारी या न्यूज को पैसे देने वाले के बताये अनुसार चाहे वह गलत हो या सही सीधा लोगो तक संचार माध्यम से पहुंचा दिया जाता है। अब सवाल उठता है कि लोकतंत्र या समाज को अखिर पेडन्यूज से क्या नुकसान है? तो सीधी बात समज आती है कि एक जानकारी ही मानव को उसके आस-पास क्या घटित हो रहा है एक न्यूज के रूप में उस तक पहुंचती है और अगर वही जानकारी गलत न्यूज के रूप में लोगो तक पहुंचेगी तो उसका कोई अच्छा प्रभाव तो पडने वाला है नही! जाहिर सी बात है कि अगर जानकारी लोगो तक पहुंचेगी तो उनका नजरिया भी एक गलत दिशा में जाने लगेगा यानी अगर सीएजी जांच कमेटी की रिपोर्ट में दि गई पडताल को ठीक उलट बताकर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की छ्वी को मीडिया पैसे लेने के बाद बिलकुल पाक-साफ़ बता कर प्रसारित और प्रकाशित कर देती तो शायद हमारा नजरिया भी यही कहता कि शीला दीक्षित ने भ्रष्टाचार में कोई भूमिका नही निभाई। अब क्या कहे आज की पत्रकारिता को बस यही कह सकते है कि पत्रकारिता बदल-बदल कर बदल गयी!

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पुरुष-सत्तात्मक शक्ति के खत्म होने का डर सता रहा विश्व में


महिलाओं संघर्ष जारी रखना होगा समाज में उचित जगहां पाने के लिये….

पाकिस्तानी विदेश मंत्री हीना रब्बानी खा

महिलाओं का तिरस्कार और उपेक्षा
हमारे देश में ही नहीं पूरे विश्व में किया जाता है| भारत देश हमेशा से ही पुरुष  प्रधान देश के नाम से जाना गया है| भारतीय समाज प्राचीन समय से ही एक ऐसी गाथा को बयाँ करता आया है जिसमे पुरुषो ने हमेशा से ही महिलाओं की सीमाए बांधनी चाहि और उनको अपनी रचित परिधि में ही रखना चाहा है| इस परिक्रिया को अगर प्रारंभ में ही स्थगित या खत्म कर दिया जाता तो शायद महिलाये अपनी पूर्ण स्वतंत्रता को शीघ्रता से पा लेती, लेकिन आज पुरुष मानसिकता वाली इस परिक्रिया को दशको बीतने के बाद पुरुष प्रधानता की मानसिकता को पुरुष समाज अपने मस्तिष्क के किसी कोने में लिये बरसो के समय अंतराल से गुजरा है, जिसका रिजल्ट यह रहा कि “पुरुष ही सर्वोपरी” वाली सोच पुरुष के मस्तिष्क में मजबूती से घर कर गयी या कहना गलत न होगा कि पुरुष को अब अपने आपको महिला का कर्ताधर्ता या सर्वेसर्वा समझते रहने की आदत हो गयी है।

  अब जब वर्तमान में, पूरे एशिया में परिवर्तन की जो तेज लहर  दौड़ पड़ी है, जिसके कारण महिला, पूर्व-रचित रीत या पुरुष द्वारा निर्मित सीमाओं को पार कर एक स्वतंत्र जीवन जीने के साथ एक लंबे संघर्ष के बाद अपने अधिकारो को पाने के लिये आगे बढकर नये-नये अवसर प्राप्त कर रही है, तो नारी का इस तरहं वर्चस्व और अधिकार बढता देख, अपनी पुरुष-सत्तात्मक शक्ति के खोने के डर से पूरी तरहं विचलित होता नजर आ रहा है पुरुष समाज। आज भारतवर्ष में जिस कदर बलात्कार, महिलाओ की हत्यायें और उनके साथ होती बेकदरी से ही वर्तमान युग के पुरुष समाज की शक्ल साफ़ नजर आ रही है। एक विचारणीय बात है कि सालों बीत चुके हैं लेकिन देश के संसद और विधायिकाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत सीट देने वाले इस कानून को अभी तक अमलीजामा नही पहनाया गया। हर बार महिला आरक्षण मुद्दा बडे ही जोर-शोर से गरमाया, लेकिन हर बार की तरंह यह सिर्फ़ वोट बटोरने का जरिया बनकर रह गया, सही माईनो में कहा जाये तो, महिला आरक्षण कानून को लागू करने पर सही रूप से और निष्पक्षता से कभी अमल किया ही नही गया।

exploited

आज घरेलू महिला अगर अपने अधिकारो की स्वतंत्रता के लिये अपने हक की मांग करती है तो संघर्ष करने पर खुद पुरुष द्वारा पहले तो वह जैसे चाहा वैसे दंडित और शोषित की जाती है अगर इससे भी चेन न आये तो महिला को घर से बेघर करने में पुरुष जरा भी देर नही करता। सिर्फ़ भारत में ही नही बल्कि एशिया में भी पुरुष समाज, महिलाओं का अधिकार क्षेत्र बढता देख विचलित हो उठा है, जिसका एक ताजा उदाहरण पाकिस्तान में एक जमीयत उलेमा ए-इस्लाम पार्टी के प्रमुख नेता मौलाना फ़जलूर की आलोचनात्मक टिपणी है जो उनहोने पाकिस्तान में पहली महिला विदेश मंत्री चुनी गयी हीना रब्बानी खार के लिय की है। अब देखिये मौलाना फ़जलूर ने कहा है कि “एक महिला को यह पद देना एक समझदारी और बुद्धीमत्तापूर्ण फ़ैसला नही है”. अब बताईये अखिर कोई ऊचा पद देना किसी महिला को क्यों समझदारी का फ़ैसला नही है? इससे तो यही मतलब निकाला जा सकता है कि अभी भी देश में ही नही विश्व में भी महिलाओं को पुरुषो से कम ही आंका जाता है।

(एक बहस का प्रश्न है कि- “पुरुष ही सर्वोपरी” मानसिकता को कब निकाल दूर करेगा पुरुष समाज? )

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महंगाई, भ्रष्टाचार और तिगड़मबाजी के बोझ से दबा आम आदमी


दो साल पूरे होने पर जश्न मना रहे या आम आदमी की हालत पर ……..

महंगाई की मार

आज महंगाई की मार आम आदमी को झेलनी पड़ रही है, इस बात कि फ़िक्र सरकार को है ऐसा किसी भी एंगल से नही लगता। महगांई क्या चीज होती है वो तो सिर्फ़ वर्तमान में जैसे-तैसे गुजर बसर कर रहा आम आदमी ही बता सकता है। लेकिन केंद्र सरकार इस समय पूरी तरहं सहमीं हुई है, और किसी भी तरहं अपनी सत्ता बनाये रखने के लिये उल्टे-सीधे जतन कर रही है। अगर सही माइनो में कहा जाये तो इस समय सरकार चारो तरफ़ से विरोधो से इस कदर घिरी है कि बस हालत देखने लायक है। और ऐसे में जब सरकार पूरी तरहं से भ्रष्टाचार में लिप्त है और एक एक कर सरकार की छत्र-छायां में जो लूट मची हुई है उसकी पोल जैसे-जैसे खुल रही है, केंद्र में सत्ता चला रही कोंग्रेस खुद ही अपने शब्दो के जाल में फ़सती जा रही है।

राहुल गांधी सत्ता को बचाने का एक मात्र सहारा

शायद इस बात को जनता जान गई थी कि राहुल गांधी सीधे-सीधे सामने आकर राजनीति नही करेंगे। पर जनता कि ये सोच ठीक उल्टी साबित तब हो गई जब राहुल गांधी सीधे भाट्टा-पारसौल में चल रहे अंदोलन और यूपी सरकार की निरंकुशता में पिस रहे किसानो को सांत्वना देने पहुंच गये। अगर थोडा जोर दिया जाये और देखा जाये तो ये साफ़ पता चलता है कि आखिर अक्सर शब्दो की राजनीति करने वाले राहुल सीधे सामने आकर राजनीति क्यों करने लगे। दरअसल राहुल खुद भट्टा पारसौल नही गये, बल्कि उन्हे कोंग्रेस की सोची-समझी रणनीति के तहत भट्टा पारसौल किसानो तक पहुंच कर सहानुभूति के नाम पर राजनीति करने के लिये बोला गया था।  क्योकि कोंग्रेस ये अच्छी तरहं जान गई है कि इस समय जब कोंग्रेस सरकार पूरी तरहं भ्रष्टाचार में डूबी है और सत्ता की कुर्सी हाथ से निकलने की पूरी-पूरी संभवना है तो कोंग्रेस की नजर में सिर्फ़ राहुल ही एक ऐसा हथ्यार हैं जो सत्ता को कुछ हद तक बनाये रखने में सफ़ल हो सकते हैं। कहते है ना जब “विनाशकाये विपरित बुद्धी” यानी अंत निकट होता है तो सोचने समझने की शक्ति भी काम करना बंद कर देती है। अगर माना जाये तो ठीक वैसा ही इस समय हमारी केंद्र सरकार कोंग्रेस की हालत है।

क्योंकि  इतने घोटालों और आरोपो मे लिप्त किसी भी सरकार या किसी भी व्यक्ति को इतना तो अंदाजा हो ही जाता है कि अब अगर थोडी सी भी चूक हुई तो चारो तरफ़ से नकारे जाने में जरा भी देर नही लगेगी। अब देखिये, केंद्र सरकार अपनी सोचने समझने शक्ति को इस कदर खो चुकी है कि वह सत्ता को कायम रखने के जौश में आकर किये गये कर्मो का बोझ आम आदमी पर दामो पर दाम बढाकर डाल रही है और उल्टे-सीधे व्यय और पता नही क्या-क्या तिगड़मबाजी करने से भी नही चूक रही।

प्रधानमंत्री मनमोहन के नेत्रत्व में तिगड़मबाजीयां

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेत्रत्व की यूपीए सरकार दो साल की सफ़लता का जश्न मना रहे हैं। पर कैसी सफ़लता का जश्न मना रही है सरकार?… बल्कि
देश में महगांई की तपन झेल कर भूके पेट सोने को मजबूर गरीब और आम-जन की हालत में कोई सुधार होता नही दिखा और न ही दिख रहा है।

सरकार की खस्ता हालत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सरकार ने गरिबो की जाती आधारित जनणना करने का फ़ैसला लिया है  और सरकार उस पर करीब 3500 करोड रुपए का खर्च करने जा रही है। वो भी तब जब देश में गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रहे गरीब भूखा-तड़पकर मर रहा है। लेकिन सरकार चाहती तो इससे पहले भी ऐसी गणना करने की सोच सकती थी लेकिन आदत से मजबूर और उलझन में पडी सरकार को देखर ऐसा लग रहा है कि उसे कुछ सूझ नही रहा है। सरकार के बेवक्त इस तरहं के खर्च को फ़िजूल खर्च ही कहा जा सकता है। दूसरी ओर देखा जाये तो  देश में इस बार अनाज की अच्छी खासी पैदावार हुई है और भंडार भरे पड़े हैं पर सरकार उस अनाज को गरीबो में मुफ़्त न सही कम दामो पर बाटने के बजाये निर्यात करने जा रही है। इससे सरकार एक अजीब रवेया का का पता चलता है कि चाहे करोडो का अनाज भंडारो में यूहीं भले ही सड़ जाये, पर वो अनाज गरीबो के भूखे पेट भरने में काम नही आना चाहीये!

मनमोहन सिंह के राज के पिछले दो सालों में महंगाई का ग्राफ़ देखा जाये तो महंगाई दोगुनी तेजी से बडी है। सरकार ने इन सालों में जनता को अपनी तिगडमबाजीयों में पूरी तरहं उल्झाकर रखा और कहती रही कि महंगाई पर दिसंबर तक, इस महिने या उस महिने तक काबू पा लिया जायेगा और महंगाई को घटाकर 6 प्रतिशत पर लाने के प्रयास किये जा रहे है। पर सच्चाई को कोन नकार सकता है, आज भी महंगाई कम होने के बजाये किस कदर आम आदमी की कमर तोडे हुये है इस बात को हम बखूबी जानते हैं। सरकार तिगडमबाजी करती रही है और आम आदमी लगातार ऐसे ही पिस रहा है।  कुल मिला अगर कहा जाये तो यही कहा जाये तो मंहगाई, भ्रष्टाचार और सरकार की तिगरडमबाजीयों के बोझ से आम आदमी पूरी तरहं दब रहा है, पिस रहा पर सरकार डरि-सहमीं पता नही किस उल्झन में उलझकर उल्टी-सीधी तिगड़मबाजीयां करने  से बाज ही नही आ रही। अब मनमोहन सरकार अपने दो साल पूरे होने पर जश्न मना रही है या आम अदमी की हालत पर, ये सिर्फ़ आम आदमी जानता है। क्योंकि सरकार को सत्ता बचाने के जौश में आकर तिगरड़मबाजी करने से फ़ुरसत मिलेगी, तभी उसका ध्यान आम आदमी की महंगाई से दबी हालत की ओर जायेगा ना!

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महगांई की आंधी थमने वाली नही, लेकिन संयम रहा तो जरूर थमेगी


एशिया आर्थिक सतर्कता रिपोर्ट की माने तो अभी महंगाई थमने वाली नहीं है|  लगातार कच्चे माल की ऊची कीमतों की मार भारत में सभी बड़ी कम्पनियों को झेलनी पड़ रही है| जिससे उपभोक्ताओ के सामने ये समस्या आ सकती है की वस्तुओ के दाम और ऊपर चढ़ सकते है| यानी जो मुद्रास्फीति की दर 8.6 प्रतिशत पर अभी तक है वो अब और ऊपर 9  फीसदी तक या इससे ज्यादा बढ़ने पर मजबूर होने वाली है| क्योंकि रिपोर्ट के मुताबिक बढती हुई लागतो का प्रभाव पूरी तरहं उपभोक्ताओ तक अभी नहीं पहुच पाया है| मेरी जानकारी के मुताबिक कई नामी कम्पनीयां कच्चे माल की कीमत ऊची होने के चलते वस्तुओ के दाम बढ़ा सकती है|  कीमत स्तर 8.6 प्रतिशत पर ही बना रह सकता है या इससे  उपर भी जा सकता है, लेकिन अभी हालिया में कच्चे माल की ऊची कीमतों के चलते लागतो में बढ़होतरी के बने  रहने के कारण महंगाई आठ फ़ीसदी से नीचे जाएँगी इसकी अभी कोई गुंजाइश ही बनती दिखाई नहीं दे रही है|  वहीँ रिजर्व बैंक भी महंगाई दर को नियन्त्रित करने के लिये तरहं -तरहं के अनुमान लगा रहा है, हलाकि पिछ्ले वर्ष का आठ प्रतिशत महगांई दर रहने वाला अनुमान व्यर्थ ही साबित हुआ है। आरबीआई अपनी मोद्रिक नीतियो में परिवर्तन कर मेहगांई को काबू में करने का प्रयास करने जा रहा है। कुछ विशेष जानकारीयों की माने तो आरबीआई अपनी नीति में परिवर्तन कर रेपो दरो में, जो अभी 6.75 प्रतिशत पर बनी हुई है, उसमें एक फ़ीसदी तक की बढहोतरी करने की सोच रहा है। ऐसे में साख की स्रजनात्मक्ता में कमी आयेगी और साख पर ब्याज दरो में व्रद्धी होना लाजमी हैं।
भारत में जिस तेजी से 2010 की मन्दी के बाद से ही महगांई दर में जो व्रद्धी हुई है इसका सटीक अन्दाजा महगांई की मार झेल रहे उपभोक्ताओ से ज्यादा शायद ही कोई लगा पाये। यहां सवाल ये है कि क्या थम सकती है महगांई की आंधी?, हा.. महगांई की आंधी जरूर थम सकती है पर हमे थोडा सयंम रखने की अवश्यकता है। सयंम तो हम रखे ही साथ ही अपनी बचत भी बनाये रखे। जिससे मुद्रास्फ़ीती से सही तरहं से निपटने की एक क्षमता प्रदान होगी।
यहां ध्यान देने योग्य बात ये है कि महगांई या मुद्रास्फ़ीती हमारे आर्थिक चक्र का ही परिणाम होता है और आर्थिक चक्र या अगर अपनी भाषा में कहा जाये तो एक आर्थिक तराजू को संतुलित बनाये रखने में सिर्फ़ सरकार ही नही बल्कि देश का हर नागरिक भागीदार होता है। दूसरी ध्यान देने योग्य बात ये है कि अर्थव्यवस्था के इस तराजू या आर्थिक चक्र मे संतूलन स्थापित करने के लिये कभी-कभी महगांई या कीमते बढाना जरूरी भी हो जाता है। और ये सरकार खुद नही करती बल्कि आर्थिक चक्र की ऐसी मांग होती है कि सरकार अर्थव्यवस्था में संतुलन लाये। जिसके चलते सरकार को देश में चल रहे आर्थिक चक्र या कहीये आर्थिक तराज़ू को दोनो तरफ़ से बराबर करने की बहुत ही ज्यादा अवश्यकता महसूस होने लगती है। हां आज भ्रष्टाचार ने इस आर्थिक चक्र की पूरी तरहं कमर ही तोड डाली है जिसके कारण व्याय या खर्च ज्यादा और संतुष्टी या लाभ बहुत कम सा लगने लगा है। पर सोचने वाली बात ये है कि कब तक हम भ्रष्टाचार और भ्रष्ट सरकार का रोना रोते रहेगें। सजा तो जरूर मिलनी चाहीये “कर चौरी” और भ्रष्टाचार करने वालो को, परन्तु अपना सारा ध्यान एक तरफ़ ही रखने का क्या ओचित्य या फ़ायदा है। सोचो कितना बढिया होगा कि एक तरफ़ भ्रष्टाचारीयों पर कार्यवाही होती रहे और दूसरी तरफ़ हम देश में आर्थिक संतुलन बनाये रखने में अपनी अतुल्य भूमिका निभाते रहे।
ये गीत तो सुना ही होगा कि “हद से ज्यादा तुम किसी से प्यार नही करना”, इस गीत मे एक नीति छुपी है, तो यही नीति आर्थिक चक्र को काबू करने में काफ़ी हद तक कारगर भूमिका निभा सकती है। कहने का तात्पर्य ये है कि हद से ज्यादा किसी एक ही चीज पर व्याय करते हुये उपभोग नही करना चाहिये। जितना हो सके जो दो या ज्यादा चीज हम आरम्भ से ही लेते आये है उन पर बराबर-बराबर का ही व्याय करे क्योकि अगर महगांई को देखते हुये एक चीज से तुरन्त हम दूसरी चीज पर ज्यादा व्याय करने लगते है जिससे एक चीज की बिक्री कुछ समय के लिये तो इतनी होने लगती है कि उत्पादक और करमीयों को पहले के मुताबिक दोगुना-चौगुना काम करना पड जाता है। जिससे उत्पादकता में कमी आने लगती है। वहीं दूसरी वस्तु की बिक्री में अचानक से इतनी
गिरावट आ जाती है कि जो उत्पादक पूरे दिल और कुछ कर गुजरने की अपनी क्षमता से लागत लगाकर उत्पादित चीजो को हम तक पहुचाने के लिये पूरी व्याय करने की ताकत झोंक देता है ये सोच कर की उसको कुछ तो लाभ मिलेगा। पर उसको अपना लाभ तो क्या लगाई हुई लागत भी वसूल नही हो पाती। जिससे उत्पादन की लागत बढ जाती है और उत्पादक को मजबूरन उत्पादित चीजो की कीमते बढानी पड जाती हैं। फ़िर बाजार का क्या हाल होता है इसका पता हमे तब चलता जब महगांई डायन हम उपभोक्ताओं की कमर ही तोड़ डालती है।  
अन्त में, मै अर्थशास्त्र और मनोविग्यान का छात्र होने के नाते यही कहुगां की वैसे तो बहुत से ऐसे कारक हैं जिससे मुद्रास्फ़ीती की दर ऊची बनी हुइ है लेकिन इस लेख को ध्यान में रखते हुये हम सभी द्वारा एक अच्छा प्रयास किया जा सकता है आर्थिक संतुलन बनाये रखने में। जो काफ़ी हद तक कीमत, मांग और पूर्ती तथा रोजगार के स्तर में संतुलन बनाये रखने के साथ-साथ महगांई पर भी नियन्त्रण कर पाने में एक सफ़ल प्रयास सिद्ध हो सकता है।

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सावधान, जिस संस्थान मे आप प्रवेश लेने जा रहे है वो फ़र्जी तो नही?


इस बाजारवादी दौर में उत्पादक  अपनी चीज को कुछ भी करके बस बेचने पर लगा हुआ है| आज के दौर में एक नए प्रकार की बाजारवाद की जो अंधी चली है उसने  शिक्षा के क्षेत्र में भी बाजारीकरण को कब घोल दिया इसका शायद ही हमें एक सटीक अनुमान हो पाया हो। आज अगर एक मोटे अनुमान की माने तो निजी उच्च शिक्षा संस्थानों का दायरा 6.5  अरब डॉलर तक बढ़ गया है|  इतने बढे दायरे में पता नहीं कितने शिक्षण संस्थान तो ऐसे होगे जो कही पर आज भी किसी न किसी भोले भाले छात्र को कोर्स समाप्ती के समय नोकरी का झासा देकर अपनी ठगी करने की दूकान को चला रहे होंगे|  
हाल ही में बारवी की परीक्षाएं ख़त्म हुई है और कुछ दिनों में ही परिणाम भी घोषित हो ही जायेंगे| ऐसे में सभी छात्र  अपने आगे के करियर को लेकर चिंतित होंगे और किसी तरंह प्रवेश के लिए कोलेजो की तलास में जुटे गए है| पर आज हमारे भारत में अच्छे कोलेजो की संख्या बहुत ही कम है|  जब कोलेजो की संख्या छात्रों की तादात से बहुत कम होगी तो जाहिर है कि कड़ी प्रतियोगिता का सामना हर एक छात्र को करना ही पड़ेगा|  लाखो छात्र प्रवेश के लिए दर दर भटकते है तब जाकर उनमे से कुछ ही छात्रों को प्रवेश पाने में कामयाबी मिल पाती है|  कड़ी प्रतियोगिता के बढ़ते इस रास्ते पर दोड़ते हुये कड़ी से कड़ी प्रतियोगिता की मार झेल रहे छात्रों को गुमराह करने के लिए भी कई फर्जी संस्थान बाजार में उतर आये है| जो हमेशा भोले-भले छात्रों को अपने  ठगी के जाल में फासने के लिए हर दम तैयार बैठे होते हैं|  ऐसी स्थिति को देखते हुए छात्रों को सयंम बरतने के साथ सतर्क भी रहने की बेहद जरूरत है|  इस बारे में बिलकुल ध्यान रखे कि वर्तमान में कोई भी संस्थान सौ प्रतिशत प्रमाण भले ही दे लेकिन आज भारत में बेरोजगारी और बढती हुई जनसँख्या को देखते सभी को बराबर का रोजगार मिल पायेगा, ये सटीक अंदाजा लगाना बहुत ही कठिन है|
आप जिस संस्थान में प्रवेश लेने जा रहे है क्या वह यूजीसी या किसी सरकारी संगठन से मान्यता प्राप्त है?, संस्थान की फीस उचित है और अगर ज्यादा वसूल रहा है तो क्यों?  इन दोनों सवालों का अगर आपको  किसी भी संस्थान में प्रवेश लेने से पहले उत्तर मिल जाता है तो आप ठगी का शिकार होने से काफी हद तक अपने आपको बचा सकते है, नही तो एक बडी ठगी शिकार का होने में जरा भी देर नही लगेगी|  यूजीसी बहुत से विश्विधालयो पर छापा मारकर फर्जी घोषित कर चुकी है|
चोकने वाली बात ये है कि जहाँ उत्तर प्रदेश 9 फर्जी संस्थानों के मामले में योजीसी के अनुसार पहले नंबर पर रहा था वहीँ देश कि राजधानी दिल्ली ने 6 फर्जी संस्थानों के साथ दूसरा स्थान हासिल किया था| ये तो सिर्फ यूजीसी द्वारा एक ही बार के छापे में सामने आई सच्चाई है लेकिन अभी भी पता नहीं कितने ओर ठग, संस्थान के नाम का नकाब पहने छात्रों को शिकार बना रहे है|
 आइये यूजीसी द्वारा घोषित फर्जी विश्विधालयो पर नजर डाल लेना उचित होगा:
राजनीधा दिल्ली में-
१. वारानासया संस्कृत विश्विधालय दिल्ली
२. वारानसी विश्विधालय जगत पूरी, दिल्ली
३. कोमर्शियल विश्विधालय दरियागंज दिल्ली
४. यूनाईटेड नेशन विश्वविधालय दिल्ली
५. वोकेशनल विश्वविधालय दिल्ली
६. ऎडिआर-सेंट्रिक ज्यूरिडिकल विश्वविधालय, ऎडिआर हाउस, गोपाल टावर, दिल्ली-110008
उत्तर-प्रदेश में-
१. महिला ग्राम विश्वविधालय इलहाबद, उत्तर-प्रदेश
२. इंडियन ऎजूकेशन काऊंशिल ओफ़ यूपी, लखनऊ
३. गांधी हिन्दी विध्यापीठ, प्रयाग, इलहाबाद
४. नेशनल यूनीवसिटी ओफ़ इलेक्ट्रो होम्योपेथी, कानपुर
५. नेताजी सुबास चन्द्र बोस विश्वविधालय अलीगढ
६. उत्तर-प्रदेश विश्विधालय, कोसी कला मथुरा
७. महाराना प्रताप शिक्षा निकेतन विश्वविधालय, प्रतापगढ
८. गुरूकुल विश्वविधालय व्रन्दावन
९. इंद्रप्रस्त शिक्षा परिषद, माकन पुर
बिहार में-
१. मैथीली विश्वविधालय दरबंगा बिहा।
कर्नाटक में-
१. बादागनवी सरकार वर्ल्ड ओपन यूनीवर्सिटी, कर्नाट।
केरल में-
१. सेंट जोन्स यूनीवर्सिटी किशनथम केरला।
मध्यप्रदेश में-
१. केसरवानी विद्दयापीठ जबलपुर।
महाराष्ट्र में-
१. राजा अरेबिक यूनीवर्सिटी नागपुर।
तमिलनाडू में-
१. डी० डी० बी० संस्क्रत यूनीवर्सिटी, पुतुर

आज के बाजारीकरण के बढते प्रभाव को देखते हुये अन्त में यही कहा जा सकता है कि किसी भी संस्थान मे प्रवेश के समय पूरी सतर्कता बरते और अच्छी तरहं से जानकारी जुटाने के बाद ही प्रवेश लें। अगर किसी छात्र को किसी संस्थान की मान्यता पर जरा भी शक होता है तो वह तुरंत यूजीसी विभाग से संपर्क कर अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है जिससे यूजीसी के दिशा निर्देशो के अनुसार उचित सहायता प्राप्त की जा सकती है।

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जनसंख्या एक अरब बीस करोड लेकिन विश्वविधालय हजार के आकडे से भी बहुत दूर


भारत की जनसंख्या आज एक अरब को पार करते हुए एक अरब बीस करोड़ पर पहुच गयी है| लेकिन भारत में अभी भी विश्वविधालय की संख्या एक हजार के अस -पास भी नहीं पहुच पाई है आज अगर कुछ तथ्यपरख आकड़ो को माने तो भारत में इतनी बड़ी आबादी के लिए  सिर्फ तीन सो पचास विश्वविधालय है वहीँ जापान की अगर बात की जाए तो वहा करीब 13 करोड़ लोगो के लिए चार हजार विश्विधालय है और इसके आलावा अमेरिका में तीन हजार छेसो पचास विश्विधालय है|  
आज शिक्षा के क्षेत्र में सरकार बड़े बड़े दावे कर रही है पर क्या  शिक्षा के एक भाग यानी प्राथमिक शिक्षा पर संपूण ध्यान  केन्द्रित करते हुए उच्च शिक्षा को नजर अंदाज करना  जायज है|  शिक्षा का क्षेत्र तभी फल फूल सकता है जब इसके संपूण भाग पर ध्यान दिया जाये|

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प्रथ्वी सुरक्षित तो हम सुरक्षित


ए० सी० जी० ग्रुप माईम की जोरदार परफ़ोरमेंस देने के बाद की फ़ोटो

“ग्लोबल वार्मिंग” अर्थाथ धरती पर लगातार बढता हुआ ताप। धरती पर बढते हुये तापमान से हमारे आस-पास के पर्यावरण को लगातार नुकसान पहुंच रहा है। कटते हुये पेड़, फ़ेक्ट्रीयों से निकलता हुआ धुंआ और केमीकल, बढता दूषित जल, वाहनो की तादात जिससे बढता वाहनो से निकलता धूं-धूं करता हुआ धुंआ,बढती हुई जनसंख्या से बढता हुआ प्लास्टिक से बने थेलो का उपयोग प्रर्यावरण को पूरी तरंह नष्ट करने पर उतारू हो चुका है। जैसा कि हम जानते है कि हम चारो तरफ़ से जिस भी आवरण से घिरे होते हैं वह पर्यावरण ही होता है, जो अब हमारे सतर्क न रहने के कारण नष्ट होने की कगार पर आ गया है। लगातार वातावरण या वायूमंडल में ओक्सीजन की मात्रा का स्तर गिरता जा रहा है। जो हमारे जीवन को अस्त-व्यस्त यानी नष्ट कर सकता है। तो अगर हम अब नही जागेगें और प्रथ्वी को बचाने के लिये प्रयास नही करेगें तो कब करेगें?
कहीं ऐसा न हो कि देर न हो जाये और “प्रथ्वी के नष्ट होने वाली है” जैसी भ्रमित करने वाली बाते सच हो जायें और हम देखने के लिये भी न बच पाये? अब वक्त आ गया है कि हम एक जुट होकर आगे आये और अपने पर्यावरण को को बचाने के लिये प्रयास करें और करने भी होगें क्योंकि अब हमारी जीवन  को सुरक्षित करने का जो सवाल है। हो सकता है एक दम से बहुत सारे प्रयास न कर पायें। पर शुरूआत में एक व्यक्ति भी अगर एक प्रयास करता है तो एक सौ बीस करोड लोगो का इकट्ठा प्रयास बहुत ही बढिया सिद्ध हो सकता है।
आइए कुछ शुरूआती महत्वपूर्ण क्या-क्या प्रयास किये जा सकते है, उनपर नज़र डालते है:  
१. सबसे पहले हम एक महत्वपूंर्ण कदम ये उठा सकते है कि पेड़ -पोधों को नुकसान न पहुचाये बल्कि ज्यादा से ज्यादा लगायें। जहां भी रहें अपने चारो तरफ़ हरियाली बनाये रखे और पोधों को लगाने के बारे में दूसरो को भी बतायें।
२. जितना हो सके साईकल या पेट्रोल या डीज़ल रहित बाईक को अपनाये। सार्वजनिक वाहनो से यात्रा करें। जिससे हवा में फ़ैल रही गाडीयों से निकलने वाले धुंऎ में मोजूद सोडियम कारबोनेट नाम की हानीकारक गैस को काफ़ी हद तक कम किया जा सकता है।
३. दिवाली पर पटाखे कम ही जलाऎं और दिवाली पर अपना ध्यान पटाखों से हटाकर रिस्तोदारो तथा परिवार के साथ मिठाई और स्वादिष्ट भोजन इसके अलावा मोज मस्ति से त्योहार को खुशनूमा बनायें क्योंकि दिवाली खुशी मनाने का त्योहार है और इसके लिये जरूरी नही कि हम पटाखें ही जलाऎं।
४. प्लास्टिक थेलों का उपयोग बहुत ही कम करें और जितना हो सके कूडा-कचरा न फ़ैलाएं।
५. पर्यावरण सुरक्षित करने के उपायों के बारे में दूसरो को जरूर बतायें।

पर्यावरण को बचाने के लिये दिल्ली की एक सस्था “ड्वलेपमेंट अल्टरनेटिवस” जो अपनी “क्लीन इंडिया” योजना के द्वारा खासकर पर्यावरणं पर काम करती है। सस्था ने एक सराहनीय कदम उठाते हुये 20 अप्रेल को नई दिल्ली स्थित नेहरू मेमोरियल,म्यूसियम लाईब्रेरी सभागार में “अर्थ डे” नाम से कार्यक्रम का आयोजन किया। कार्यक्रम को सफ़ल बनाने के लिये दिल्ली और एन०सी०आर० के लगभग दस से बारहा स्कूलो के छात्रो और सभी आमंत्रित अतीथि आदी पहुंचे। कार्यक्रम के मुख्य अतीथि पर्यावरण विभाग दिल्ली के  श्री धरमेंद्र  और एन० एम० एम० एल० की निदेशक श्री मती म्रादुला मुखर्जी ने अपने प्रोत्साहित करने करने वाले शब्दो से छात्रो और सभी श्रोताओं को संबोधित किया। कार्यक्रम की थीम का नाम “एन एक्ट ओफ़ ग्रीन” यानी प्रथ्वी को बचाने के एवज में पर्यावरण को बचाने का एक भी प्रयास एक बडा और बढिया परिणाम लाने में कारगर साबित हो सकता है। इसी थीम को ध्यान में रखते हुये लोगो को पर्यावरण अनूकूल प्रयास करने के लिये प्रेरित करने के उद्देश्य से विशेषकर ये कार्यक्रम रखा गया। वैसे क्लीन इंडिया की टीम द्वारा प्रेसंटेशन भी दी गयी लेकिन कार्यक्रम में मनोरंजन की शुरूआत दिल्ली के एक संगीत समूह “एकम सत्यम” ने की, जिसने परिपक्व लोगो को तो झूमने को मजबूर करते हुये, पर्यावरण आधारित गीतो से प्रथ्वी को सुरक्षित करने का संदेश जरूर पहुंचाया लेकिन छात्रो और युवाओं तक संदेश पहुंचाने में उन्हे काफ़ी मसक्कत करनी पडी। छात्र होते ही ऐसे है क्योंकि या तो उन्हे फ़िल्मी गीत की भाषा ही समझ आती या फ़िर गुदगुदाने वाले महत्वपूंर्ण पलो की। सो उनके लिये गुदगुदाने वाला वक्त आ ही गया। कार्यक्रम के दोरान  ए० सी० जी० (आर्ट ओफ़ किरयेटर ग्रुप) जो बुध्दीजीवी,छात्रो, तथा युवा कलाकारो का समूह है, जिसने “अर्थ सेफ़, वि सेफ़” अपने माईम अभिनय से सभागार में बैठे सभी लोगो को गुदगुदाते हुये हसने को मजबूर तो किया ही साथ ही अपनी प्रस्तूती से बडी सरलता से प्रथ्वी को सुरक्षित करने का सुन्दर संदेश भी सभी को दिया।

“खबर इंडिया”

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