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क्या महिलाओ की स्थिति और स्वतन्त्रता में आज भी सुधार एक भ्रम?


 

क्या महिलाओ की स्थिति या उनके अधिकारो में स्वतन्त्रता आ पायी है? या बस अधिकारो में स्वतन्त्रता की सुधार मात्र की शुरूआत हुई है?
या अभी भारत में महिलाओ को पूर्णं रूप से स्वतन्त्रता से अपने अधिकारो का उपयोग करने का अवसर ही नही दिया जाता?… क्या आज का भारत एक रूढीवादी और पारम्परिक सोच को महत्व देता है?… ये सवाल ऐसे है जिनका उत्तर ढूंढा तो जा सकता है परन्तू सरलता से नही।
वर्तमान युग में महिलाओ के अधिकारो की स्तिथि में एक बदलाव देखा जा जा रहा है। लगातार ऐसा प्रतीत होता है कि नारी को अधिकारो की स्वतन्त्रता मिल गयी है पर यहा एक प्रश्न ये सामने आता है कि क्या नारी को उसके स्तिथि में सुधार के साथ- साथ अधिकारो की स्वतन्त्रता सही रूप में मिल पा रही है? या क्या इतनी स्वतन्त्रता मिल पा रही है जिसके बल पर वे पूरूष प्रधान समाज में अपने पूर्ण अधिकारो की रक्षा के लिये लड़ सके?
आज भारत की लगभग 70 करोड़ जनसंख्या ग्रामीण इलाको में निवास करती है। इन 70 करोड़ जनसंख्या में (पूरूष=1000/नरी=930 नारी) नारी की पूरूषो से कम लेकिन एक भारी संख्या जरूर होगी। पर क्या दूर गावं में रह रही नारी के पास अधिकारो में सुधार पंहुच पाये है? अगर पहुच पाया है तो किस हद तक गावं निवासी नारी स्वतन्त्रता अधिकारो की सुरक्षा का लाभ उठा पा रही हैं?…
हाल ही में, आरटीई इंटरनेशनल विमन ग्लोबल हेल्थ इम्पेरेटिव, भारतीय प्रबंधन संस्थान, बेंगलुर और नारी के मुद्दो पर शोध करने वाली संस्था इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन विमन आदी द्वारा शोध किया गया जिसमें ये निष्कर्ष आया कि महिलायें जो काम पर जाया करती हैं या घर की दहलीज लांघ कर नोकरी पर जाती हैं उन्हे अपने पति द्वारा कड़े विरोध का सामना करना पड़ता है। और जिन महिलाओ ने इस शोध में भाग लिया था उनमें से 56% महिलाये हिंसात्मक विरोध का सामना पहले ही कर चुकी थी। इससे साफ़ जाहिर होता है कि आज भी भारत में पूरूष एक पारम्परिक तथा रूढीवादी मानसिताओ को अपने मस्तिष्क के किसी कोने में छूपाये महिला की जीविका का खुद ही निर्धारण करना चाहता है। लेगिंग संवेदनशीलता की समस्या एक बडी समस्या उभरकर आज के भारत को 14वी व 15वी शताब्दी के आस-पास के यूरोप के इर्ध-गिर्ध ला कर रोक देती है। क्योंकि उस युग में भी लेंगिक संवेदनशीलता एक बहुत बड़ी समस्या बनकर उभरी थी। ठीक उसी प्रकार अगर कुछ मानसिकताओ को दूर रखते हुये सिर्फ़ नारी के स्वतन्त्र अधिकारो की स्थिति की बात की जाये तो ये समस्या द्र्ष्टिगोचर होती है कि उस समय के यूरोप में भी नारी के अधिकारो की सीमाओ का पूरूष द्वारा निर्धारणं करने का पूरा प्रयास किया जाता था। 15वी शताब्दी के आते-आते यूरोप कि नारी उन पर लगायी गयी पाबन्दीयों का विरोध करने लगी थी परन्तू वो विरोध इतना प्रबल नही था कि जिसके बल पर वे अपने पूर्णं अधिकारो की रक्षा करते हुये एक दीर्घकालीन विरोध जतायें। लेकिन इस विरोध से अधिक अच्छा तो नही पर उससे कम, नाम मात्र का सुधार नारी की स्थिति में देखा गया था। इसका उदाहरणं हम इस बात में ढूंढ सकते है कि फ़्रांस के एक इतिहासकार “अगरिप्पा द-एयूबिग्ने” ने अपनी बेटी को लेटिन पढने के लिये भेज दिया था। पर क्या इतना सुधार उस समय के यूरोप में नारी की स्तिथि के सुधार के लिये काफ़ी था?.. अगर मान लिया जाये कि 15वी शताब्दी के आस-पास के यूरोप में कड़ा विरोध जताने के बाद अपने अधिकारो में एक अधूरी स्वतन्त्रता प्राप्त करने में सफ़ल होने वाली नारी का प्रतिशत लगभग 15% से 20% था परन्तू ये प्रतिशत उस समय यूरोप कि 100% जनसंख्या के मुकाबले एक बहुत अधिक छोटा प्रतिशत होगा। इसी प्रकार इस बात से तो कोई असहमति नही जतायेगा कि आज के भारत में नारी द्वारा स्वयं विरोध जताने पर उनकी स्तिथि में सुधार के निरन्तर प्रयास किये जा रहे हैं। मान लिया जाये कि 100% शहरी नारी जनसंख्या में 15% नारी कड़ा विरोध जताने के बाद अपने अधिकारो में एक अधूरी स्वतन्त्रता प्राप्त करने में सफ़ल हो गंयी। और 100% गावों में निवास कर रही नारी की जनसंख्या में 10% नारी अपने अधिकारो में एक अधूरी स्वतन्त्रता प्राप्त करने में सफ़ल हो गंयी । गावं की 70 करोड़ जनसंख्या में लगभग 25 करोड जनसंख्या नारी की मान ली जाये तो, नारी की लगभग 25 करोड जनसंख्या के सामने जो 10% गावं की महीला जो अपनी स्थिति में अधूरी स्वतन्त्रता प्राप्त करने में अगर सफ़ल हैं तो ये (10% गावं की महीला) प्रतिशत गावों मे महीलाओ के निवास प्रतिशत से बहुत अधिक छोटा प्रतीत होता है और इसी प्रकार शहर की नारी की जनसंख्या का लगभग 15% भाग का सफ़ल हो पाना नाम मात्र का प्रतीत होता है। आज भारत की जनसंख्यां लगभग 1 अरब से ज्यादा पहुंच चुकी हैं। अगर एक अरब की जनसंख्या के सामने शहर की 15% और गावं की 10% नारी जो अधिकारो की स्वतन्त्रता प्राप्त करने में शायद सफ़ल रही हों, बहुत ही नाम मात्र का और छोटा प्रतीत होता है। जिससे ये अनुमान भी लगाया जा सकता है कि आज पूरूष प्रधानता की समस्या या लेंगिक संवेदनशीलता की समस्या लगातार बनी हुई है। जिसके करणं आज के भारत को 14वी व 15वी शताब्दी के आस-पास के यूरोप से काफ़ी हद तक जोड़ कर देखा जा सकता है। हालिया में, मेरे द्वार लगभाग 100 लोगो में एक सर्वे किया गया, जिसमें
“क्या आप इस बात से सहमत हैं कि आज के भारत में नारी की स्थिति तथा उनके अधिकारो की स्वतन्त्रता में सुधार तो देखा जा रहा है पर इतना सुधार नहीं कि जिसके बल पर वे अपने उपर हो रहे अत्याचारो का ठीक से विरोध कर सके?…” ये सवाल पूछा गया, इस सवाल में जवाब में 87% लोगो ने सहमति जतायी तथा 15% लोगो ने असहमति जतायी। इससे साफ़ अनुमान लगाया जा सकता है आज के भारत में पुरूष प्रधानता की समानता 14वी व 15वी शताब्दी के आस-पास के युरोप के समाज में देखी जा सकती है।

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खेल विधेयक आया तो, भारी पड़ जायेगा!


SPORTS BILL

खेल विधेयक आया तो, भारी पड़ जायेगा! शायद यही सोचा, हमारे मंत्रीयों ने तभी खेल विधेयक को केबिनेट की मीटिंग में हुई विधेयक पर चर्चा के बाद ही अलविदा कह दिया। अब देखिये ऐसी क्या मुसीबते टूट पडतीं, अगर खेल विधेयक इसी संसद सत्र में पास कर दिया जाता। दिल्ली यूनीवर्सिटी से अपना राजनीतिक करियर शुरू करने वाले वर्तमान के खेल मंत्री अजय माकन ने खेल विधेयक का मसविदा राष्ट्रीय खेल दिवस के खास मोके पर इसी संसद सत्र में पास कराने के उद्देश्य से केबिनेट के पास चर्चा के लिये भेजा। कहना न हो कि खेल विधेयक मजबूत विधेयक सा लग रहा है।  क्योंकि इसमें जो प्रावधान दिये गये हैं उससे राजनीतिक हस्तक्षेप खेलों से दूर तो होगा ही साथ ही साथ पूरी कार्यओरणाली में एक पारदर्शिता लाने पर भी जोर दिया गया है। सभी खेल संघो को आरटीआई के दायरे में लाकर अम जनता के प्रति संघो में विराजमान अधिकारीयों को जवाबदेही बनाने के लिये खेल विधेयक में प्रावधान दिये गया है, जिसके बदोलत जनता यह जान सकती है कि आईसीसी, बीसीसीआई, और सभी खेल बोर्ड के भीतर चल रहे मोद्रिक लेन-देन और कामकाज आदी को सही रूप से अंजाम दिया जा रहा है या नही, ऐसे में खेल बोर्डो से जुडे अधिकारीयों के विरोध का बाहर फ़ूटकर निकल आने को स्वभाविक कहा जा सकता है।

fixed match

अब सवाल तो यह है कि  एक मजबूत खेल विधेयक अने को लेकर हमारे मंत्रीयों को इतना कड़ा एतराज क्यों हो रहा है? अखिर क्यों नहीं आने देना चाहते कोई भी मजबूत विधेयक? ललित मोदी के कार्यकाल के दौरान आईपीएल-3 में करीब 470 करोड़ के वित्तिय घॊटाले की जो पोल खुली थी, वो सबके सामने है। ऐसे केसे  कोई पूरा विश्वास कर सकता है कि खेल संघो में घोटाले नही होते है। दरसल जिन मंत्रीयो ने खेल विधेयक का विरोध किया है,वे सब कही न कही किसी न किसी रूप में खेल संघो से जुडे हुये है, ऐसे में वे कतई नही चाहेंगे कि वें आरटीआई के दायरे में लाये जाये। कहना अतिश्योक्ति हो सकता है, लेकिन कहने में कोई हर्ज नही कि मंत्री कभी नही चाहेंगे कि उनकी उपरी कामाई कैसे और किन स्त्रोतो से हो रही है वह सबके सामने खुल जाये। खेल विधेयक के प्रावधानो के अनुसार खेल महासंघो में नियुक्त होने वाले पदाधिकारी भी खिलाडी ही होने चाहीये, इस पर भी खासा जोर दिया है। तो इससे साफ़ जाहिर है कि मंत्रीयों द्वारा खेल विधेयक का विरोध करने के पीछे अपने अधिकार क्षेत्र समाप्त होने का भी डर दिखाई देता है।

sports

गोरतलब है कि बीसीसीसीआई को वित्तीय मामलो में सरकार द्वरा काफ़ी छूट भी दी हुई है। ऐसे में यह संदेह गहरा हो जाता है कि जब बीसीसीआई जैसे खेल नियंत्रक बोडी स्वतंत्र होकर काम क्यों करना और अन्दरखाने चल रहे वित्तीय लेन-देन की जानकारी किसी को देना नही चाहती है? यह एक बहस का प्रश्न हो सकता है। खेल विधेयक में दिये प्रावधानो के अनुसार खेल महासंघो में नियुक्त पदाधिकारीयों की उम्र की सीमाऎं बांधते हुये 70 वर्ष की अधिकतम उम्र अनिवार्य बताया गया है। यहां अगर देखा जाये तो सन 1937  जन्मे जम्मू- कशमीर के पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारुख अब्दुलाह जो इस समय जम्मू-कशमीर खेल संघ की कमान संभाले हुये 70 साल की उम्र को पार कर गये हैं, फ़िर भी खेल संघ के पदाधिकारी हैं।  ताज्जुब की बात तो यह है कि खेल संघो के उच्च पदाधिकारी वें लोग बनते आये है जिनका खेल से दूर तक नाता नही रहा। दरसल फ़ारुख अब्दुलाह जी मेडिकल में एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त हैं, जो खेल से विपरित समझ की ओर इशारा करती है। खेर जो भी हो कुछ न कुछ घपला जरूर है…

विधेयको पर आगे जारी रहेगा…

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दिल्ली पुलिस का कारनामा: 3 साल की बच्ची को छुड़ाया


police

दिल्ली पुलिस ने 3 साल की बच्ची का अपहरंण करने वाले 22 वर्षीय मोहम्म्द सरताज़ उर्फ़ सोनू (पिता का नाम- मोहम्म्द फ़ियाज़) को गिरफ़्तार कर एक उपलब्धी हासिल करते हुये 3 साल की बच्ची को सही-सलामत अपहरंणकर्ता से छुड़ा लिया। उत्तरी-पूर्वी दिल्ली के वेलकम इलाके में स्थित जनता कलोनी में रहने वाले इख्तीयार नाम के शख्स ने 27 अगस्त के दिन पुलिस थाने में बच्ची का अपहरंण हो जाने की खबर पुलिस को दी और शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत दर्ज होते ही इंस्पेक्टर मनमोहन सिंह को जांच का जिम्मा सोंपा गया और पुलिस मुस्तेदी के साथ सावधानी बरतते हुये अपहरंणकर्ता सोनू को गिरफ़्तार करने और बच्ची को सही-सलामत उसके चंगुल से छुड़ाने के अपने मिशन को अंजाम तक पहुंचाने में लग गई। बच्ची का अपहरंण फ़िरोती मांगने के उद्देश्य से किया गया था, इसका पता तब चला जब शिकायतकर्ता के पास, सोनू यानी अपहरंणकर्ता का फोन आया और उसने इख्तीयार यानी शिकायतकर्ता से 1 लाख 25 हजार रुपय की फ़िरोती मांगी। फ़िरोती की बात सुनकर पुलिस ने धारा 364-ए के तहत भी मामला दर्ज कर लिया। पहले से ज्यादा मुस्तेदी दिखाते हुये शाहदरा के एसीपी श्री धरमबीर जोशी की देखरेख में एक विशेष जांच टीम गठित की गई। जिसके बाद कई संदिग्ध जगांहो पर छापे भी मारे गये। अब तक की जांच में पुलिस को यह अंदाजा हो चुका था कि बच्ची का अपहंरण करने वाला कोई जानकार हो सकता है। इसी दौरान पीड़ित परिवार के एक करीबी से भी पूछताछ की गई थी। जांच को एक सटीक निष्कर्ष तक ले जाने के लिये पीड़ित परिवार से पारिवारिक प्रष्टभूमि के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने की कोशिश भी की गई लेकिन अभी तक कोइ ठोस तथ्य हाथ हाथ नही लग पा रहे थे। पूरी जांच के दौरान पीड़ित परिवार के पास करीब तीन बार अपहंरणकर्ता का फ़िरोती मांगने के उद्देश्य से फोन आया। पुलिस ने तुरंत सावधानीपूर्ववक जांच को अंजाम तक ले जाने के लिये अपहंरणकर्ता की तरफ़ से की जा रही फ़ोन कोल्स को सर्विलांस पर ले लिया था। जांच टीम ने करीब 20 पीसीओ के मालिको से बातचीत कर जांच में मदद करने और संदिग्ध व्यक्तियों की सूचनाये देने के लिये राजी किया। चांद बाग इलाके से मोहम्मद सरताज़ उर्फ़ सोनू नाम के एक शख्स को गिरफ़्तार किया गया। गांझे के नशे के आदी हो चुके सोनू से जांच टीम ने कड़ाई से पूछताछ की तो पता चला कि सोनू ने ही भारी भरकम पैसो की फ़िरोती मांगने के लिये बच्ची का अपहरंण किया था। इस प्रकार ठीक 28 अगस्त को दिल्ली पुलिस की स्पेशल टीम ने एक उपलब्धी हासिल करते हुये 3 साल की बच्ची को अपहरणकरर्ता के चंगुल से छुड़ा लिया। अपहरनकर्ता सोनू उत्तर-प्रदेश बरेली के मोहल्ले हाजीपुर का निवासी है और दिल्ली में अपने कीसी रिस्तेदार यहां रह रहा था। जानकारी के मुताबिक मोहम्म्द सरताज़ उर्फ़ सोनू  गांझा पीने का आदी हो गया था और चांदबाग स्थित एक इम्ब्रोईरी की दुकान पर काम किया करता था। कुछ समय पहले ही उसने काम छोड़ा था।

Information Got from Press Release that given by Sanjay Kumar Jain ( IPS Officer, North-East Delhi)

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पत्रकारिता बदल गयी!


सन 1947 के दौरान और उसके बाद की पत्रकारिता का उद्देश्य शुद्ध जानकारीय्यों को समाज तक पहुंचाकर जागरुक करना था। जैसे-जैसे वक्त गुजरता गया, पत्रकारिता का मतलब काफ़ी हद तक बदलता गया। आजादी से पहले और उसके बाद की पत्रकारिता पर नजर डालें और आज की पत्रकारिता की ओर देखे तो दोनो पत्रकारिता के बीच एक बहुत बडा फ़ासला दिखाई दे जाता है। 21वी सदी की पत्रकारिता का अर्थ “व्यवसाय” होकर रह गया है। कहना अनुचित न होगा कि इसी व्यवसायीकरण  ने ही पत्रकारिता को पूरी तरहं बदल डाला है। अब पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सूचनाओं को समाज तक पहुंचाना नही रह गया बल्कि समाज का मनोरंजन कर किसी तरहं जल्द से जल्द शोहरत और पैसा बटोरा जाये यह रह गया है।
प्रोफ़ेसर अनंद कुमार का यह कहना कि आज की मीडिया “ट्रिप्पल-सी” यानी क्राईम,सिनेमा,क्रिकेट के इर्दगिर्द ही घूमती दिखाई देती है आज की मीडिया पर बिलकुल सटीक ठहरता है इसके साथ ही मीडिया कार्यप्रणाली कहां तक सीमित हो गई है, इसको बखूबी बयान करता है। आज अगर देखा जाये तो न्यूज चेनल हो या न्यूज पेपर सभी इन्ही “ट्रिप्पल-सी” के इर्दगिर्द की खबरे बडे चाऊ के साथ प्रकाशित और प्रसारित करते दिखते है। कहना गलत न होगा कि समाज भी बडे ही चाऊ के साथ इसे पढता, देखता और सुनता दिखाई देता है।
इस बात से हम सभी बखूबी वाकिफ़ होगें कि हमारा देश गांवो का देश है। आज भी हमारी जनसंख्या के सत्तर प्रतिशत नागरिक ग्रामीण इलाको में ही निवास करते हैं। इसके अलावा चाहे हम कितना ही क्यों ना इस भ्रम में रहकर ये भले ही सोच लें कि आज हमारे देश में अंधविश्वास खतम हो गया है। लेकिन सच्चाई यही है कि आज भी हमारे भारत में रह रहा एक बडा तबका अंधविश्वास को अपना धर्म मान चुका है। ऐसे में सभी जानते है कि इस अंधविश्वास की इस समस्यां को काफ़ी हद तक खत्म करने में लोकतंत्र के चौथे खम्भे का एक सबसे मजबूत और ताकतवर भाग इलेक्ट्रोनिक मीडिया यानी न्यूज़ चेनल्स बहुत ही कामयाब भूमिका निभा सकते है। पर ऐसा सोचना ठीक है लेकिन शायद ऐसा हो पाना मुशकिल लगता है। क्योंकि आज के समाचार चेनल्स टी० आर० पी० रूपी कैंसर से पूरी तरह पीडित हो गये हैं। अब तो चेनल को क्या चाहिये सिर्फ़ टी० आर० पी०, क्योंकि जितनी टि० आर० पी० सातवे आसमान पे होगी उतनी ही मोटी कमाई होगी यानी जितने ज्यादा लोग चैनल को देखेगें चैनल उतना प्रसिद्धि की सीढीयां चढेगा तो जाहिर सी बात है कि बड़ी-बड़ी और नामी गिरामी कंपनीया अपने उत्पाद को बेचने के लिये उनके पास दौड़ी चली आयेगीं जो समाचार चैनलों के लिये एक ऐसा होगा जैसे किसी जन्मो से प्यासे को पानी मिल गया हो। नोएडा के एक मकान में सात महीने से बंद रहने वाली दोनो बहनो के प्रकरण की कवरेज को लगभग सारे समाचार चैनलों ने इतनी ज्यादा तवज्जो दी कि चैनल पर तीन दिन तक कोई भी दूसरी खबर का खुल कर विवरण दिया ही नही गया और घूम-फ़िर बार-बार बस एक ये ही खबर दिखाई जाती रही। लग तो ऐसा रहा था मानो पता नही कितने दिनो से चैनल बस ऐसी ही अलग खबर का जोर-शोर से इंतजार कर रहे थे। कुछ कवरेज में तो लगभग सभी चनलों ने मनोवैज्ञानिको के थोड़े बहुत विश्लेषणों के माध्यम से दिखाए कि दोनो बहने “डिप्रेशन” रूपी भयंकर बिमारी का शिकार हो गयी थी जिसके चलते उन्होने ऐसा कदम उठाया पर इन वैज्ञानिक सटीक विश्लेषणों से खबर को ज्यादा बढा चढा कर पेश नही किया जा सकता था और चेनलो को अलग खबर जब तक नही मिलनी थी तब तक तो टी० आर० पी० को कायम तो रखना ही था। अब जहां इंडिया टी०वी अपनी भारी भरकम डरावनी आवाज के इस्तेमाल के लिये जाना जाता है वही सभी चेनलो का खबर बताने का तरिका डरावनी भारीभरक आवाज में तबदील तब होता दिखा जब बड़ी बहन की डायरी में काला जादू का जिक्र आया। सभी चेनलो ने एक-एक करके काले जादू के जिक्र को इतना उठाया कि कितनो को तो ऐसा लगने लगा होगा कि शायद दोनो बहनो की ये हालत काले जादू के कारण ही हुई थी। अगर चेनल चाहते तो परिवार की हालत के पीछे काले जादू की प्रभाव होने वाली बात को खण्डित कर सकते थे। पर ऐसा क्यों करेगें वे! क्योंकि आज चेनलो का लक्ष्य लोगो को जागरुक करना नही बल्कि लोगो को भ्रम में रख कर मोटी कमाई करना है। अगर हालिया के किये गये एक सर्वे कि बात की जाये तो करीब 70 प्रतिशत लोगो ने इस बात को मना कि आज भी गांवो में क्या शहरो में अंधविश्वास कम नही हुआ है। चैनलों के ऐसे रवये को देखते हुये तो यही कहा जा सकता है कि अंधविश्वास के प्रति लोग जागरुक होने बजाये इसकी गहरी खाई में लगातार गिरते चले जायेगें और चेनल अपने लालच रूपी तीर को साधते हुये आम जनता के मन में काले जादू जैसे अंधविश्वास के आकार को फ़ेलाने में अपनी भूमिका निभाते जायेगें।
पेड न्यूज:-  पेड+न्यूज के बारे में हम सभी परिचित क्योंकि कोई भी जानकारी जब किसी संचार माध्यम से लोगो तक पहुंचती है वही न्यूज कहलाती है और अब बात आयी कि अखिर यह पेड न्यूज क्या है भला? पेड न्यूज को हम इस प्रकार समझ सकते है कि जब किसी घटना स्थल मोजूद व्यक्ति से पैसे लेने के बाद न्यूज को किसी प्रकार तोड-मरोडकर दिखाना है, ये फ़िक्स कर लिया जाता है और जानकारी या न्यूज को पैसे देने वाले के बताये अनुसार चाहे वह गलत हो या सही सीधा लोगो तक संचार माध्यम से पहुंचा दिया जाता है। अब सवाल उठता है कि लोकतंत्र या समाज को अखिर पेडन्यूज से क्या नुकसान है? तो सीधी बात समज आती है कि एक जानकारी ही मानव को उसके आस-पास क्या घटित हो रहा है एक न्यूज के रूप में उस तक पहुंचती है और अगर वही जानकारी गलत न्यूज के रूप में लोगो तक पहुंचेगी तो उसका कोई अच्छा प्रभाव तो पडने वाला है नही! जाहिर सी बात है कि अगर जानकारी लोगो तक पहुंचेगी तो उनका नजरिया भी एक गलत दिशा में जाने लगेगा यानी अगर सीएजी जांच कमेटी की रिपोर्ट में दि गई पडताल को ठीक उलट बताकर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की छ्वी को मीडिया पैसे लेने के बाद बिलकुल पाक-साफ़ बता कर प्रसारित और प्रकाशित कर देती तो शायद हमारा नजरिया भी यही कहता कि शीला दीक्षित ने भ्रष्टाचार में कोई भूमिका नही निभाई। अब क्या कहे आज की पत्रकारिता को बस यही कह सकते है कि पत्रकारिता बदल-बदल कर बदल गयी!

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भारत-पाक के बीच फ़ासंले खत्म हो पायेगें?


इतिहास गवा है कि भारत और पाकिस्तान के बीच एक लम्बे समय से चल रहे विवादो को दोनो देशो के मुख्याओ ने कई बार सुलझाने की कोशिश की होगी और कर भी रहे हैं। लेकिन यहां एक सवाल जरूर जहन में आता है कि भारत-पाक के बीच विवादो का सिलसिला क्या कभी थमेगा? या ये खटास दोनो देशो के बीच यूही बरकरार रहेगी?
मुश्शरफ़ से लेकर गिलानी तक कई बेठके हुईं लेकिन इनका कोई संतोषजनक परिणाम देखने को नही मिला। पिछले दिनो क्रिकेट विश्व-कप के दोरान पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ़ रजा गिलानी के साथ भारतीय प्रधानमंत्री डा० मनमोहन सिहं के बीच बातचीत के दोरान जो भी निष्कर्ष और विचार सामने आये उससे कतई नही लगा कि दोनो में से किसी भी देश ने रिश्तो में मिठास लाने के लिये कोई स्पष्ट कदम उठाया हो या अपनी बात को स्पष्टता से रखा हो। इन बातो से हर भारतीय के मन में एक सवाल घर जरूर कर गया होगा कि “क्या ऎसे ही हर साल दर साल बेठके चलती रहेगीं और अपनी स्पष्टता से बात ना रखते हुये दोनो देश एक दूसरे के केदीयों को रिहा करते रहेगे?”  या ये कहीये कि दोनो देश कहीं ना कहीं एक संदेह को पाले हुये है कि अगर उसने अपनी बात स्प्ष्ट रूप से रखी तो इससे दूसरा देश उस पर हावी हो सकता है। खेर जो भी हो लेकिन बात जो करनी होती है वह तो स्प्ष्टता और सटीक रूप से  रखी नही जाती बल्कि आतंकी हमलो या दोनो देशो के भीतर हुये आतंकी घुसपेठ या कांडो तक ही चर्चा सीमित रह जाती है। अभी हाल ही में संपन्न हुइ उच्च स्तरीये बातचीत में पाकिस्तानी विदेशमंत्री हीना रब्बानी खार और भारत के विदेश मंत्री एसएम क्रष्णा के बीच हुई बात चीत में भी कोई खास संतोषजनक परिणाम देखने को नही मिल पाये है। 26/11 के हमले के बाद से दोनो देशो के बीच फ़ांसला कम करने की कोशिशे कम सी हो गयी थी। पर लम्बे समय के अंतराल के बाद भारत-पाक ने बातचीत करने और शांतीपूर्ण रिश्ता कायम करने के लिये विवादित मुद्दो पर चर्चा करने के लिये राजी हुये। लेकिन हर बार की तरहं इस बार भी दोनो तरफ़ से सिर्फ़ विश्वास बहाली ही हो पायी इससे ज्यादा कुछ ऐसा परिणाम देखने को नही मिला जिससे समस्याओं का हल मिलता दिखाई दे।

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भारत-चीन के बीच दोस्ताना रिश्ते मजबूत बनने की ओर…..


भारत और चीन दोनो देश विकासशील देश हैं और तेजी से विकास की ओर बढती अर्थव्यवस्था भी। चीन ने जिस तेजी से बढती हुई जनसंख्या जैसी समस्या के बावजूद विश्व के सामने अपने आपको मजबूत बनाये रख कर, जो चुनोती दी है, काबीले तारीफ़ है। ठीक चीन की ही तरहं भारत भी एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था है , जो आने वाले कल में विश्वश्क्ति होने का दावा भी कर रही है। दोनो देशो की इन स्थितियों को देखते हुये चीन और भारत के मधुर संबन्ध बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं। चीन और भारत के बीच दोस्ताना और शांतीपूर्ण संबन्ध जितने दोनो देश की अर्थव्यवस्था में उतार-चढाव में संतुलन बनाये रखने के लिये अहम हैं उतने ही दोनो देशो की जनता के लिये भी बेहद जरूरी हैं। अर्थिक नजरिये से देखने पर चीन-भारत के संबन्ध बहुत ही महत्व रखते है। भारत-चीन “ब्रिक्स समूह” के सदस्य हैं, जिसमें व्यापारिक साझादारी बढाने पर खासा जोर दिया जाता है।  भारत और चीन ने दोनो तरफ़ से व्यापारिक साझेदारी बढाने पर जोर देते हुये साल 2015 तक करीब 100 अरब डॉलर का व्यापार करने का लक्ष्य रखा है। जो दोनो देशो के लिये फ़ायदेमंद साबित होगा। इससे पहले भी भारत और चीन के बीच शांती पूर्ण व्यापारिक समझोते के कारण साल 2010 में लगभग 60 अरब डॉलर का व्यापार हुआ। एक अनुमान के मुताबिक भारत, चीन से लगभग 20 अरब डॉलर का आयात करता है। पहले की तुलना में भारत और चीन के बीच शांतीपूर्ण व्यापारिक गतिविधियां काफ़ी बढी हैं। जिससे भविष्य में दोनो देशो के संबन्ध में लम्बे समय तक शांतीपूर्ण ढंग से रिश्ता बने रहने को बल मिलता है। चीन और भारत के बीच सीमा विवाद भी लम्बे समय से चला आ रहा है। कई वार्ताए हुईं जिनसे दोनो देशो में हर स्तर पर करीबीया बढती हुई नजर आयी हैं। देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ से वार्ता के दौरान ब्रहमपुत्र नदी बांध पर उठे विवाद पर चर्चा की है। चीन ने भारत को आश्वासन दिया है कि नदी बहाव को मोडा नही जायेगा। दरसल चीन कुछ समय से सूखे की समस्या से जूझ रहा है इसलिये उसने ब्रहमपुत्र नदी के पानी का रुख अपनी ओर मोडा है। माना जा रहा है कि चीन ब्रहमपुत्र नदी पर बांध का निर्माण कर बिजली उत्पन्न करना चाहता है।

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अन्ना की मुहिम और युवा जन-सहलाब का जूनून


youth

अन्ना ने देश में फ़ैले भ्रष्टाचार के विरुद्ध जो देशव्यापी मुहीम छेड़ी है उससे देश का हर एक वर्ग और युवा वर्ग धीरे-धीरे इतने बडे तादाद में लगातार जुड़ता चला जा रहा है कि अंदाजा नही लगाया जा सकता कि कितनी संख्या होगी। लोगो का जज़बा इस कदर बढ चुका है कि इसका अंदाजा अन्ना के जनलोकपाल बिल को अमलीजामा पहनाने के लिये रामलीला मैदान में उमड़ रही भीड़ से लगाया जा सकता है। तिलकब्रिज से लेकर रामलीला मैदान तक जाने वाली सड़क पर इधर-उधर नजर डाली जाये तो ऐसा अनुभव होता है कि जिन लोगों की भीड़ या जो भी लोग आगे आगे बढते जा रहे हैं, जैसे आगे कोइ मेला लगा हो, पर आगे कोई मेला नही, दरसल वें सभी लोग अन्ना के समर्थन के लिये रामलीला मैदान की और कूच करते दिख रहे है। यूपीए सरकार के अड़ियल और तीखे रुख को देखते हुये अन्ना और अन्ना के साथ संघर्ष में जुटा आमजन तथा खासकर यूवा वर्ग की एक कड़े लोकपाल बिल 30 अगस्त तक लाने की उम्मीदें पूरी हो पायेगीं मुश्किल सा लग रहा है पर ज्यादा मुश्किल भी नही है।

people

सरकार समझोता करने के लिये इधर-उधर हाथ फ़ैकेंगी यह तय है। पर अभी जो बात परेशान करने वाली है, वो ये कि कहां सरकार तीखे शब्दो के वार कर रही थी और अन्ना को अनशन अपनी नई-नवेली शर्तो को थोपकर अनशन की जगहां न देने पर पूरी तरहं अड़ी हुई थी, वहीं अचानक अनशन के लिये जगहां की इज़ाजत देदी गयी, और वो भी रामलालीला मैदान में। अगर हम यह मान लें कि सरकार इतने बड़े जनसहलाब को देखकर डर गयी, तो यह सरासर गलत सोचना है। दरसल सरकार तो पहले ही जानती है अगर अन्ना ने आवाज बुलंद की तो उसके साथ देश भर में कई आवाजे बुलंद होंगी। क्योंकि अन्ना एक बार तो अनशन कर नही रहे बल्कि वह तो समाजिक सुधार करने के लिये ही जीवनभर संघर्ष करते आये है। इतना तो तय है कि यूपीए सरकार के पास कोई न कोई खिचडी जरूर पक रही है।

MP of congress

“अन्ना बात करें, साथ मिलकर काम करें और हम साथ मिलकर समस्याओं का हल निकालेंगे” यह बात कही है कोंग्रेस के प्रवक्ता राशिद अल्वि ने सारी दुनिया के सामने आईबीएन7 पर चल रही चर्चा के दौरान संदीप चौधरी जी के बीच का रास्ता खोजने को लेकर एक प्रश्न के जवाब में। इन बातो से साफ़ झलक रहा है कि अन्ना को राजनीति में आकर सरकार से हाथ मिलाकर काम करने के लिये खुली दावत है। कहीं हमारी यूपीए सरकार यही तो नही चाहती? यह एक बहस का प्रश्न हो सकता है।
अन्ना के जनलोकपाल के समर्थन में जुटे कुछ यूवा वर्ग कि राय जानने पर उन लोगो की बात गलत साबित हो जाती है जो सोचते है और कहते है कि जो लोग अन्ना के लोकपाल के समर्थन में खड़े हो रहे है उनको लोकपाल के बारे में कूछ मालूम ही नही। बल्कि हकीकत तो यह है कि देश का यूवा जनलोकपाल के बारे में केवल जानते ही नही अच्छी तरह समझते भी है। साथ ही साथ सरकारी लोकपाल बिल और अन्ना के लोकपाल बिल में अंतर भी बखूबी समझते है।

दिल्ली विश्वविधालय के किरोरीमल कोलेज में पढने वाले राजनीति विषय के छात्र आशिश सिंह ने अपनी बैबाक जबान में आपनी राय देते हुये कहा कि प्रधानमंत्री,एमपी,एमएलए और यहां तक की न्यायपालिका को भी लोकपालबिल के दायरे में लाना बेहद जरूरी है।

A girl dedicated

यूवाओं का जज़बा देखने लायक है:-रामलीला मैदान की हालत बारिश होने से इस कदर खराब है कि जहां पैर रखा वहीं धसं जा रहा है पर इससे यूवाओ में जज़बा कम हुआ ऐसा बिलकुल नही दिख रहा बल्कि देश के यूवा और बच्चे व महिलाएं सभी अपने हाथो से ही जमीन को समथल बनाने में जुटे हुये है और जगह-जगह भरे हुये पानी को हाथो से ही नाली बना कर बाहर की ओर बहा रहे हैं।

youth is dedicated

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