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क्या महिलाओ की स्थिति और स्वतन्त्रता में आज भी सुधार एक भ्रम?


 

क्या महिलाओ की स्थिति या उनके अधिकारो में स्वतन्त्रता आ पायी है? या बस अधिकारो में स्वतन्त्रता की सुधार मात्र की शुरूआत हुई है?
या अभी भारत में महिलाओ को पूर्णं रूप से स्वतन्त्रता से अपने अधिकारो का उपयोग करने का अवसर ही नही दिया जाता?… क्या आज का भारत एक रूढीवादी और पारम्परिक सोच को महत्व देता है?… ये सवाल ऐसे है जिनका उत्तर ढूंढा तो जा सकता है परन्तू सरलता से नही।
वर्तमान युग में महिलाओ के अधिकारो की स्तिथि में एक बदलाव देखा जा जा रहा है। लगातार ऐसा प्रतीत होता है कि नारी को अधिकारो की स्वतन्त्रता मिल गयी है पर यहा एक प्रश्न ये सामने आता है कि क्या नारी को उसके स्तिथि में सुधार के साथ- साथ अधिकारो की स्वतन्त्रता सही रूप में मिल पा रही है? या क्या इतनी स्वतन्त्रता मिल पा रही है जिसके बल पर वे पूरूष प्रधान समाज में अपने पूर्ण अधिकारो की रक्षा के लिये लड़ सके?
आज भारत की लगभग 70 करोड़ जनसंख्या ग्रामीण इलाको में निवास करती है। इन 70 करोड़ जनसंख्या में (पूरूष=1000/नरी=930 नारी) नारी की पूरूषो से कम लेकिन एक भारी संख्या जरूर होगी। पर क्या दूर गावं में रह रही नारी के पास अधिकारो में सुधार पंहुच पाये है? अगर पहुच पाया है तो किस हद तक गावं निवासी नारी स्वतन्त्रता अधिकारो की सुरक्षा का लाभ उठा पा रही हैं?…
हाल ही में, आरटीई इंटरनेशनल विमन ग्लोबल हेल्थ इम्पेरेटिव, भारतीय प्रबंधन संस्थान, बेंगलुर और नारी के मुद्दो पर शोध करने वाली संस्था इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन विमन आदी द्वारा शोध किया गया जिसमें ये निष्कर्ष आया कि महिलायें जो काम पर जाया करती हैं या घर की दहलीज लांघ कर नोकरी पर जाती हैं उन्हे अपने पति द्वारा कड़े विरोध का सामना करना पड़ता है। और जिन महिलाओ ने इस शोध में भाग लिया था उनमें से 56% महिलाये हिंसात्मक विरोध का सामना पहले ही कर चुकी थी। इससे साफ़ जाहिर होता है कि आज भी भारत में पूरूष एक पारम्परिक तथा रूढीवादी मानसिताओ को अपने मस्तिष्क के किसी कोने में छूपाये महिला की जीविका का खुद ही निर्धारण करना चाहता है। लेगिंग संवेदनशीलता की समस्या एक बडी समस्या उभरकर आज के भारत को 14वी व 15वी शताब्दी के आस-पास के यूरोप के इर्ध-गिर्ध ला कर रोक देती है। क्योंकि उस युग में भी लेंगिक संवेदनशीलता एक बहुत बड़ी समस्या बनकर उभरी थी। ठीक उसी प्रकार अगर कुछ मानसिकताओ को दूर रखते हुये सिर्फ़ नारी के स्वतन्त्र अधिकारो की स्थिति की बात की जाये तो ये समस्या द्र्ष्टिगोचर होती है कि उस समय के यूरोप में भी नारी के अधिकारो की सीमाओ का पूरूष द्वारा निर्धारणं करने का पूरा प्रयास किया जाता था। 15वी शताब्दी के आते-आते यूरोप कि नारी उन पर लगायी गयी पाबन्दीयों का विरोध करने लगी थी परन्तू वो विरोध इतना प्रबल नही था कि जिसके बल पर वे अपने पूर्णं अधिकारो की रक्षा करते हुये एक दीर्घकालीन विरोध जतायें। लेकिन इस विरोध से अधिक अच्छा तो नही पर उससे कम, नाम मात्र का सुधार नारी की स्थिति में देखा गया था। इसका उदाहरणं हम इस बात में ढूंढ सकते है कि फ़्रांस के एक इतिहासकार “अगरिप्पा द-एयूबिग्ने” ने अपनी बेटी को लेटिन पढने के लिये भेज दिया था। पर क्या इतना सुधार उस समय के यूरोप में नारी की स्तिथि के सुधार के लिये काफ़ी था?.. अगर मान लिया जाये कि 15वी शताब्दी के आस-पास के यूरोप में कड़ा विरोध जताने के बाद अपने अधिकारो में एक अधूरी स्वतन्त्रता प्राप्त करने में सफ़ल होने वाली नारी का प्रतिशत लगभग 15% से 20% था परन्तू ये प्रतिशत उस समय यूरोप कि 100% जनसंख्या के मुकाबले एक बहुत अधिक छोटा प्रतिशत होगा। इसी प्रकार इस बात से तो कोई असहमति नही जतायेगा कि आज के भारत में नारी द्वारा स्वयं विरोध जताने पर उनकी स्तिथि में सुधार के निरन्तर प्रयास किये जा रहे हैं। मान लिया जाये कि 100% शहरी नारी जनसंख्या में 15% नारी कड़ा विरोध जताने के बाद अपने अधिकारो में एक अधूरी स्वतन्त्रता प्राप्त करने में सफ़ल हो गंयी। और 100% गावों में निवास कर रही नारी की जनसंख्या में 10% नारी अपने अधिकारो में एक अधूरी स्वतन्त्रता प्राप्त करने में सफ़ल हो गंयी । गावं की 70 करोड़ जनसंख्या में लगभग 25 करोड जनसंख्या नारी की मान ली जाये तो, नारी की लगभग 25 करोड जनसंख्या के सामने जो 10% गावं की महीला जो अपनी स्थिति में अधूरी स्वतन्त्रता प्राप्त करने में अगर सफ़ल हैं तो ये (10% गावं की महीला) प्रतिशत गावों मे महीलाओ के निवास प्रतिशत से बहुत अधिक छोटा प्रतीत होता है और इसी प्रकार शहर की नारी की जनसंख्या का लगभग 15% भाग का सफ़ल हो पाना नाम मात्र का प्रतीत होता है। आज भारत की जनसंख्यां लगभग 1 अरब से ज्यादा पहुंच चुकी हैं। अगर एक अरब की जनसंख्या के सामने शहर की 15% और गावं की 10% नारी जो अधिकारो की स्वतन्त्रता प्राप्त करने में शायद सफ़ल रही हों, बहुत ही नाम मात्र का और छोटा प्रतीत होता है। जिससे ये अनुमान भी लगाया जा सकता है कि आज पूरूष प्रधानता की समस्या या लेंगिक संवेदनशीलता की समस्या लगातार बनी हुई है। जिसके करणं आज के भारत को 14वी व 15वी शताब्दी के आस-पास के यूरोप से काफ़ी हद तक जोड़ कर देखा जा सकता है। हालिया में, मेरे द्वार लगभाग 100 लोगो में एक सर्वे किया गया, जिसमें
“क्या आप इस बात से सहमत हैं कि आज के भारत में नारी की स्थिति तथा उनके अधिकारो की स्वतन्त्रता में सुधार तो देखा जा रहा है पर इतना सुधार नहीं कि जिसके बल पर वे अपने उपर हो रहे अत्याचारो का ठीक से विरोध कर सके?…” ये सवाल पूछा गया, इस सवाल में जवाब में 87% लोगो ने सहमति जतायी तथा 15% लोगो ने असहमति जतायी। इससे साफ़ अनुमान लगाया जा सकता है आज के भारत में पुरूष प्रधानता की समानता 14वी व 15वी शताब्दी के आस-पास के युरोप के समाज में देखी जा सकती है।

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भारत-पाक के बीच फ़ासंले खत्म हो पायेगें?


इतिहास गवा है कि भारत और पाकिस्तान के बीच एक लम्बे समय से चल रहे विवादो को दोनो देशो के मुख्याओ ने कई बार सुलझाने की कोशिश की होगी और कर भी रहे हैं। लेकिन यहां एक सवाल जरूर जहन में आता है कि भारत-पाक के बीच विवादो का सिलसिला क्या कभी थमेगा? या ये खटास दोनो देशो के बीच यूही बरकरार रहेगी?
मुश्शरफ़ से लेकर गिलानी तक कई बेठके हुईं लेकिन इनका कोई संतोषजनक परिणाम देखने को नही मिला। पिछले दिनो क्रिकेट विश्व-कप के दोरान पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ़ रजा गिलानी के साथ भारतीय प्रधानमंत्री डा० मनमोहन सिहं के बीच बातचीत के दोरान जो भी निष्कर्ष और विचार सामने आये उससे कतई नही लगा कि दोनो में से किसी भी देश ने रिश्तो में मिठास लाने के लिये कोई स्पष्ट कदम उठाया हो या अपनी बात को स्पष्टता से रखा हो। इन बातो से हर भारतीय के मन में एक सवाल घर जरूर कर गया होगा कि “क्या ऎसे ही हर साल दर साल बेठके चलती रहेगीं और अपनी स्पष्टता से बात ना रखते हुये दोनो देश एक दूसरे के केदीयों को रिहा करते रहेगे?”  या ये कहीये कि दोनो देश कहीं ना कहीं एक संदेह को पाले हुये है कि अगर उसने अपनी बात स्प्ष्ट रूप से रखी तो इससे दूसरा देश उस पर हावी हो सकता है। खेर जो भी हो लेकिन बात जो करनी होती है वह तो स्प्ष्टता और सटीक रूप से  रखी नही जाती बल्कि आतंकी हमलो या दोनो देशो के भीतर हुये आतंकी घुसपेठ या कांडो तक ही चर्चा सीमित रह जाती है। अभी हाल ही में संपन्न हुइ उच्च स्तरीये बातचीत में पाकिस्तानी विदेशमंत्री हीना रब्बानी खार और भारत के विदेश मंत्री एसएम क्रष्णा के बीच हुई बात चीत में भी कोई खास संतोषजनक परिणाम देखने को नही मिल पाये है। 26/11 के हमले के बाद से दोनो देशो के बीच फ़ांसला कम करने की कोशिशे कम सी हो गयी थी। पर लम्बे समय के अंतराल के बाद भारत-पाक ने बातचीत करने और शांतीपूर्ण रिश्ता कायम करने के लिये विवादित मुद्दो पर चर्चा करने के लिये राजी हुये। लेकिन हर बार की तरहं इस बार भी दोनो तरफ़ से सिर्फ़ विश्वास बहाली ही हो पायी इससे ज्यादा कुछ ऐसा परिणाम देखने को नही मिला जिससे समस्याओं का हल मिलता दिखाई दे।

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महंगाई, भ्रष्टाचार और तिगड़मबाजी के बोझ से दबा आम आदमी


दो साल पूरे होने पर जश्न मना रहे या आम आदमी की हालत पर ……..

महंगाई की मार

आज महंगाई की मार आम आदमी को झेलनी पड़ रही है, इस बात कि फ़िक्र सरकार को है ऐसा किसी भी एंगल से नही लगता। महगांई क्या चीज होती है वो तो सिर्फ़ वर्तमान में जैसे-तैसे गुजर बसर कर रहा आम आदमी ही बता सकता है। लेकिन केंद्र सरकार इस समय पूरी तरहं सहमीं हुई है, और किसी भी तरहं अपनी सत्ता बनाये रखने के लिये उल्टे-सीधे जतन कर रही है। अगर सही माइनो में कहा जाये तो इस समय सरकार चारो तरफ़ से विरोधो से इस कदर घिरी है कि बस हालत देखने लायक है। और ऐसे में जब सरकार पूरी तरहं से भ्रष्टाचार में लिप्त है और एक एक कर सरकार की छत्र-छायां में जो लूट मची हुई है उसकी पोल जैसे-जैसे खुल रही है, केंद्र में सत्ता चला रही कोंग्रेस खुद ही अपने शब्दो के जाल में फ़सती जा रही है।

राहुल गांधी सत्ता को बचाने का एक मात्र सहारा

शायद इस बात को जनता जान गई थी कि राहुल गांधी सीधे-सीधे सामने आकर राजनीति नही करेंगे। पर जनता कि ये सोच ठीक उल्टी साबित तब हो गई जब राहुल गांधी सीधे भाट्टा-पारसौल में चल रहे अंदोलन और यूपी सरकार की निरंकुशता में पिस रहे किसानो को सांत्वना देने पहुंच गये। अगर थोडा जोर दिया जाये और देखा जाये तो ये साफ़ पता चलता है कि आखिर अक्सर शब्दो की राजनीति करने वाले राहुल सीधे सामने आकर राजनीति क्यों करने लगे। दरअसल राहुल खुद भट्टा पारसौल नही गये, बल्कि उन्हे कोंग्रेस की सोची-समझी रणनीति के तहत भट्टा पारसौल किसानो तक पहुंच कर सहानुभूति के नाम पर राजनीति करने के लिये बोला गया था।  क्योकि कोंग्रेस ये अच्छी तरहं जान गई है कि इस समय जब कोंग्रेस सरकार पूरी तरहं भ्रष्टाचार में डूबी है और सत्ता की कुर्सी हाथ से निकलने की पूरी-पूरी संभवना है तो कोंग्रेस की नजर में सिर्फ़ राहुल ही एक ऐसा हथ्यार हैं जो सत्ता को कुछ हद तक बनाये रखने में सफ़ल हो सकते हैं। कहते है ना जब “विनाशकाये विपरित बुद्धी” यानी अंत निकट होता है तो सोचने समझने की शक्ति भी काम करना बंद कर देती है। अगर माना जाये तो ठीक वैसा ही इस समय हमारी केंद्र सरकार कोंग्रेस की हालत है।

क्योंकि  इतने घोटालों और आरोपो मे लिप्त किसी भी सरकार या किसी भी व्यक्ति को इतना तो अंदाजा हो ही जाता है कि अब अगर थोडी सी भी चूक हुई तो चारो तरफ़ से नकारे जाने में जरा भी देर नही लगेगी। अब देखिये, केंद्र सरकार अपनी सोचने समझने शक्ति को इस कदर खो चुकी है कि वह सत्ता को कायम रखने के जौश में आकर किये गये कर्मो का बोझ आम आदमी पर दामो पर दाम बढाकर डाल रही है और उल्टे-सीधे व्यय और पता नही क्या-क्या तिगड़मबाजी करने से भी नही चूक रही।

प्रधानमंत्री मनमोहन के नेत्रत्व में तिगड़मबाजीयां

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेत्रत्व की यूपीए सरकार दो साल की सफ़लता का जश्न मना रहे हैं। पर कैसी सफ़लता का जश्न मना रही है सरकार?… बल्कि
देश में महगांई की तपन झेल कर भूके पेट सोने को मजबूर गरीब और आम-जन की हालत में कोई सुधार होता नही दिखा और न ही दिख रहा है।

सरकार की खस्ता हालत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सरकार ने गरिबो की जाती आधारित जनणना करने का फ़ैसला लिया है  और सरकार उस पर करीब 3500 करोड रुपए का खर्च करने जा रही है। वो भी तब जब देश में गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रहे गरीब भूखा-तड़पकर मर रहा है। लेकिन सरकार चाहती तो इससे पहले भी ऐसी गणना करने की सोच सकती थी लेकिन आदत से मजबूर और उलझन में पडी सरकार को देखर ऐसा लग रहा है कि उसे कुछ सूझ नही रहा है। सरकार के बेवक्त इस तरहं के खर्च को फ़िजूल खर्च ही कहा जा सकता है। दूसरी ओर देखा जाये तो  देश में इस बार अनाज की अच्छी खासी पैदावार हुई है और भंडार भरे पड़े हैं पर सरकार उस अनाज को गरीबो में मुफ़्त न सही कम दामो पर बाटने के बजाये निर्यात करने जा रही है। इससे सरकार एक अजीब रवेया का का पता चलता है कि चाहे करोडो का अनाज भंडारो में यूहीं भले ही सड़ जाये, पर वो अनाज गरीबो के भूखे पेट भरने में काम नही आना चाहीये!

मनमोहन सिंह के राज के पिछले दो सालों में महंगाई का ग्राफ़ देखा जाये तो महंगाई दोगुनी तेजी से बडी है। सरकार ने इन सालों में जनता को अपनी तिगडमबाजीयों में पूरी तरहं उल्झाकर रखा और कहती रही कि महंगाई पर दिसंबर तक, इस महिने या उस महिने तक काबू पा लिया जायेगा और महंगाई को घटाकर 6 प्रतिशत पर लाने के प्रयास किये जा रहे है। पर सच्चाई को कोन नकार सकता है, आज भी महंगाई कम होने के बजाये किस कदर आम आदमी की कमर तोडे हुये है इस बात को हम बखूबी जानते हैं। सरकार तिगडमबाजी करती रही है और आम आदमी लगातार ऐसे ही पिस रहा है।  कुल मिला अगर कहा जाये तो यही कहा जाये तो मंहगाई, भ्रष्टाचार और सरकार की तिगरडमबाजीयों के बोझ से आम आदमी पूरी तरहं दब रहा है, पिस रहा पर सरकार डरि-सहमीं पता नही किस उल्झन में उलझकर उल्टी-सीधी तिगड़मबाजीयां करने  से बाज ही नही आ रही। अब मनमोहन सरकार अपने दो साल पूरे होने पर जश्न मना रही है या आम अदमी की हालत पर, ये सिर्फ़ आम आदमी जानता है। क्योंकि सरकार को सत्ता बचाने के जौश में आकर तिगरड़मबाजी करने से फ़ुरसत मिलेगी, तभी उसका ध्यान आम आदमी की महंगाई से दबी हालत की ओर जायेगा ना!

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एक बार वो पुड़िया मिल जाये तो शान में चार चांद लग जायें!


धंऎ में उड़ती जिंदगी

आज देश क्या.. समस्त विश्व में लोग धुएं से दोस्ती को अपनी शान समझने लगे हैं। धुएं के बिना पता नही आज करोड़ो-अरबो लोग अपना जीवन काट नही सकते। यहां किसी फ़ेक्ट्री से जुडे धुएं की बात नही हो रही बल्कि कहने का अर्थ ये है कि आज युवा हो या किसी आयु वर्ग का व्यक्ति बस तबांकू से भरा एक कश लगाने को मिल जाये तो शान में चार चांद लग जाये।

ये हम नही कह रहे बल्कि ऐसा उन लोगो का मानना है जो तंबाकू के आदी हो चुके है और शायद वे ये नही जानते कि जिस सिगरेट जैसी एक महज तंबाकू से भरी कागज की पुड़िया को हाथ में लेकर वह कश पर कश लगाते हैं और धुआं उड़ाते है उसी धुएं में वो अपने जीवन के एक-एक पल को धुआं समझ कर उड़ाते जा रहे हैं।

युवा वर्ग को दिन पर दिन खाता हुआ धुंआ

आज युवा वर्ग ही इसकी चपेट में इतना आ रहा है कि इसके बिना एक पल भी रह पाना उसके लिये इतना मुश्किल है कि मानो वो सिगरेट न हो गयी बल्कि अमरित से भरी कोई हंडिया हो गयी, जिसको पी जाने से जन्नत नसीब हो जायेगी।
ये एक ऐसी लत बन चुकी है जिसे एक बार जिसने सूंघा.. मानो इसका ही होकर रह गया। आज दिल्ली जैसे बड़े  शहरों में भले ही सार्वजनिक स्थान पर सिगरेट या तंबाकू के कश लगाने पर जुर्माने के आदेश को लेकर चर्चाऎं चल रहीं हों लेकिन सच्चाई को अनदेखा नही किया जा सकता। आज भी कई लोग ऐसे हैं जिन पर ऐसे आदेशो का कोई असर नही होता और ऐसे आदेशो की धज्जीयां उड़ाते हुये सार्वजनिक स्थान जैसे बस स्टेण्ड, रेलवेस्टेशन और बाजार आदि-आदि
… पर कश लगाने को अपनी शान समझते हैं, फ़िर चाहें इससे कोई जो इन सब चीजो से दूर रहता हो… उसे चाहे केंसर क्यों न हो जाये। ऐसे में सवाल उठते हैं कि इस पर किसी की प्रतिक्रिया क्यों नही होती और क्यों लोग ऐसे लोगो को रोकना पसन्द नहीं करते जो सार्वजनिक स्थान पर धूम्रपान या तंबाकू का सेवन करने से जरा भी नही चूकते।

भरे बाजार में भी हम सिगरेट पियेगें चाहे दूसरे को केंसर क्यों न हो जाये

तो एक बात साफ़ है कि आज तंबाकू से भरी सिगरेट का सेवन करने वालो की तादाद इतनी है कि उनके सामने तंबाकू का सेवन न करने वालों की संख्या बहुत ही कम है। ऐसे में तंबाकू से परहेज करने वाले लोग हाथी के सामने    चींटी के समान साबित होते है।                                               

कुछ त्तथ्यों की माने तो ये सच्चाई सामने आती है कि हर साल करीब 6 करोड़ लोग तबांकू का सेवन करने से मर जाते हैं। जाहिर है अगर ऐसा ही रहा तो ये आकडे इससे भी उपर जा सकते है। डब्लूचओ के शोध के अनुसार लगभग हर 7 सेकंड में सिगरेट पीने से एक व्यक्ति की मोत हो जाती है। अगर ये सच्चाई सिगरेट का सेवन करने वालो को बताई जाये तो इस बात को हस के टालने में वह अपनी समझदारी मानने की भूल कर बैठेगें। खासकर यूवा वर्ग इस सच्चाई को कतई मानने को तैयार नही होगा और अगर इस सच्चाई को मानते हुये उनमे से किसी एक ने सिगरेट पीना छोड़ भी दी तो कितने दिन के लिये छोड़ेगा एक दिन-दो दिन एक न एक दिन लोट कर इसे पकड़ ही लेगा या वह नही चाहेगा तो इस लत को दूबारा से सुंघाकर उसके ही कुछ साथी लोग घूम फ़िर के वहीं आने पर उसे मजबूर कर देगें। वास्तविकता तो ये ही है कि आज एक युवा समेत एक बड़ा भाग नशे की लत से जकड़ा हुआ है।

उम्र को भी धुंऎ के साथ उड़ाते लोग

कुछ तथ्यों की बात की जाये तो सिगरेट पीने वाले लोग उन लोगो से पंद्रह साल पहले मर जाते है जो सिगरेट नही पीते। सिर्फ़ चीन में ही 2 हजार लोग तंबाकू के कारण हर एक दिन में मर जाते है। चीन में इस आंकड़े  से अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत में चीन से ज्यादा तंबाकू खाया-पिया जाता है जो भारत में तंबाकू से मरने वाले ज्यादा होगें इस बात की और इशारा करता है। डब्लूएचो की रिपोर्ट से ये बात सच बात साबित हो जाती है। क्योंकि भारत देश में हर एक दिन में लगभग ढाई हजार लोग तंबाकू के इस्तेमाल से मर जाते हैं। इसके अलावा भारत का भविष्य कहा जाने वाला 55 हजार की संख्या में यूवा वर्ग रोजाना तंबाकू का सेवन शुरू करते हैं। भारत में तबंकू से मरने वालो की संख्या आने वाले समय में इससे ज्यादा हो जायेगी इसका अंदाजा तंबाकू के लगातार बढते इस्तेमाल के कारण बढती नशे की लत से असानी से लगाया जा सकता है। डब्लूएचो की ही रिपोर्ट के अनुसार इस समय तंबाकू का प्रतिदिन लत से पीड़ित होकर सेवन करने वालों की संख्या 1.1 अरब है जो 2026 तक बढ कर करीब 2 अरब हो जाना तय है।

लगातार बढती तादाद

चिंतनीय बात ये है कि जहां तंबाकू से मरने वालों की संख्या 4.9 अरब है तो वहीं तंबाकू से मरने वालों की तुलना में एचआईवी/एड्स से मरने वालो की संख्या कुल 3 अरब है। आज नशा कितना सिर चढ कर बोल रहा है इस बात का पता तो इन आंकड़ो से चल ही रहा है इसके अलावा ये भी अंदाजा हो रहा है कि आज नशे की लत ने कितनी गंभीर समस्या का रूप धारण लिया है। भारत में धुंऎ को अपनी गमों या दुखो को भुला देने का एक मात्र जरिया समझकर एक बड़ी मूर्खता दिखाने वालों की भी कमी नही है। भला अगर महज एक नशे से भरी कागज की पुड़िया के कश लगाकर अपने दुखो को भूला दिया जाता तो आज समाज में हर पल इतनी परेशानीयां उत्पन्न होती हैं कि हर कोई कश लगाते हुये धुंऎ को उड़ाता पाया जायेगा और फ़िर शायद ही कोई ऐसी जगहा बचेगी जिस जगांह पर कोई नशा करता न दिखे।
वास्तिविक्ता तो ये है कि ये एक लत होती है जो एक इंसान को पूरी तरहं बरबाद करके ही दम लेती है। भारत में नशा आज विकट समस्या बनकर भारतीय समाज को कुछ हटकर सोचने ही नही दे रहा है।

आज समाज की इस समस्या को हल करने के उपायों की खोज करनी होंगी, नही तो इसका परिणाम बहुत बुरा हो सकता है।

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सावधान, जिस संस्थान मे आप प्रवेश लेने जा रहे है वो फ़र्जी तो नही?


इस बाजारवादी दौर में उत्पादक  अपनी चीज को कुछ भी करके बस बेचने पर लगा हुआ है| आज के दौर में एक नए प्रकार की बाजारवाद की जो अंधी चली है उसने  शिक्षा के क्षेत्र में भी बाजारीकरण को कब घोल दिया इसका शायद ही हमें एक सटीक अनुमान हो पाया हो। आज अगर एक मोटे अनुमान की माने तो निजी उच्च शिक्षा संस्थानों का दायरा 6.5  अरब डॉलर तक बढ़ गया है|  इतने बढे दायरे में पता नहीं कितने शिक्षण संस्थान तो ऐसे होगे जो कही पर आज भी किसी न किसी भोले भाले छात्र को कोर्स समाप्ती के समय नोकरी का झासा देकर अपनी ठगी करने की दूकान को चला रहे होंगे|  
हाल ही में बारवी की परीक्षाएं ख़त्म हुई है और कुछ दिनों में ही परिणाम भी घोषित हो ही जायेंगे| ऐसे में सभी छात्र  अपने आगे के करियर को लेकर चिंतित होंगे और किसी तरंह प्रवेश के लिए कोलेजो की तलास में जुटे गए है| पर आज हमारे भारत में अच्छे कोलेजो की संख्या बहुत ही कम है|  जब कोलेजो की संख्या छात्रों की तादात से बहुत कम होगी तो जाहिर है कि कड़ी प्रतियोगिता का सामना हर एक छात्र को करना ही पड़ेगा|  लाखो छात्र प्रवेश के लिए दर दर भटकते है तब जाकर उनमे से कुछ ही छात्रों को प्रवेश पाने में कामयाबी मिल पाती है|  कड़ी प्रतियोगिता के बढ़ते इस रास्ते पर दोड़ते हुये कड़ी से कड़ी प्रतियोगिता की मार झेल रहे छात्रों को गुमराह करने के लिए भी कई फर्जी संस्थान बाजार में उतर आये है| जो हमेशा भोले-भले छात्रों को अपने  ठगी के जाल में फासने के लिए हर दम तैयार बैठे होते हैं|  ऐसी स्थिति को देखते हुए छात्रों को सयंम बरतने के साथ सतर्क भी रहने की बेहद जरूरत है|  इस बारे में बिलकुल ध्यान रखे कि वर्तमान में कोई भी संस्थान सौ प्रतिशत प्रमाण भले ही दे लेकिन आज भारत में बेरोजगारी और बढती हुई जनसँख्या को देखते सभी को बराबर का रोजगार मिल पायेगा, ये सटीक अंदाजा लगाना बहुत ही कठिन है|
आप जिस संस्थान में प्रवेश लेने जा रहे है क्या वह यूजीसी या किसी सरकारी संगठन से मान्यता प्राप्त है?, संस्थान की फीस उचित है और अगर ज्यादा वसूल रहा है तो क्यों?  इन दोनों सवालों का अगर आपको  किसी भी संस्थान में प्रवेश लेने से पहले उत्तर मिल जाता है तो आप ठगी का शिकार होने से काफी हद तक अपने आपको बचा सकते है, नही तो एक बडी ठगी शिकार का होने में जरा भी देर नही लगेगी|  यूजीसी बहुत से विश्विधालयो पर छापा मारकर फर्जी घोषित कर चुकी है|
चोकने वाली बात ये है कि जहाँ उत्तर प्रदेश 9 फर्जी संस्थानों के मामले में योजीसी के अनुसार पहले नंबर पर रहा था वहीँ देश कि राजधानी दिल्ली ने 6 फर्जी संस्थानों के साथ दूसरा स्थान हासिल किया था| ये तो सिर्फ यूजीसी द्वारा एक ही बार के छापे में सामने आई सच्चाई है लेकिन अभी भी पता नहीं कितने ओर ठग, संस्थान के नाम का नकाब पहने छात्रों को शिकार बना रहे है|
 आइये यूजीसी द्वारा घोषित फर्जी विश्विधालयो पर नजर डाल लेना उचित होगा:
राजनीधा दिल्ली में-
१. वारानासया संस्कृत विश्विधालय दिल्ली
२. वारानसी विश्विधालय जगत पूरी, दिल्ली
३. कोमर्शियल विश्विधालय दरियागंज दिल्ली
४. यूनाईटेड नेशन विश्वविधालय दिल्ली
५. वोकेशनल विश्वविधालय दिल्ली
६. ऎडिआर-सेंट्रिक ज्यूरिडिकल विश्वविधालय, ऎडिआर हाउस, गोपाल टावर, दिल्ली-110008
उत्तर-प्रदेश में-
१. महिला ग्राम विश्वविधालय इलहाबद, उत्तर-प्रदेश
२. इंडियन ऎजूकेशन काऊंशिल ओफ़ यूपी, लखनऊ
३. गांधी हिन्दी विध्यापीठ, प्रयाग, इलहाबाद
४. नेशनल यूनीवसिटी ओफ़ इलेक्ट्रो होम्योपेथी, कानपुर
५. नेताजी सुबास चन्द्र बोस विश्वविधालय अलीगढ
६. उत्तर-प्रदेश विश्विधालय, कोसी कला मथुरा
७. महाराना प्रताप शिक्षा निकेतन विश्वविधालय, प्रतापगढ
८. गुरूकुल विश्वविधालय व्रन्दावन
९. इंद्रप्रस्त शिक्षा परिषद, माकन पुर
बिहार में-
१. मैथीली विश्वविधालय दरबंगा बिहा।
कर्नाटक में-
१. बादागनवी सरकार वर्ल्ड ओपन यूनीवर्सिटी, कर्नाट।
केरल में-
१. सेंट जोन्स यूनीवर्सिटी किशनथम केरला।
मध्यप्रदेश में-
१. केसरवानी विद्दयापीठ जबलपुर।
महाराष्ट्र में-
१. राजा अरेबिक यूनीवर्सिटी नागपुर।
तमिलनाडू में-
१. डी० डी० बी० संस्क्रत यूनीवर्सिटी, पुतुर

आज के बाजारीकरण के बढते प्रभाव को देखते हुये अन्त में यही कहा जा सकता है कि किसी भी संस्थान मे प्रवेश के समय पूरी सतर्कता बरते और अच्छी तरहं से जानकारी जुटाने के बाद ही प्रवेश लें। अगर किसी छात्र को किसी संस्थान की मान्यता पर जरा भी शक होता है तो वह तुरंत यूजीसी विभाग से संपर्क कर अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है जिससे यूजीसी के दिशा निर्देशो के अनुसार उचित सहायता प्राप्त की जा सकती है।

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बाछड़ा जाती:- बेटीयों को वेश्यावृत्ति और बेटो को चोरी करना सिखाना रिवाज


Women: Alone, Exploited by Society

सरिता पत्रिका में छपे साक्षात्कार में फ़िल्मकार नीतू जोशी जी ने अपनी जिस रिसर्च का जिक्र किया है, के निष्कर्ष और सतीश दुबे जी के उपन्यास-“डेरा बस्ती” के अनुसार माने तो आज भी भारत में कुप्रथाअऎं कम हो गई हैं ये भ्रम ही साबित होता है। मध्य प्रदेश से सटे रतलाम,मंदसोर और नीमच में “बाछड़ा” नाम की जाती के लगभग 150 गांव हैं। ये जानकर आश्चर्य होगा कि इन 150 गांवो में जब कोई लड़की पेदा होती है तो उसके जवान होने से पहले ही खुद उसकी मां वेश्याव्रत्ति (धन्धे) पर लगा देती है और एक ताज्जुब की बात ये है कि उसकी मां ही खुद पहला ग्राहक ढूंढने के लिये बोली लगवाती है। जो सबसे ज्यादा बोली लगाता है उसी आदमी के साथ लड़की को रात बितानी पड़ती है और इसी प्रकार गांव की हर बेटी वेश्याव्रत्ति की दलदल में फ़सकर रह जाती। जब लडकी के लिये पहला ग्राहक मिल जाता है तो इस दिन को सारे गांव वाले “बाछड़ा” जाती के लोग एक शादी की तरहं मनाते। अगर कोइ लड़की अपनी मर्जी से किसी लड़के के साथ घर बसाना चाहती है तो उसे आग पर चल कर एक परीक्षा देनी होती है। सवाल ये उठता है कि आखिर महिलाये इस कुप्रथा का विरोध क्यों नही करतीं? तो इस सवाल का एक जवाब ये है कि गांव की महीलायें भी अब इसको एक अनिवार्य पर्था मानने लगी हैं और दूसरा जवाब ये है कि जब किसी एक महिलां ने इस कुप्रथा का विरोध कर, किसी उधोगपति से शादी करली तो उसके पति उधोगपति ने भी उसको शादी के बाद वेश्याव्रत्ति के धन्धे में धकेल दिया, वह बच बचाकर वापस अपने उसी गांव में पहुंच गयी, इससे साफ़ जाहिर होता है ऐसे में कोइ महिला अगर विरोध करे तो कहां जायेगीं और इसके अलावा पुरूष इस कुप्रथा को इसलिये बन्द करना नही चाहते क्योंकि अगर ऐसा होता है तो उनको काम करना पड़ सकता है। दूसरी हेरानी की बात यह है कि जब बाछड़ा जाती के लोगो के घर कोइ लड़का पेदा होता है तो उसे पढाने-लिखाने के बजाये चोरी करना सिखाया जाता है। अब सवाल ये उठता है कि अगर ऐसी कुप्रथाऎ भारत में अभी भी मोजूद है तो इस पर सरकार ने अब तक कोई कदम क्यों नही उठाया? तो ये सरलता से समझ आता है कि ये कुप्रथाऎं किसी एक गांव में तो हैं नही, जो नैताओ को इनके खिलाफ़ ठोस कदम उठाने पर कोई नुकसान ना हो बल्कि यहां सवाल तो 150 गांवो के वोट बैंक का है। इस प्रकार की कुप्रथाऎं मालवा क्षेत्र के लगभग लगभग 150 गांवो में फ़ैलीं हैं। इससे साफ़ तोर पर जाहिर होता है कि कोइ भी नेता अपना 150 गांवो का वोट बैंक खोना बिलकुल नही चाहेगा। सरकार को इस कुप्रथा पर जल्द से जल्द कड़ा रुख अपनाते हुये पाबंदी लगानी चाहीये और इसके साथ-साथ भारत में कुप्रथाऎं किन-किन जगाहों पर आज भी विद्दमान हैं, पता लगाकर उन पर कड़ी कार्यवाही के तेहत पाबंदी लगानी चाहीऎं।

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इच्छा मृत्यु सही या गलत?


Aruna Shanbag

इच्छा मृत्यु के नाम से ही समझ आ जाता है कि अपनी इच्छा से मृत्यु को प्राप्त होना। दया मृत्यु और इच्छा मृत्यु की चर्चा भारत में अकसर होती रही है लेकिन रितक रोशन की फ़िल्म गुजारिश्के आने के बाद तो दया मृत्यु और इच्छा मृत्यु का मुद्दा बहुत ही जोर शोर से गरमा रहा है। आजकल इच्छा मृत्यु गम्भीर बिमारी से पीडितो और उनके करीबी अर्थात पीडित की हालत से अच्छी तरह रूबरू होते है, के द्वारा भारतीय कोर्ट से मांगी जा रही है। ये सोचें कि। अगर किसी व्यक्ति के दोनो पैर, दोनो हाथ और जीवा कट गये हों तो उसकी हालत कितनी दयानिय हो जायेगी ये सोचकर ही भय लगने के साथ दर्द का आभास होता है। बिलकुल ठीक ऐसा ही अनुभव करता होगा किसी लाईलाज बिमारी से पीडित इंसान। पर कर भी क्या सकता है क्योकि जन्म तो उसने ले लिया इस संसार में, लेकिन दर्द से मुक्ति के लिये मृत्यु के निर्धारण का अधिकार उसे नही है, इसके लिये भी उसे कोर्ट में अर्जी लगानी होगी और इन्तजार करना पड़ेगा तब तक जब तक कोर्ट उसे इजाजत नही देता। क्या कभी कानून बनाने वालो ने सोचके भी देखा है कि किसी भयंकर बिमारी से पीडित व्यक्ति का दर्द एक मृत्यु से भी अधिक हो सकता है?… अपनी ऐसी दर्दनाक हालत से मुक्ति के लिये मृत्यु प्राप्त करने का अधिकार उसको कैसे मिल सकता है???… क्योकि पीडित व्यक्ति की हालत के बारे में पूरी तरह सिर्फ़ कोर्ट ही बता सकता है, वो नही… जो खुद लाईलाज बिमारि से पीडित है या जो पीडित के दर्द से रूबरू हैं????……
अरूणा शानबाग जो पिछले 37 साल से लाईलाज बिमारी से पीडित हैं और 37 साल से ही मुम्बई के किंग एडवर्ड अस्पताल में पलंग पर लगभग एक निर्जीव शरीर की भांति कष्टदायी स्थिति में पडी हैं और इसके अलावा मशिनो द्वारा उनकी सांसे चल रही हैं। ऐसे में कोर्ट ने अपने फ़ैसले में उनकी मृत्यु को मंजूरी क्यों नही दी??. अस्पताल की नर्सें जो कोर्ट के फ़ैंसले से खुशी जता रही हैं उनको यहां पर थोड़ा भावनात्मकता और स्नेह से दूर हटकर सोचना होगा क्योकि अस्पताल की नर्सो को इतना भी नही पता कि वे अरूणा जो पिछले 37 साल से एक पलंग पर ही एक निर्जीव वस्तू की तरह अपने जीवन की आखरी सीढी पर कष्टदायी स्थिति में पडी हैं, कोर्ट के इस फ़ैसले से उनका दर्द और अधिक समय के लिये बढ गया है…।
अगर अरूणा के लिये दया मृत्यु की अपनी याचिका दायर करने वालीं लेखिका पिंकी विरानी पर कोर्ट को कोई शंका थी तो हमारे भारतीय न्यायधीश को अपना फ़ैसला सूनाने से पहले खुद जाकर कम से कम एक हफ़्ते तक अस्पताल में पड़ी अरूणा जी
की हालत से रूबरू होना चाहिये था। पूरी तरह हालत को परखने और काफ़ी सोचने के बाद न्यायधीश अपने फ़ैंसले को सुनाकर अरूण जी को उनके दर्द से मुक्त होने की इजाजत जरूर देते। यहां एक सवाल उभरता है कि कहीं न्यायधीश ने मामले को जल्दी से समाप्त करने के जोश में अपना फ़ैसला तो नही सुनाया???.. और दूसरा सवाल ये उभरता है कि क्या कानून बनाने वाले कानूनो में संशोधन की परिक्रिया से बचना चाहते हैं??….
इस बात का समाज को जरूर इन्तजार रहेगा कि इच्छा मृत्यु को ध्यान में रखकर बनाये गये कानूनो में बदलाव कब किया जायेगा?? या क्या इसी तरहं ये सिलसिला ऐसे ही चलता रहेगा??

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