भारत-चीन के बीच दोस्ताना रिश्ते मजबूत बनने की ओर…..


भारत और चीन दोनो देश विकासशील देश हैं और तेजी से विकास की ओर बढती अर्थव्यवस्था भी। चीन ने जिस तेजी से बढती हुई जनसंख्या जैसी समस्या के बावजूद विश्व के सामने अपने आपको मजबूत बनाये रख कर, जो चुनोती दी है, काबीले तारीफ़ है। ठीक चीन की ही तरहं भारत भी एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था है , जो आने वाले कल में विश्वश्क्ति होने का दावा भी कर रही है। दोनो देशो की इन स्थितियों को देखते हुये चीन और भारत के मधुर संबन्ध बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं। चीन और भारत के बीच दोस्ताना और शांतीपूर्ण संबन्ध जितने दोनो देश की अर्थव्यवस्था में उतार-चढाव में संतुलन बनाये रखने के लिये अहम हैं उतने ही दोनो देशो की जनता के लिये भी बेहद जरूरी हैं। अर्थिक नजरिये से देखने पर चीन-भारत के संबन्ध बहुत ही महत्व रखते है। भारत-चीन “ब्रिक्स समूह” के सदस्य हैं, जिसमें व्यापारिक साझादारी बढाने पर खासा जोर दिया जाता है।  भारत और चीन ने दोनो तरफ़ से व्यापारिक साझेदारी बढाने पर जोर देते हुये साल 2015 तक करीब 100 अरब डॉलर का व्यापार करने का लक्ष्य रखा है। जो दोनो देशो के लिये फ़ायदेमंद साबित होगा। इससे पहले भी भारत और चीन के बीच शांती पूर्ण व्यापारिक समझोते के कारण साल 2010 में लगभग 60 अरब डॉलर का व्यापार हुआ। एक अनुमान के मुताबिक भारत, चीन से लगभग 20 अरब डॉलर का आयात करता है। पहले की तुलना में भारत और चीन के बीच शांतीपूर्ण व्यापारिक गतिविधियां काफ़ी बढी हैं। जिससे भविष्य में दोनो देशो के संबन्ध में लम्बे समय तक शांतीपूर्ण ढंग से रिश्ता बने रहने को बल मिलता है। चीन और भारत के बीच सीमा विवाद भी लम्बे समय से चला आ रहा है। कई वार्ताए हुईं जिनसे दोनो देशो में हर स्तर पर करीबीया बढती हुई नजर आयी हैं। देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ से वार्ता के दौरान ब्रहमपुत्र नदी बांध पर उठे विवाद पर चर्चा की है। चीन ने भारत को आश्वासन दिया है कि नदी बहाव को मोडा नही जायेगा। दरसल चीन कुछ समय से सूखे की समस्या से जूझ रहा है इसलिये उसने ब्रहमपुत्र नदी के पानी का रुख अपनी ओर मोडा है। माना जा रहा है कि चीन ब्रहमपुत्र नदी पर बांध का निर्माण कर बिजली उत्पन्न करना चाहता है।

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अन्ना की मुहिम और युवा जन-सहलाब का जूनून


youth

अन्ना ने देश में फ़ैले भ्रष्टाचार के विरुद्ध जो देशव्यापी मुहीम छेड़ी है उससे देश का हर एक वर्ग और युवा वर्ग धीरे-धीरे इतने बडे तादाद में लगातार जुड़ता चला जा रहा है कि अंदाजा नही लगाया जा सकता कि कितनी संख्या होगी। लोगो का जज़बा इस कदर बढ चुका है कि इसका अंदाजा अन्ना के जनलोकपाल बिल को अमलीजामा पहनाने के लिये रामलीला मैदान में उमड़ रही भीड़ से लगाया जा सकता है। तिलकब्रिज से लेकर रामलीला मैदान तक जाने वाली सड़क पर इधर-उधर नजर डाली जाये तो ऐसा अनुभव होता है कि जिन लोगों की भीड़ या जो भी लोग आगे आगे बढते जा रहे हैं, जैसे आगे कोइ मेला लगा हो, पर आगे कोई मेला नही, दरसल वें सभी लोग अन्ना के समर्थन के लिये रामलीला मैदान की और कूच करते दिख रहे है। यूपीए सरकार के अड़ियल और तीखे रुख को देखते हुये अन्ना और अन्ना के साथ संघर्ष में जुटा आमजन तथा खासकर यूवा वर्ग की एक कड़े लोकपाल बिल 30 अगस्त तक लाने की उम्मीदें पूरी हो पायेगीं मुश्किल सा लग रहा है पर ज्यादा मुश्किल भी नही है।

people

सरकार समझोता करने के लिये इधर-उधर हाथ फ़ैकेंगी यह तय है। पर अभी जो बात परेशान करने वाली है, वो ये कि कहां सरकार तीखे शब्दो के वार कर रही थी और अन्ना को अनशन अपनी नई-नवेली शर्तो को थोपकर अनशन की जगहां न देने पर पूरी तरहं अड़ी हुई थी, वहीं अचानक अनशन के लिये जगहां की इज़ाजत देदी गयी, और वो भी रामलालीला मैदान में। अगर हम यह मान लें कि सरकार इतने बड़े जनसहलाब को देखकर डर गयी, तो यह सरासर गलत सोचना है। दरसल सरकार तो पहले ही जानती है अगर अन्ना ने आवाज बुलंद की तो उसके साथ देश भर में कई आवाजे बुलंद होंगी। क्योंकि अन्ना एक बार तो अनशन कर नही रहे बल्कि वह तो समाजिक सुधार करने के लिये ही जीवनभर संघर्ष करते आये है। इतना तो तय है कि यूपीए सरकार के पास कोई न कोई खिचडी जरूर पक रही है।

MP of congress

“अन्ना बात करें, साथ मिलकर काम करें और हम साथ मिलकर समस्याओं का हल निकालेंगे” यह बात कही है कोंग्रेस के प्रवक्ता राशिद अल्वि ने सारी दुनिया के सामने आईबीएन7 पर चल रही चर्चा के दौरान संदीप चौधरी जी के बीच का रास्ता खोजने को लेकर एक प्रश्न के जवाब में। इन बातो से साफ़ झलक रहा है कि अन्ना को राजनीति में आकर सरकार से हाथ मिलाकर काम करने के लिये खुली दावत है। कहीं हमारी यूपीए सरकार यही तो नही चाहती? यह एक बहस का प्रश्न हो सकता है।
अन्ना के जनलोकपाल के समर्थन में जुटे कुछ यूवा वर्ग कि राय जानने पर उन लोगो की बात गलत साबित हो जाती है जो सोचते है और कहते है कि जो लोग अन्ना के लोकपाल के समर्थन में खड़े हो रहे है उनको लोकपाल के बारे में कूछ मालूम ही नही। बल्कि हकीकत तो यह है कि देश का यूवा जनलोकपाल के बारे में केवल जानते ही नही अच्छी तरह समझते भी है। साथ ही साथ सरकारी लोकपाल बिल और अन्ना के लोकपाल बिल में अंतर भी बखूबी समझते है।

दिल्ली विश्वविधालय के किरोरीमल कोलेज में पढने वाले राजनीति विषय के छात्र आशिश सिंह ने अपनी बैबाक जबान में आपनी राय देते हुये कहा कि प्रधानमंत्री,एमपी,एमएलए और यहां तक की न्यायपालिका को भी लोकपालबिल के दायरे में लाना बेहद जरूरी है।

A girl dedicated

यूवाओं का जज़बा देखने लायक है:-रामलीला मैदान की हालत बारिश होने से इस कदर खराब है कि जहां पैर रखा वहीं धसं जा रहा है पर इससे यूवाओ में जज़बा कम हुआ ऐसा बिलकुल नही दिख रहा बल्कि देश के यूवा और बच्चे व महिलाएं सभी अपने हाथो से ही जमीन को समथल बनाने में जुटे हुये है और जगह-जगह भरे हुये पानी को हाथो से ही नाली बना कर बाहर की ओर बहा रहे हैं।

youth is dedicated

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राजनीति क्यों


prof. Yogendra yadav

“राजनीति क्यों” का अगर उत्तर खोजा जाये तो ये ही कहा जा सकता है कि एक अर्थव्यवस्था को ठीक तरहं से संचालित करने के लिये राजनीति बेहद जरूरी है। राजनेता ही समाज की समस्यांओ का निवारण करने में बेहद महत्पूर्ण भूमिका निभाते हैं। पर यहां प्रश्न उठता है कि आज देश में जिस तेजी से भ्रष्टाचार अर्थव्यवस्था की जड़ों को खोकला करता जा रहा है उसकी भी तो जड़े कहीं न कहीं राजनीति से ही जुड़ी हैं, तो क्यों राजनीति जरूरी है? वहीं दूसरी तरफ़ तथ्य यह भी है कि इस लोकतंत्र में राजनीतिक अखाड़े के पहलवानो को भी तो हम यानी समाज ही चुनता है? अगर हम वास्तविकता की तरफ़ रुख करे और थोड़ा गहराई से विचार करे तो साफ़ पता चलता है कि  कहीं न कहीं दोष हमारा है। यहां विचारणीय बात है कि भ्रष्टाचार को बढावा देने के लिये राजनीति जितनी जिम्मेदार रही है उससे कहीं ज्यादा कार्य-नीतियों और कार्यप्रणाली में मोजूदा दोष जिम्मेदार हैं। आईआईएमसी दिल्ली के सभागार में प्रोफ़ेसर योगेन्द्र यादव जी ने जो बात कही कि “देश की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता ही नही है” जिससे कोन-कोन सी योजना में भ्रष्टाचार कब, कहां और किसके द्वारा हो जाता है कुछ पता ही नही चलता।

Curruption

योगेंद्र यादव जी की पारदर्शिता ना होने वाली बात बिलकुल एक ऐसे प्रश्न को उजागर करती है जिससे एक सच्चाई से पर्दा सा उठता दिखाई देता है। प्रोफ़ेसर योगेंद्र यादव जी ने एक विश्लेषणात्मक तथ्य को सामने रखते हुये कहा है कि देश किसी योजना का “निर्णय लेने” और “कार्य संचालित होने” दोनो के बीच एक बहुत चौड़ा अंतराल है जो भ्रष्टाचार और घपलेबाजीयों को बढाने में कारगर साबित होता है।
यही नही योगेंद्र यादव जी ने बड़ी ही स्पष्टता के साथ इस बात सभागार में बैठे सभी लोगो के सामने रखी कि “निर्णय लेने” और काम करने के बीच में जो भी लम्बा-चौड़ा अंतराल पाया जाता है, उस अंतराल को खत्म करते हुये पूरी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाई जा सकती है। जिससे किसी योजना-परियोजना के निर्णय लेने और उस योजना का लाभ जरूरतमंदो तक पहुंचने के बीच के अंतराल के दौरान जो भी पैसो की लूट-खसौट होती है वह धीरे-२ समाप्त हो सकती है। आज भ्रष्टाचार अपने जिस चरम पर है उसके लिये एक उदाहरण यह कहा जा सकता है कि सरकार द्वारा जरूरतमंदो के लिये खर्च किये गये हर एक रुपये में से केवल दस पैसे ही आम जरूरतमंदो तक पहूंच पा रहे है। लोकपाल बिल लाने और भ्रष्टाचार मिटाने की अन्ना की यह मुहिम आम आदमी के लिये एक उम्मीद लेकर आई है। पर हमारे राजनेता और हमारी सरकार ऐसा चाहते हों, आजकल सरकार के अड़ियल रवये और बौखलाहट को देखते हुये कतई महसूस नही होता।

Prime Minister Of India

अन्ना हजारे द्वारा प्रधानमंत्री को अनशन के लिये स्थल दिये जाने अपील की तो प्रधानमंत्री ने चुस्ती-फ़ुर्ती दिखाते हुये संविधान का हवाल देते हुये कहा कि अन्ना को इससे संबधित अधिकारीयों यानी पुलिस से बात करनी चाहिये.. रिसर्च का विषय तो यह है कि अब इतनी जल्दी हमारे प्रधानमंत्री को संविधान याद आ गये लेकिन यह चुस्ती-फ़ुर्ती तब क्यों नही दिखाई जब 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले अंजाम दिया जा रहा था?… आखिर जब क्यों याद नही आये प्रधानमंत्री को भारत के संविधान?

 

 

इससे आगे भी जारी रहेगा..

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जन स्वास्थ की दशा:- मुहं तकता हुआ समाज, बुनीयादी सुविधाओं से अछूता आज भी…


बुनीयादी सुविधाओं से अछूता आज भी...

 इतिहास गवा है कि सन 1921 के बाद से ही जनसंख्या ने तीव्र गती से बढते हुये एक विशाल रूप धारण कर लिया है। आज जनसंख्या एक अरब को पार करते हुये एक सौ इक्कीस करोड के आकडे पर पहुंच गयी है। जिसका परिणाम आज भी हमारे सामने है जैसे दशको पहले भी देखा जाता था, वो यह कि आज वर्तमान में रहने वाला गरीब आम जन बुनियादी सुविधाओ से पूरी तरहं अछूता रह कर गरीबी की धूप में तप रहा है, क्योंकि गरीबी और बैरोजगारी उनका पीछा ही नही छोडती। काफ़ी हद तक अगर देखा जाये तो गरीबी और लाचारी ने ही भ्रष्टाचार जैसी बिमारी को जन्म दिया है या कहीये कि जल्द से जल्द शोर्ट-कट खोज कर पैसा कमाने की भूख को जन्म दिया। जिसका परिणाम यह हुआ है कि आज स्वाथ्य जैसी बुनियादी सुविधाओ पर किया जाने वाला हर एक रुपये में से केवल दस पैसे का लाभ ही वांछितो को मिल पाता है।
भ्रष्टाचार के लम्बे समय से चले आ रहे चक्रव्यूह ने अपनी जड़े बड़ी ही मजबूती से जमाली है। जो अब स्वास्थ क्षेत्र में भी तेजी से फ़ैलने लगी है। रिजल्ट सबके सबज के सामने है कि गरीब आमजन सरकारी स्वास्थ सेवाओं से आज भी अपने आपको बहुत दूर देखता है। कहना न हो कि वांछितो को लाभ पहुंचाने के लिये बहुतरी स्वास्थ योजनाये चलाई जाती रही हैं और चल भी रही है। पर इन सेवांओ का लाभ जरूरतमंदो को मिल पा रहा है या नही इस बात का सटीक अंदाजा लगा पाना कठिन है।          

स्वास्थ क्षेत्र

  पर अगर ताजा उदाहरण पर नजर डाली जाये तो पूरी तस्वीर उभर कर सामने आ जाती है। राजस्थान में एक अस्पताल में कोई 32 घटनाये दर्ज है, और यही नही यहां एक महिला ने एक साल में 24 संतानो को जन्म दिया और इसके अलावा 60 साल की एक महीला ने साल में दो बार संतान को जन्म दिया। गिनीज बुक के रिकोर्ड को तोड़ने वाले इन आंकड़ो से साफ़ जाहिर है कि यह हकिकत नही बल्कि एक नया घोटाला है। उस केंद्र की गर्भवस्था सेविकाओं ने केंद्र सरकार की जननी सुरक्षा योजना के तेहत गरीबी रेखा से नीचे गर्भवती महिला के लिये निर्धारित सहायता राशी को हड़पने के लिये गलत रिपोर्ट पेश की। जननी सुरक्षा योजना के तेहत गर्भवती महिला को 1700 रुपये और प्रत्येक प्रसव पर मिडवाईफ़ को इसके लिये 200 रुपये उसकी बेहतरी के लिये दिये जाते है। यह तो रही महिला स्वास्थ की बात और अगर हम “नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे” द्वारा पेश की गयी 2005-2006 की रिपोर्ट पर नजर डाले तो सच्चाई के रूप में चौंकाने वाले तथ्य सामने आते  है। मेघालय, मध्यप्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में हर चार में से एक बच्चा कुपोषित पाया गया। इसके अलावा पूरी तरहं से सुविधायुक्त कहे जाने वाले क्षेत्र दिल्ली, मुम्बई, मेरठ में हर 10 में से 4 बच्चे कुपोषण का शिकार पाये गये। इन आंकड़ो से देश में जन स्वास्थ की दशा किस दशा का पूरा नही कफ़ी हद तक आभास हो रहा है। आज देश-समाज में वांछितो को स्वास्थ सुविधाओ के लाभ पहुंचाने के लिये गंभीर चिंतन जितना जरूरी लगता है उतने ही गंभीर प्रयास करने की भी बेहद अवश्यकता है।

 

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ब्लैक इकोनोमी:- काली अर्थव्यवस्था की छांव में फ़ैल रहा है जहर…


India-Black-Money

“ब्लैक इकोनोमी” यह एक जहर की तरह है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था को एक-एक कर लगातार खोकला और कमजोर करता जा रहा है। ब्लैक इकोनोमी यानी काला धन से अर्थ हम उस उपलब्ध “मनी” से लगा सकते हैं जो चौरी-छुपे गलत तरीको द्वारा कमाई जाती है और फ़िर उस रकम को राष्ट्र की नजरो से दूर रखने के लिये तथा “कर” से बचने की कामना लिये कहीं विदेश में स्विस जैसे बैंको में ले जाकर भर दी जाती है, फ़िर चाहे उसके देशवासी ही भूखे क्यों न मर जाये, और खुद उसके देश में बच्चे प्राथमिक शिक्षा तथा समाज को बैरोजगारी की आग में तपते-तपते गरीबी की भट्टी में रहकर ही गुजर-बसर करना पड़े!                
भारतीय काली अर्थव्यवस्था आजादी के बाद से लगातार बढती चली जा रही है। जवाहर लाल नेहरु विश्विधालय के अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर अरुन कुमार के अनुसार 50 के दशक के आस-पास काला धन तेजी से बढते हुये 3% से बढकर 20% पर पहुंच गया। एक मोटे अनुमाने के मुताबिक आज ब्लैक इकोनोमी के क्षेत्र का आकार बढकर औधोगिक और क्रषि क्षेत्र से बढा हो चुका है। प्रोफ़ेसर अरुन कुमार जी के मुताबिक “आज जी०डी०पी का 40 प्रतिशत “ब्लैक इकोनोमी” है” जो(काला धन) एक “ब्लैक हौल” की तरहं हमारी अर्थव्यवस्था को निगलने के लिये तैयार है।आज देश की हालत भ्रष्टाचार जैसी भयंकर बिमारी से इस कदर खराब हो चली है कि समाज में रह रहा आम जन कुछ भी सरकारी सेवाओं का लाभ पाने और उन सेवाओ के जरिये आगे बढने की आशा ही छोड बैठा है। अगर “ट्रांस्पेरन्सी इंटरनेशनल ग्लोबल करप्शन बायोमीटर” की 2007 रिपोर्ट पर नजर डाली जाये तो यह चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं कि 25% से 30% व्यक्तियों ने सरकारी सेवाओं पाने के लिये रिश्वत दी, पिछले तीन साल में यह आकडा कितना विशाल हो गया होगा इसका आभास बढते भ्रष्टाचार से लग ही गया है और इसके अलावा हर पांच में से चार व्यक्ति राजनीति को पूरी तरहं से भ्रष्ट समझते है।

poor India

आज जिस प्रकार भ्रष्टाचार हमारी अर्थव्यस्था को खोकला करता जा रहा है इसका अंदाजा आजकल चल रहे माहोल को देखकर लगाया जा सकता है। उपरोक्त आकडे साफ़ बयांन कर रहे है कि “राजनीतिक क्षेत्र” अपने बढते भ्रष्ट आचरण के कारण आम आदमी के दिमाग में एक तुच्छ और भ्रष्टाचार रूपी कीचड़ के रूप में जड़ कर गयी है। इससे युवाओं की मानसिकता पर क्या प्रभाव पड़ा है यह जग जाहिर है। देश के लगभग 60 करोड युवां राजनीतिक क्षेत्र से लगातार दूर भागते जा रहे हैं। कर चौरी करके बाहर विदेश में जमा करने की जो एक भ्रष्ट प्रथा सी चल पड़ी है उससे देश को भारी-राजस्व का नुकसान तो झेलना पड़ ही रहा है इसके साथ बैरोजगारी और गरीबी जैसी समस्याओं से भी भारतीय अर्थव्यवस्था को गुजरना पड़ रहा है वो अलग!
प्रोफ़ेसर अरुन कुमार जी ने अपने लेक्चर के दैरान जो बात कही कि “अगर सरकार चाहे तो भ्रष्ट आचरण करने वालो को चंद दिनो की जांच-पडताल करके पकड़ा जा सकता है” यह बात बिलकुल सटीक ठहरती है ..पर वास्तव में देखा जाये तो ब्यूरोक्रेट्स और सरकार तथा हमारे नेता ऐसा चाहते हों ऐसा कतई नही लगता। “हसन अली” जो राजनेताओ और कारोबारीयों के पैसो को अपने देश से दूसरे देशो में बैंको में ले जाने का काम करता था, उसने बड़े-बड़े लोगो का नाम लिया परंतु उन नामो पर गौर न करते हुये बल्कि उस पर पर्दा डालने की कोशिश की गयी। प्रोफ़ेसर अरुन कुमार ने अपने लेक्चर के दौरान एक उदाहरण देते हुये कहा कि पोलिटिक्स में आने के बाद इलेक्शन जीतने के बाद कई राजनेताओ का खर्चा हजारो से बढकर एकदम 1 करोड 29 लाख हो गया। देश की न्याययिक व्यवस्था इतनी शीथिल रूप से चलती है कि आज के टाईम में करीब 3 करोड केस यूं हीं फ़ाईलो में दबे हुये हैं। देश की न्याययिक प्रक्रिया कि ऐसी स्थिति सरकारी व्यवस्था का पूरी तरह भ्रष्ट होने से है या न्याय भी अब पैसो वालो को मिलेगा यह कहना कठिन है, पर भ्रष्टाचार और करचौरी करने वालो ने देश के साथ धोखा तो किया ही है साथ ही अर्थव्यवस्था को कमजोर भी बना दिया है यह कहना अतिश्योक्ति न होगी। आज देश का कितना पैसा विदेशी बैंको में जमा है इसका सटीक अंदाजा लगा पाना कठिन है पर कुछ आंकड़ो पर अगर विश्वास कर लिया जाये तो आज देश का लगभग 400 लाख करोड भारी-भरकम पैसा विदेशो में जमा है।  बेहद धीमी सरकारी कार्यवाहीयों के चलते यह अंदाजा लगा पाना कठिन है कि विदेशो में जमा काला धन देश वापस लाने के साथ कर चौरी करने वालो को कब तक सजा मिल पायेगी और इसके अलावा गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले जिनके बच्चे भूखे तड़प-तड़प कर मर जाते है उनको कब तक न्याय मिल पायेगा इसका उत्तर खोज पाना बहुत मुश्किल है। एक तरफ़ करीब 30% -35% लोग गरीबी रेखा से नीचे जी रहे है जिन्हे आज 2400 केलरी भी नसीब नही होती है वहीं दूसरी तरफ़ मंत्रलयों स्तर पर किस प्रकार लापरवाही से पैसा लुटाया जाता रहा है इसका अंदाजा करने के लिये अगर पिछले साल 2010 जुलाई के महिने के दौरान “दैनिक भास्कर” में छपी एक रिपोर्ट पर नजर डाली जाये तो पता चलता है कि एक साल की अवधि के दौरान कैंद्रीय स्वास्थ मंत्रालय ने 94 लाख रुपय केवल नाश्ने पर ही खर्च कर दिये, जो प्रधानमंत्री जी के कार्यालय से करीब आठ गुना ज्यादा है। वर्तमान में देश की अर्थव्यवस्था के जो हालात सामने उभर कर आ रहे है उससे साफ़ अंदाजा होता है कि अगर कालेधन और भ्रष्टाचार जैसी गंभीर समस्याओं को खत्म करना है तो एक गंभीर चिंतन के साथ चौगुनी महनत के साथ प्रयास करने की जरूरत है, यही समय की मांग है।  

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पुरुष-सत्तात्मक शक्ति के खत्म होने का डर सता रहा विश्व में


महिलाओं संघर्ष जारी रखना होगा समाज में उचित जगहां पाने के लिये….

पाकिस्तानी विदेश मंत्री हीना रब्बानी खा

महिलाओं का तिरस्कार और उपेक्षा
हमारे देश में ही नहीं पूरे विश्व में किया जाता है| भारत देश हमेशा से ही पुरुष  प्रधान देश के नाम से जाना गया है| भारतीय समाज प्राचीन समय से ही एक ऐसी गाथा को बयाँ करता आया है जिसमे पुरुषो ने हमेशा से ही महिलाओं की सीमाए बांधनी चाहि और उनको अपनी रचित परिधि में ही रखना चाहा है| इस परिक्रिया को अगर प्रारंभ में ही स्थगित या खत्म कर दिया जाता तो शायद महिलाये अपनी पूर्ण स्वतंत्रता को शीघ्रता से पा लेती, लेकिन आज पुरुष मानसिकता वाली इस परिक्रिया को दशको बीतने के बाद पुरुष प्रधानता की मानसिकता को पुरुष समाज अपने मस्तिष्क के किसी कोने में लिये बरसो के समय अंतराल से गुजरा है, जिसका रिजल्ट यह रहा कि “पुरुष ही सर्वोपरी” वाली सोच पुरुष के मस्तिष्क में मजबूती से घर कर गयी या कहना गलत न होगा कि पुरुष को अब अपने आपको महिला का कर्ताधर्ता या सर्वेसर्वा समझते रहने की आदत हो गयी है।

  अब जब वर्तमान में, पूरे एशिया में परिवर्तन की जो तेज लहर  दौड़ पड़ी है, जिसके कारण महिला, पूर्व-रचित रीत या पुरुष द्वारा निर्मित सीमाओं को पार कर एक स्वतंत्र जीवन जीने के साथ एक लंबे संघर्ष के बाद अपने अधिकारो को पाने के लिये आगे बढकर नये-नये अवसर प्राप्त कर रही है, तो नारी का इस तरहं वर्चस्व और अधिकार बढता देख, अपनी पुरुष-सत्तात्मक शक्ति के खोने के डर से पूरी तरहं विचलित होता नजर आ रहा है पुरुष समाज। आज भारतवर्ष में जिस कदर बलात्कार, महिलाओ की हत्यायें और उनके साथ होती बेकदरी से ही वर्तमान युग के पुरुष समाज की शक्ल साफ़ नजर आ रही है। एक विचारणीय बात है कि सालों बीत चुके हैं लेकिन देश के संसद और विधायिकाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत सीट देने वाले इस कानून को अभी तक अमलीजामा नही पहनाया गया। हर बार महिला आरक्षण मुद्दा बडे ही जोर-शोर से गरमाया, लेकिन हर बार की तरंह यह सिर्फ़ वोट बटोरने का जरिया बनकर रह गया, सही माईनो में कहा जाये तो, महिला आरक्षण कानून को लागू करने पर सही रूप से और निष्पक्षता से कभी अमल किया ही नही गया।

exploited

आज घरेलू महिला अगर अपने अधिकारो की स्वतंत्रता के लिये अपने हक की मांग करती है तो संघर्ष करने पर खुद पुरुष द्वारा पहले तो वह जैसे चाहा वैसे दंडित और शोषित की जाती है अगर इससे भी चेन न आये तो महिला को घर से बेघर करने में पुरुष जरा भी देर नही करता। सिर्फ़ भारत में ही नही बल्कि एशिया में भी पुरुष समाज, महिलाओं का अधिकार क्षेत्र बढता देख विचलित हो उठा है, जिसका एक ताजा उदाहरण पाकिस्तान में एक जमीयत उलेमा ए-इस्लाम पार्टी के प्रमुख नेता मौलाना फ़जलूर की आलोचनात्मक टिपणी है जो उनहोने पाकिस्तान में पहली महिला विदेश मंत्री चुनी गयी हीना रब्बानी खार के लिय की है। अब देखिये मौलाना फ़जलूर ने कहा है कि “एक महिला को यह पद देना एक समझदारी और बुद्धीमत्तापूर्ण फ़ैसला नही है”. अब बताईये अखिर कोई ऊचा पद देना किसी महिला को क्यों समझदारी का फ़ैसला नही है? इससे तो यही मतलब निकाला जा सकता है कि अभी भी देश में ही नही विश्व में भी महिलाओं को पुरुषो से कम ही आंका जाता है।

(एक बहस का प्रश्न है कि- “पुरुष ही सर्वोपरी” मानसिकता को कब निकाल दूर करेगा पुरुष समाज? )

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कैसी कल्पना की होगी, क्या बन गया भारत !


भ्रष्टाचार का गढ बनता जा रहा भारत, हमारे लीडर्स ने नही समझी तिरंगे की गरिमा ………

आज ही के दिन यानी 22 जुलाई के दिन ही हमारे देश के राष्ट्रीय ध्वज को पिगली वैंकया ने देश के समाज के सामने रखा था। तब शायद राष्ट्र तिरंगे की गरिमा को ध्यान में रखते हुये ही  समाज ने एक बहतर जीवन और बहतर देश की कल्पना की होगी। सन 1947 के दौरान देश के संविधान के अनुसार यह सुनिश्चित किया गया कि तिरंगे के प्रति देश का हर नागरिक सम्मान प्रकटक करेगा। पर सवाल तो यह है कि क्या हम तिरंगे की गरिमा को समझते हुये देश को उस पायदान पर ला पाये हैं जिस पायदान पर आज देश को आज होना चाहिये था। आज के भारत की हालत क्या हैं इस बात से हर एक नागरिक बखूबी वाकिफ़ होगा और इन हलातो की असल जड़ किया है इस बात को भी हम जानते हैं।

poor India

असल में देखा जाये तो देश में आज के हालातो की जिम्मेदार गरीबी थी, है और ठीक ऐसे ही हाल बने रहे और नोट-वोट की लूट खसोट का सिलसिला ऐसे ही चलता रहा तो यह कहने में कोई हेरत की बात नही रह जायेगी कि भविष्य में भी गरीबी देश को लंबे समय का ठहराव देने के लिये मुह फ़ाडे खडी होगी। यह बात भी किसी से छुपी नही रह पाई है कि गरीबी की भट्टी में आज भी तपता एक बडा तबका बुनियादी सुविधाओं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और मकान आदी सुविधाओं से दूर, इनको पाने के लिये दर-दर भटकने के बावजूद खाली हाथ, नेताओ और नोकरशाहों के मुह तकता एक-एक गिरते आंसूओ के साथ अपनी उम्मीदो को खोता जा रहा है। बिहार के मुजफ़्फ़रपुर में ही अगर देखा जाये तो पिछले कई सालों में बेनाम बिमारी के चलते हजारीयों बच्चे मोत के मुह में चले गये। रही शिक्षा की बात तो मुफ़्त शिक्षा अधिकार कानून की जिस प्रकार द्जज्जिया उड़ी है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अभिभावको की लगभग हजारीयों की संख्या में कंप्लेन्टस धरी की धरी रह गयी, न ही कोई संतोषजनक कार्यवाही हुई और न ही शिक्षा अधिकार कानून का फ़ायदा शिक्षा से वंचित गरीब बच्चो को मिलता दिखाई दिया।

political debate

अब प्रश्न आता है कि इस सबके पीछे कोन है? तो घून फ़िर कर वहीं उस रास्ते पर अना पडता है, जो हमारे देश के रानेताओं के पास जाता है। यूपीए की सरकार राज में इस कदर लूट-खसौट मची हुई है, कि आने वाले इतिहास में “सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार के कालों की सरकार”, जैसा स्लोगन यूपीए सरकार  के लिये दर्ज हो जायेगा, यक कहना अतिश्योक्ति न होगी। 2जी घोटाला, आदर्श घोटाला, कोमनवेल्थ घोटाला और अभी एक और नया घोटाला हमारी केंद्र सरकार के काल में, कर्नाटक के लोकायुक्त संतोष हेगडे के मीडिया को दिये बयान से सामने आया है कि महज 14 महिने में ही कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदुरप्पा ने अवेध खनन के जरिये करीब 1800 करोड़ रुपय का घोटाला कर, राजस्व को भारी-भरकम नुकसान पहुचा दिया। कहने को इन घोटालों से कोंग्रेस को बीजेपी पर कहानीयां गढने का मोका मिल गया हो, लेकिन देश की दो बड़ी राजनैतिक दल यानी बीजेपी और यूपीए दोनो की सच्चाई जनता के सामने है। सोचने वाली बात है, बोखलाहट इतनी है कि दोनो पार्टीयां एक दूसरे पर आड़े-तिरछे आरोप मंडने से भी नही चूक रही। आईबीएन7 पर चल रहे कार्यक्रम में बैठे लोकसभा सदस्य और नेता शकील अहमद पूरे देश के सामने बोखलाहट में यहां तक कह गये कि लोकायुक्त जैसी संस्था को ही खत्म कर देना चाहिये। सवाल उठता है कि क्या लोकायुक्त जैसी गरिमा पूर्ण संस्था को इसलिये खत्म कर देना चाहिये कि अब यह संस्था राजनेताओं द्वारा मचाई जा रही लूट-खसौट को जनता के सामने लाने की कोशिश कर रही है। लगातार देश को भारी राजस्व के नुकसान से आर्थिक असंतुलन देश की अर्थव्यवस्था पर अपना ठिया बनाये हुये है। इसके आलावा आज कमरतोड़ महंगाई आम समाज को किस कदर दुखी किये हुये है, उस दर्द का अंदाजा हमारे राजनेताओं और नोकरशाहों को शायद ही हो।

“देश के इन हालातो को देखते हुये सवाल है- क्या यही कल्पना की होगी?… कैसी क्ल्पना की होगी, क्या बन गया भारत!

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